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जनहित याचिका डालने की व्यवस्था बंद होगी? SC में सरकार ने बयान से यही लगता है

इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत देते हुए कहा कि अभी इस ओर जाने की कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि, कोर्ट PILls एक्सेप्ट करने से पहले काफी सतर्कता अपनाती हैं. NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से इस मामले की पैरवी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे थे. वहीं, मामले में 9 जजों की बेंच कर रही थी.

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9 अप्रैल 2026 (पब्लिश्ड: 12:11 AM IST)
Supreme Court
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में PILs को पूरी तरह से हटा देने की मांग की. (फोटो- इंडिया टुडे)
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सरकार क्या PIL यानी जनहित याचिकाओं को बंद करने पर विचार कर रही है? दरअसल, गुरुवार 9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर से जुड़े केस की सुनवाई चल रही थी. इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से मामले की पैरवी कर रहे वकील ने जनहित याचिकाओं की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि जनहित याचिकाओं को बंद करने का समय आ गया है. इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी ऐसा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि, कोर्ट जनहित याचिका स्वीकार करने में काफी सतर्क रहती है. 

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से इस मामले की पैरवी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कर रहे थे. सुनवाई 9 जजों की बेंच कर रही थी. मामला सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिकाओं का था. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच से यह अपील की गई कि वो पीआईएल की प्रासंगिकता पर उनके लिखित तर्कों पर ध्यान दें. इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित तर्क में कहा था कि अब समय आ गया है कि PIL की अवधारणा को ही खत्म कर दिया जाए. सरकार ने अपनी अपील में लिखा,

अब वक्त आ गया है कि जनहित याचिकाओं (PIL) को या तो ठीक से दोबारा व्यवस्थित किया जाए. या फिर बंद ही कर दिया जाए. क्योंकि PIL उस समय के लिए बनाई गई थी जब देश के बहुत से लोग गरीबी, अशिक्षा, विकलांगता, हिरासत, मजबूरी या सिस्टम की कमी की वजह से खुद कोर्ट नहीं जा पाते थे.

इस दौरान मेहता ने 'बंधुआ मुक्ति मोर्चा' मामले का भी हवाला दिया और कोर्ट में कहा कि PIL की शुरुआत उस समय हुई थी, जब न्याय तक पहुंच बहुत सीमित थी. आज  के समय में लोग सीधे कोर्ट का रुख कर सकते हैं. साथ ही कहा कि ‘आज तो एक चिट्ठी भी कोर्ट पहुंच सकती है.’ केंद्र सरकार के सवालों का जवाब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दिया. उन्होंने कहा,

‘हाल के समय में अदालतें PIL को स्वीकार करने के मामले में बहुत अधिक सतर्क हो गई हैं. इसका जवाब बहुत आसान है. आजकल और 'आजकल' का मतलब सिर्फ पिछले कुछ साल नहीं है. ये अदालतें खुद PIL (जनहित याचिका) स्वीकार करने में बहुत, बहुत ज्यादा सावधानी बरत रही हैं. हमने उन्हें जांचने के लिए कुछ पैमाने तय किए हैं. हर दिन हम असली वजह की जांच करते हैं. अब जब हम किसी PIL की जांच करते हैं तो कई बातों का ध्यान रखते हैं.’

मुख्य न्यायाधीश ने मेहता से आगे कहा कि अगर आप कोर्ट नंबर 1 में बैठे तो आपने देखा होगा कि हम असल में कितनी PIL स्वीकार करते हैं. नोटिस तभी जारी किए जाते हैं, जब याचिका में कोई दम हो. शायद 2006 से अब तक, यानी 2026 तक इन दो दशकों में हालात बदले हैं. अदालत ज्यादा सतर्क हो गई है.”

बता दें कि कोर्ट में यह मामला उस वक्त उठाया गया, जब सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सबरीमाला मामले में उन याचिकाओं की एक्सेप्टेंस पर सवाल उठाया, जिन्हें उन लोगों ने दायर किया था, जो भक्त नहीं थे. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि मूल रिट याचिकाकर्ता भगवान अयप्पा के भक्त नहीं थे, और उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी याचिकाएं शायद स्वीकार करने लायक थीं ही नहीं.

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