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CJI सूर्यकांत ने सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ 'हेट स्पीच' की सुनवाई से इनकार क्यों किया?

Himanta hate speech video: सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हिमंता बिस्व सरमा के खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें उनके कथित नफरती बयानों पर कार्रवाई करने की मांग की गई थी.

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16 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 16 फ़रवरी 2026, 11:52 PM IST)
assam cm hate speech,point blank shot video row
हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया. (India today)
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Himanta Biswa Sarma hate speech Case: असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) के खिलाफ ‘हेट स्पीच’ का मामला सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ये कहते हुए लौटा दिया कि वो पहले हाई कोर्ट जाएं. शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि आजकल ये आदत बनती जा रही है कि मामले हाई कोर्ट को बायपास करके सीधे सुप्रीम कोर्ट लाए जा रहे हैं. इससे हाई कोर्ट के जजों का मनोबल गिरता है. 

अपील करने वालों ने दलील दी कि ये मामला संवैधानिक पद की शपथ के उल्लंघन से जुड़ा है और इस पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई होनी चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलील नहीं मानी. हालांकि, अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के जजों से आग्रह किया कि वो इस मामले को तेजी से सुनें. 

ये मामला सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के उस वीडियो को लेकर भी था, जिसे असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किया गया था. इस वीडियो में वह मुस्लिम दिखने वाले कुछ लोगों को बंदूक से निशाना बना रहे थे. विरोध और आलोचना के बाद ये वीडियो डिलीट कर दिया गया था. लेकिन इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ याचिका दाखिल की गई थी. इसमें उनके कथित नफरती बयानों पर कार्रवाई करने की मांग की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और अपीलकर्ताओं को हाई कोर्ट जाने के लिए कह दिया. भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने अपने आदेश में कहा,

इन सभी मुद्दों को हाई कोर्ट में निपटाया जा सकता है. यहां इन्हें सुनने की कोई वजह नहीं दिखती. ऐसे में याचिकाकर्ताओं को हम उनके क्षेत्रीय हाई कोर्ट में भेज रहे हैं. साथ ही हाई कोर्ट के जज से आग्रह करते हैं कि वो इन मामलों में तेजी से सुनवाई करें. 

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि ये मामला केवल अपराध करने से संबंधित नहीं है, बल्कि इसमें संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन भी शामिल है. ऐसे में अनुच्छेद-32 लागू करने के लिए यह सबसे सही मामला है और हाई कोर्ट में इसका समाधान नहीं हो सकता. 

जवाब में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हाई कोर्ट के अधिकारों को ऐसे कमजोर नहीं किया जाना चाहिए. अब यह एक चलन बन गया है कि हर केस सुप्रीम कोर्ट में जाकर खत्म होता है. हाई कोर्ट के जजों का मनोबल नहीं गिराया जाना चाहिए.

इस पर सिंघवी ने हिमंता बिस्वा सरमा के कई विवादित बयानों का हवाला देते हुए कहा और उन्हें ‘आदतन अपराधी' तक कह दिया. वरिष्ठ वकील ने कहा कि इसलिए सीएम सरमा से संबंधित मामले में अनुच्छेद 32 के तहत दखल जरूरी है. सिंघवी ने कहा, 

अगर देश का संवैधानिक और सामाजिक ताना-बाना खतरे में है तो क्या अनुच्छेद 32 लागू नहीं किया जाना चाहिए? वह (सरमा) खुलेआम एक पूरे समुदाय के खिलाफ बोल रहे हैं.

बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 32 देश के किसी भी नागरिक को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है.

वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट को 17 ऐसे मामलों के बारे में बताया जो इतने सीरियस नहीं थे, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों पर सीधे सुनवाई की. वो भी बिना हाई कोर्ट गए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलील नहीं मानी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,

पूरा प्रयास हाई कोर्ट का मनोबल गिराने का है. हाई कोर्ट को कमजोर करने की यह एक सोची-समझी साजिश है. हम सिर्फ शॉर्टकट तरीके का विरोध कर रहे हैं. हाई कोर्ट का सम्मान करें. व्यवस्था में भरोसा रखें. हमें पूरा विश्वास है कि हाई कोर्ट इस मामले को सिद्धांतों के अनुसार निपटाएगा.

अपीलकर्ताओं के वकील चंदर उदय सिंह ने CJI से कहा कि उन्होंने गुवाहाटी हाई कोर्ट को चिट्ठी लिखकर ऐसे मामलों में स्वतःसंज्ञान लेने को कहा था, लेकिन कोई एक्शन नहीं हुआ. इस पर चीफ जस्टिस ने जवाब दिया कि चिट्ठी लिखना और याचिका दायर करना दो अलग बाते हैं.

कॉमेंट करने से भी इनकार

जब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका लेने से इनकार कर दिया तो अपीलकर्ताओं ने आग्रह किया कि वह संवैधानिक पदाधिकारियों को अपने बयानों में संयम बरतने के लिए कह दें. लेकिन सीजेआई ने इससे भी इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हम इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते क्योंकि हमने फैसला किया है कि ये मामला हाई कोर्ट में जाना चाहिए. यही व्यवस्था है और हमें इसका सम्मान करना चाहिए.

किसने दाखिल की थी याचिका?

पीठ तीन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दो याचिकाएं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) की ओर से दायर की गई थीं. तीसरी याचिका 4 असमियां व्यक्तियों ने दाखिल की थीं. इनमें रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. हिरेन गोहेन, असम के पूर्व पुलिस महानिदेशक हरेकृष्ण डेका, नॉर्थईस्ट नाउ के प्रधान संपादक परेश चंद्र मलाकर और वरिष्ठ वकील शांतनु बोरठाकुर शामिल थे. 

उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बार-बार ऐसे बयान दिए हैं जो असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार और हिंसा को भड़काते हैं.

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