'धर्म बदला तो अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म', सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया
Supreme Court ने यह फैसला ऐसे मामले में दिया है, जिसमें एक शख्स ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गया. उसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून, 1989 (SC/ST Act) के तहत कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

भारत में एक अनुसूचित जाति के शख्स ने ईसाई धर्म अपना लिया, तो क्या उसे अनुसूचित जाति का दर्जा मिलता रहेगा? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है. सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई शख्स ईसाई धर्म अपनाता है और उसका पालन करता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा छिन जाएगा. कोर्ट ने कहा कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता और वह इस जाति से जुड़े आरक्षण का हकदार भी नहीं होगा.
24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने से अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से खत्म हो जाता है. जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए यह फैसला सुनाया.
लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
"संविधान, संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत कोई भी वैधानिक लाभ, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार उस व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता और ना ही वह उसका दावा कर सकता है, जिसे (संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के) क्लॉज 3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है. यह प्रतिबंध पूरी तरह से लागू होता है और इसमें कोई अपवाद नहीं है. कोई भी व्यक्ति एक ही समय पर क्लॉज 3 में बताए गए धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म को मान और अपना नहीं सकता, और साथ ही अनुसूचित जाति का सदस्य होने का दावा भी नहीं कर सकता."
सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला ऐसे मामले में दिया है, जिसमें एक शख्स ईसाई धर्म अपनाकर पादरी बन गया. उसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून, 1989 (SC/ST Act) के तहत कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था. शख्स ने आरोप लगाया था कि इन लोगों ने उसका उत्पीड़न किया और जातिगत टिप्पणी की.

आरोपियों ने इसे चुनौती दी और कहा कि ईसाई बनने के बाद शख्स SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दायर नहीं कर सकता. शख्स ने दलील दी कि वो माडिगा जाति से ताल्लुक रखता है और उसके पास तहसीलदार से जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र भी है. हालांकि, कोर्ट ने उसकी दलील नहीं मानी. अप्रैल 2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भी आदेश दिया था कि ईसाई बनने के बाद शख्स अनुसूचित जाति का दर्जा खो चुका है.
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