The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • Supreme Court cji surya kant on uniform civil code shariat inheritance notice

'धर्म से कोई लेना-देना नहीं, यह संविधान का लक्ष्य...', CJI सूर्यकांत की UCC पर अहम टिप्पणी

Supreme Court की तीन जजों की पीठ एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताया गया था. इस पर CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?

Advertisement
pic
17 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 17 अप्रैल 2026, 03:10 PM IST)
Supreme Court
भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
Quick AI Highlights
Click here to view more

भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने गुरुवार, 16 अप्रैल को कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) एक ‘संवैधानिक लक्ष्य’ है. इसका किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताया गया था. सीजेआई की टिप्पणी यूसीसी पर चल रही राजनीतिक बहसों के बीच महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रिट याचिका आर्टिकल 32 के तहत वकील पौलोमी पावनी शुक्ला और 'न्याय नारी फाउंडेशन' नामक संगठन ने दायर की थी. CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने 16 अप्रैल को इस पर सुनवाई की. याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि उनका मानना ​​है कि सिविल कानून सभी धर्मों के लिए एक समान होना चाहिए. इस पर CJI ने सहमति जताई. प्रशांत भूषण ने आगे कहा,

"मैंने हमेशा यही कहा है और मैंने अपने मुस्लिम दोस्तों से भी कहा है कि UCC का विरोध न करें. उनमें से कई लोग UCC का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें डर है कि UCC के नाम पर उन पर हिंदू सिविल कोड थोप दिया जाएगा. मैंने हमेशा कहा है कि सिविल कानून सभी धर्मों के लोगों के लिए हमेशा एक समान होने चाहिए."

वकील भूषण ने कहा कि यह कहना कि महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, भेदभावपूर्ण है. यह एक सिविल केस है और आर्टिकल 25 के तहत यह कोई धार्मिक प्रथा नहीं है.

भूषण ने कहा कि वसीयत के जरिए उत्तराधिकार के मामलों में भी, कोई भी मुस्लिम अपनी संपत्ति के 1/3 से ज्यादा हिस्से की वसीयत नहीं कर सकता. इस तरह उन्हें अपनी खुद की कमाई हुई संपत्ति पर भी कंट्रोल से वंचित कर दिया जाता है. नोटिस जारी करते हुए, बेंच ने इस याचिका को कुछ अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया, जिनमें इसी तरह के सवाल उठाए गए थे.

दरअसल, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के आधार पर संपत्ति का बंटवारा इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर होता है. यह सामान्य नागरिक कानूनों (जैसे इंडियन सक्सेशन एक्ट) से काफी अलग है. इसे दो तरह से समझा जा सकता है. 

पहला- विरासत: जब किसी मुस्लिम व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत किए होती है, तो संपत्ति का बंटवारा शरीयत के निश्चित नियमों के मुताबिक होता है. संपत्ति मुख्य रूप से पति/पत्नी, माता-पिता और बच्चों के बीच बांटी जाती है. इसमें कुल 12 श्रेणियों के कानूनी उत्तराधिकारी होते हैं. शरीयत के तहत आमतौर पर बेटे को बेटी की तुलना में दोगुना हिस्सा मिलता है. तर्क यह दिया जाता है कि पुरुषों पर परिवार के भरण-पोषण की वित्तीय जिम्मेदारी होती है. 

दूसरा- वसीयत: शरीयत कानून एक व्यक्ति को अपनी पूरी संपत्ति अपनी मर्जी से किसी को भी देने की अनुमति नहीं देता. एक मुसलमान अपनी कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई (1/3) हिस्सा ही वसीयत के जरिए अपनी पसंद के व्यक्ति (जो उन 12 श्रेणियों में कानूनी उत्तराधिकारी न हो) को दे सकता है. बाकी दो-तिहाई (2/3) संपत्ति का बंटवारा अनिवार्य रूप से ऊपर बताए गए विरासत नियमों के अनुसार ही होगा.

सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर हुई है, वह मुख्य रूप से विरासत में महिलाओं को मिलने वाले कम हिस्से और 1/3 वसीयत की सीमा को चुनौती देती है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये नियम भारतीय संविधान द्वारा दिए गए 'समानता के अधिकार' का उल्लंघन करते हैं. 

वीडियो: यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बहस, नेतानगरी में वकील शाहिद अली पीएम मोदी पर ये बोल गए!

Advertisement

Advertisement

()