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हाउस हेल्प को न्यूनतम वेतन देने की मांग उठी, SC ने सुनवाई से इनकार कर दिया

Supreme Court domestic workers wages: सुप्रीम कोर्ट में घरेलू सहायकों की न्यूनतम वेतन से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी. इसे गैर-सरकारी संगठनों और संघों की ओर से दायर किया गया था.

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Supreme Court domestic workers wages
घरेलू सहायक के न्यूनतम वेतन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया. (प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडिया टुडे)
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रितिका
29 जनवरी 2026 (अपडेटेड: 29 जनवरी 2026, 05:28 PM IST)
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“घरेलू कामगारों के लिए जैसे ही न्यूनतम वेतन तय कर दिया जाएगा, लोग उन्हें रखने से इनकार करने लगेंगे. हर घर ‘मुकदमेबाजी’ में फंस जाएगा. जब मिनिमम वेज लागू किया जाएगा, तो यूनियन सुनिश्चित करेंगी की हर घर को मुकदमे में घसीटा जाए.”

सुप्रीम कोर्ट में घरेलू सहायकों की न्यूनतम वेतन से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी. इसे गैर-सरकारी संगठनों और संघों की ओर से दायर किया गया था. उनकी मांगें थी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन पाने का मौलिक अधिकार मिले. मगर 29 जनवरी को कोर्ट ने इस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि घरेलू कामगारों के वेतन से जुड़ा मामला संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है. इन्हें वहीं तय किया जाना चाहिए.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमलया बागची की बेंच ने डोमेस्टिक वर्कर्स के जरूरी न्यूनतम वेतन तय किए जाने पर चिंता भी जताई. उनका मानना है कि इसका उल्टा असर पड़ सकता है. अदालत के मुताबिक, मिनिमम वेज की मांग को मानने के बाद ट्रेड यूनियन्स 'हर घर' को मुकदमों में घसीट सकती हैं. हर घर पर केस होगा. इससे लोग घरेलू कामगार रखने से कतराने लगेंगे.  

कोर्ट ने कहा,

“हर घर ‘मुकदमेबाजी’ में फंस जाएगा. जैसे ही न्यूनतम वेतन तय होगा, लोग डोमेस्टिक वर्कर्स रखने से इनकार करने लगेंगे. कितने उद्योग ट्रेड यूनियनों के साथ सही से काम कर पाए हैं? देखिए कि गन्ना उद्योग की यूनियन कैसे बंद हो गईं. जब न्यूनतम वेतन लागू किया जाता है, तो ये यूनियन यह सुनिश्चित करेंगी कि हर घर को मुकदमे में घसीटा जाए.”

पीठ ने अनुच्छेद 14, 15 और 16 का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ये तर्क बहस में अच्छा लग सकता है कि अगर घरेलू कामगारों को अनिवार्य न्यूनतम वेतन नहीं दिया तो उनके समानता, भेदभाव-रहित व्यवहार और निष्पक्ष रोजगार जैसे अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है. हालांकि हो सकता है उनके लिए मांग उठा रहीं कट्टर यूनियन्स उन्हें निस्सहाय छोड़ दें.

आगे CJI ने इसके परिणामों पर बात की. कहा कि इसके नतीजों पर ध्यान दें. आशंका है कि बाद में ट्रेड यूनियन्स इन लोगों को छोड़ देंगी और इनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं होगी.

बेंच ने पिटीशन पर बात करते हुए ये भी चिंता जताई कि न्यूनतम वेतन का एक बड़ा हिस्सा रोजगार एजेंसियां हड़प लेती हैं. CJI सूर्यकांत ने एक उदाहरण देते हुए कहा,

"ये एम्प्लॉयमेंट एजेंसी इनका (वर्कर्स) शोषण करती हैं. सुप्रीम कोर्ट स्किल्ड लोगों के लिए एजेंसियों को पैसे देता था. हम प्रति कर्मचारी को 40 हजार रुपये देते थे. मगर गरीब लड़कियों को सिर्फ 19 हजार रुपये मिलते थे. इसी तरह विश्वास टूटता है. लाखों लोग घरेलू कामगार रखते हैं. जब आप उन्हें एजेंसियों से हायर करते हैं, तो क्या होगा? डोमेस्टिक वर्कर की तरफ से किए गए ये सभी अपराध तब होते हैं, जब उन्हें एजेंसी से हायर किया जाता है. ना कि किसी व्यक्ति से पूछताछ करके."

याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने अदालत में अन्य देशों का हवाला दिया जहां घरेलू कामगारों के हितों में नियम बनाए गए हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि ये कहना गलत होगा कि घरेलू कामगारों के लिए कोई भी कल्याणकारी कानून मौजूद नहीं है. फिर वकील रामचंद्रन ने कहा कि हम ये चाहते हैं कि न्यूनतम वेतन न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाए.

सीनियर वकील ने कहा, “हम उन राज्यों को नोटिस जारी करने की मांग कर रहे हैं जिन्होंने अभी तक न्यूनतम वेतन लागू नहीं किया है. कुछ राज्यों ने ये पहले ही कर दिया है. केंद्र सरकार कह रही है कि यह फैसला राज्यों को ही लेना है.” 

आखिर में कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. और संकेत दिया कि इस मुद्दे को संबंधित राज्य सरकारों पर छोड़ देना ही बेहतर है. CJI सूर्यकांत ने कहा कि अगर आपको लगता है कि कुछ राज्यों ने कोई निर्णय लिया है, तो आप हाई कोर्ट से संपर्क कर सकते हैं.

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