The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • Supreme Court granted First Passive Euthanasia Permits Withdrawal Of Life Support For Man In comma for 13 years harish rana

'इच्छा मृत्यु' की पहली बार मिली मंजूरी, हरीश राणा केस में फैसला सुनाते भावुक हो गए SC के जज

हरीश राणा की सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा, और ना ही आगे किसी सुधार की उम्मीद है, इसलिए उनका परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. बेटे की इच्छा मृत्यु की याचिका डाली. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 13 सालों से कोमा में पड़े हरीश को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी. यह फैसला लेना इतना मुश्किल था कि जज भी भावुक हो गए.

Advertisement
pic
11 मार्च 2026 (अपडेटेड: 11 मार्च 2026, 04:39 PM IST)
supreme court
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छा मृत्यु का अधिकार दे दिया है (PHOTO-India Today)
Quick AI Highlights
Click here to view more

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश राणा नाम के एक व्यक्ति को ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत दे दी है. हरीश राणा लगभग 13 सालों से कोमा में हैं. उनकी सांसें मशीन और दवाइयों के सहारे चल रही हैं. उनके माता-पिता कोर्ट के चक्कर काट रहे थे कि उनके बेटे को इच्छा मृत्यु दे दी जाए. कोर्ट ने मामले को समझा और देश के इतिहास में दर्ज होने वाला फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने 13 सालों से कोमा में पड़े हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है. यह फैसला लेना इतना मुश्किल था कि जज भी भावुक हो गए.

उन्होंने फैसला सुनाते हुए विलियम शेक्सपियर के नाटक 'हैमलेट' का प्रसिद्ध कथन 'टू बी और नॉट टू बी' को पढ़ा. इसका मतलब है कि जीवन में इतने संघर्ष होते हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता, जीवन को ऐसे ही जिया जाए या इसका अंत कर दिया जाए. इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने की. देश में इच्छामृत्यु का ये पहला केस है. आगे जानेंगे मामले का बैकग्राउंड क्या है? कोर्ट ने अपने स्टेटमेंट में क्या कहा? और यूथेनेशिया क्या होता है?

क्या है पूरी कहानी?

साल 2013 की बात है. उस समय हरीश राणा एक बिल्डिंग की चौथे फ्लोर से गिर गए थे. उस वक्त उनकी उम्र 20 साल थी. गिरने की वजह से उनके पूरे शरीर में पैरालिसिस हो गया और वह कोमा में चले गए. उनके शरीर ने हिलना-डुलना बंद कर दिया था. कोर्ट में जो मेडिकल रिपोर्ट्स पेश की गईं, उनके मुताबिक पिछले 13 सालों से एक ट्यूब (पाइप) के माध्यम से उन्हें खाना आदि दिया जाता है. चूंकि हरीश लंबे समय से बेड पर हैं इसलिए शरीर पर भी घाव हो गए हैं.

हरीश की सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा, और ना ही आगे किसी सुधार की उम्मीद है इसलिए उनका परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. बेटे की इच्छा मृत्यु की याचिका डाली. याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया इस तरह से की जानी चाहिए कि मरीज की गरिमा बनी रहे. इंडिया टुडे से जुड़ीं अनीषा माथुर की रिपोर्ट के मुताबिक, फैसला सुनाते हुए जस्टिस जेबी परदीवाला भावुक हो गए थे. बेंच ने अपने फैसले में क्या कहा, इसे प्वाइंट्स में समझते हैं. कोर्ट ने कहा, 

‘आज हमारा फैसला तर्क नहीं बल्कि प्रेम, दवाओं और विज्ञान को देखते हुए लिया गया है. रिपोर्ट बेहद दुखद है. हमारे लिए फैसला लेना मुश्किल था. हरीश के माता-पिता ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. हम इस केस से जुड़े वकीलों की भी प्रशंसा करते हैं, जिन्होंने संजीदगी से इसे संभाला. मरीज को AIIMS दिल्ली में भर्ती किया जाए. मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जाए. ताकि हरीश सिर्फ़ प्राकृतिक रूप से सांस ले सकें. निश्चित किया जाना चाहिए कि मृत्यु की प्रक्रिया गरिमा के साथ पूरी हो.’

इस मामले में याचिकाकर्ता हरीश के माता-पिता थे. उनकी ओर से उनके वकील मनीष जैन ने उनका पक्ष रखा. वकील मनीष जैन ने बताया,

‘किसी भी माता-पिता के लिए यह बहुत दुखद है. 13 साल से वो ऐसा होते हुए देख रहे थे, इसलिए वो सुप्रीम कोर्ट आए थे. सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 21 के मातहत हरीश राणा को इच्छा मृत्यु का अधिकार दे दिया है. अगले हफ्ते हरीश को एम्स में पहुंच जाएगा. वहां उनकी सारी ट्यूब्स वगैरह हटा दी जाएंगी. इसके बाद हरीश की नेचुरल डेथ हो जाएगी.’

यूथेनेसिया क्या है? 

इच्छा मृत्यु को ही अंग्रेजी में यूथेनेशिया कहते हैं. इसके दो तरीके होते हैं- एक्टिव यूथेनेशिया और पैसिव यूथेनेशिया. एक्टिव यूथेनेशिया में डायरेक्टली ऐसे एक्शन लिए जाते हैं, जिससे मरीज की मौत हो जाती है. ये एक अपराध है. दूसरी तरफ पैसिव यूथेनेशिया वो प्रक्रिया है जिसमें मरीज के मेडिकल सपोर्ट सिस्टम को हटा दिया जाता है. ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो. इसमें फीडिंग ट्यूब, वेंटिलेटर सिस्टम और CPR वगैरह हटा लिया जाता है. पैसिव यूथेनेशिया मरीज के परिवार और मेडिकल बोर्ड की रजामंदी से होता है. इसे लागू करने के लिए सख्त नियम होते हैं.

फैसले के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि इस फैसले को डिग्निटी यानी गरिमा के साथ लागू किया जाना चाहिए. जस्टिस विश्वनाथन ने संस्कृत का एक श्लोक पढ़ा, जिसमें चिंता और चिता यानी मृत्यु का विश्लेषण है. अमेरिकी दार्शनिक हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों को याद करते हुए जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, ‘ईश्वर किसी से ये नहीं पूछता कि उसे जीवन चाहिए या नहीं. इसमें कोई विकल्प नहीं होता. आपको इसे स्वीकार करना ही होता है. सवाल सिर्फ इतना है कि कैसे.’

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय विश्वविद्यालयों से क्या कहा?

Advertisement

Advertisement

()