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उमर खालिद के लिए नई उम्मीद, SC ने बेल नहीं देने के अपने ही फैसले पर सवाल उठाए

सु्प्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत नहीं दिए जाने के अपने पिछले फैसले पर आपत्ति जताई है. कोर्ट ने कहा कि UAPA की धारा आतंकवाद से जुड़े मामलों में जमानत देने पर सख्त प्रतिबंध लगाती है, लेकिन फिर भी ये प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को रद्द नहीं कर सकते. UAPA से जुड़े मामलों में भी 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' का सिद्धांत लागू होता है.

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18 मई 2026 (अपडेटेड: 18 मई 2026, 06:44 PM IST)
Umar khalid uapa sharjeel imam bail jail supreme court
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत नहीं देने के पिछले फैसले पर सवाल उठाया है. (इंडिया टुडे)
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सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही पिछले फैसले पर आपत्ति जताई है. कोर्ट ने 18 मई को सैयद इफ्तिखार अंद्राबी से जुड़े नार्को- टेररिज्म मामले पर सुनवाई के दौरान ये आपत्ति की है. शीर्ष अदालत ने माना कि UAPA से जुड़े मामलों में भी 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' का सिद्धांत लागू होता है. उमर खालिद दिल्ली दंगों की ‘साजिश’ रचने के आरोप में कई सालों से जेल में कैद हैं. 

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं देने वाली बेंच के फैसले पर असहमति जताई. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में माना था कि मौलिक अधिकार का उल्लंघन होने पर अदालतें ‘गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम’ (UAPA) से जुड़े मामलों  में जमानत दे सकती है. कोर्ट ने केएच नजीब मामले का जिक्र करते हुए कहा,

अंद्राबी को जिस न्यायिक सिद्धांत के तहत जमानत दी जा रही है, उसे 3 जजों की बेंच ने तय किया था. उमर खालिद के मामले में दो जजों की बेंच ने उस सिद्धांत का पालन नहीं किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

UAPA की धारा 43-D (5) आतंकवाद से जुड़े मामलों में जमानत देने पर सख्त प्रतिबंध लगाती है. लेकिन फिर भी ये प्रतिबंध अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को रद्द नहीं कर सकते. UAPA से जुड़े मामलों में भी 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है' का सिद्धांत लागू होता है. इसलिए केवल इसलिए जमानत से इनकार नहीं कर देना चाहिए, क्योंकि UAPA के तहत आरोप लगे हैं.

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जब कोई बड़ी बेंच फैसला सुना देती है तो छोटी बेंच को उसे मानना ही पड़ेगा. आजकल ऐसा देखा जा रहा है कि छोटी बेंच सीधे-सीधे इनकार तो नहीं करती, लेकिन घुमा-फिराकर बड़े फैसले के असर को कमजोर कर देती है.

सुप्रीम कोर्ट ने एक साल तक अपील पर रोक लगाई थी

इस साल 4 जनवरी को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. कोर्ट ने फैसले को रीव्यू करने से भी इनकार कर दिया था. कहा था कि दोनों आरोपी एक साल तक दिल्ली दंगे मामले में जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकते.

उमर खालिद दिल्ली दंगों के आरोप में 5 साल 3 महीने से जेल में हैं. उन्होंने जमानत के लिए निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक 6 बार याचिका लगाई है, लेकिन अब तक उनको राहत नहीं मिली है. दिल्ली में फरवरी 2020 में हिंसा भड़की थी, जिसमें 53 लोग मरे थे और 250 से ज्यादा घायल हुए थे. 

वीडियो: उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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