The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • Supreme Court Grants Bail To Undertrial Prisoner Detained For 9 Years Article 21

9 साल से जेल में था शख्स, SC ने कहा- 'ये आर्टिकल 21 का उल्लंघन, उसे जमानत का पूरा हक'

आरोपी ने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के में याचिका दायर की थी. लेकिन कोर्ट ने अर्जी को खारिज कर दिया था. इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पिछले 9 साल से भी ज्यादा समय से जेल में बंद है, वो भी विचाराधीन कैदी के तौर पर.

Advertisement
pic
28 मई 2026 (अपडेटेड: 28 मई 2026, 07:52 PM IST)
Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल से जेल में बंद विचाराधीन कैदी को दी जमानत. (फोटो- इंडिया टुडे)
Quick AI Highlights
Click here to view more

‘किसी भी विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता है. ऐसा करना उसके अनुच्छेद 21 के अधिकारों का उल्लंघन है.’ सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला उस वक्त दिया, जब दो जजों की बेंच हत्या के एक मामले में विचाराधीन कैदी की सुनवाई कर रही थी. वो पिछले 9 सालों से जेल में बंद था. कोर्ट ने अब उसे जमानत पर रिहा कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन कैदी ने अपनी रिहाई की याचिका दायर की थी. इस केस की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच कर रही थी. Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, विचाराधीन कैदी पर हत्या के आरोप में IPC की धारा 120B, 147, 148,  149 और 302 के तहत केस चल रहा है.

आरोपी ने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के में याचिका दायर की थी. लेकिन कोर्ट ने अर्जी को खारिज कर दिया था. इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता पिछले 9 साल से भी ज्यादा समय से जेल में बंद है, वो भी विचाराधीन कैदी के तौर पर.

वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि इस केस से जुड़े एक अन्य आरोपी को 29 अप्रैल 2026 को जमानत मिल गई है. लंबी बहस के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और विचाराधीन कैदी को भी जमानत दे दी.

बेंच ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को गलत समझा और विचाराधीन कैदी की जमानत याचिका खारिज कर दी. वो मामला ‘X बनाम राजस्थान’ से जुड़ा हुआ था, जिसमें शीर्ष अदालत ने एक शख्स की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. उस केस की सुनवाई में जस्टिस पारदीवाला भी शामिल थे.

हाई कोर्ट ने ऐसा मान लिया था ही हत्या जैसे मामले में एक बार केस शुरू होता है, तो उसे फैसले तक पहुंचने देना चाहिए और ऐसे मामलों में जमानत नहीं देनी चाहिए. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने उस फैसले को समझने में गलती की.

सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदी को जमानत देते हुए कहा कि अगर कोई आरोपी विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में 9 साल से भी ज्यादा समय से है, तो ये आर्टिकल 21 में निहित आजादी से जीने के अधिकार का उल्लंघन है. लिहाजा उसे जमानत मिलने का पूरा हक है.

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि हाई कोर्ट को किसी विचाराधीन कैदी के ‘शीघ्र सुनवाई के अधिकार’ पर भी विचार करना चाहिए.

वीडियो: आखिर अमेरिका क्यों नहीं चाहता की ईरान न्यूक्लियर पावर बने?

Advertisement

Advertisement

()