सुपर अल नीनो 2026 इफेक्ट: दिल्ली में पड़ेगी भीषण गर्मी? मानसून पर भी होगा असर
Super El Nino 2026: साल के दूसरे भाग में एक बहुत ही शक्तिशाली अल-नीनो शुरू होने की संभावना है, जो पूरी दुनिया में गर्मी बढ़ा देगा. भारत पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा. सिर्फ गर्मी ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि मानसून भी सामान्य से कम रहने का अनुमान है. अल नीनो की वजह से बारिश में देरी या कमी हो सकती है.

साल 2026 पृथ्वी का अब तक का सबसे गर्म साल साबित होगा. यह कहना है अमेरिका के जाने-माने जलवायु वैज्ञानिक डॉ. जेम्स हैनसन का. उनका मानना है कि 2026 का ग्लोबल टेंपरेचर, 2024 के रिकॉर्ड (जो अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है) को पीछे छोड़ देगा. 2026 के दूसरे भाग में एक बहुत ही शक्तिशाली अल-नीनो शुरू होने की संभावना है, जो पूरी दुनिया में गर्मी बढ़ा देगा. भारत पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा. प्रचंड गर्मी पड़ेगी और मानसून भी सामान्य से कम (92%) रहने का अनुमान है. अल नीनो की वजह से बारिश में देरी या कमी हो सकती है.
मई 2026 की शुरुआत में ही दिल्ली का तापमान 42.8°C रिकॉर्ड किया जा चुका है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही दिल्ली सहित 11 राज्यों के लिए हीटवेव का अलर्ट जारी किया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जून से अगस्त 2026 के बीच अल नीनो एक्टिव होने की संभावना 62% है, जो अक्टूबर तक 80% तक बढ़ सकती है. इसकी वजह से दिल्ली और उत्तर भारत के राज्यों में पारा 45°C से 48°C तक जा सकता है.
जेम्स हैनसन कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं. उन्होंने 1988 में अमेरिकी कांग्रेस को पहली बार चेतावनी दी थी कि इंसान धरती को गर्म कर रहे हैं. उनकी अब तक की ज्यादातर चेतावनियां सही साबित हुई हैं. अब उनकी नई रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 न सिर्फ 2024 का रिकॉर्ड तोड़ेगा बल्कि 2027 और भी गर्म हो सकता है.
पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक 'खतरे की रेखा' तय की थी, जो है 1.5°C. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर धरती का औसत तापमान इस सीमा को पार कर गया, तो मौसम का चक्र इतना बिगड़ जाएगा कि उसे सुधारना नामुमकिन होगा (जैसे ग्लेशियरों का पूरी तरह पिघलना, समुद्र का स्तर बढ़ना और भयानक लू चलना).
डॉ. हैनसेन ने डेटा के जरिए यह दिखाया है कि 2015 के बाद से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार लगभग दोगुनी होकर 0.31°C प्रति दशक हो गई है और हम 1.5°C की सीमा को बहुत तेजी से पार कर रहे हैं. 1970 से 2010 के बीच धरती के गर्म होने की रफ्तार लगभग 0.18°C प्रति दशक (हर 10 साल में) थी.

आसान भाषा में समझें तो अल-नीनो समुद्र और हवा के बीच होने वाला एक ऐसा बदलाव है, जिसकी वजह से दुनिया भर का मौसम बिगड़ जाता है. भारत पर इसका कैसे असर पड़ता है? इसे चार प्वाइंट्स में समझते हैं.
समुद्र का गर्म होना: सामान्य दिनों में, प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की गर्म हवाएं और नमी भारत की ओर आती हैं, जो मानसून लाने में मदद करती हैं. लेकिन अल-नीनो के समय ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी वहीं रुक जाता है. इससे नमी और बादल भारत की तरफ आने के बजाय उल्टी दिशा में यानी अमेरिका की तरफ खिंचे चले जाते हैं.
हवा का दबाव (Pressure) बिगड़ना: मानसून के लिए जरूरी है कि भारत के ऊपर 'कम दबाव' (Low Pressure) का क्षेत्र बने ताकि वह समुद्र से ठंडी और नमी वाली हवाओं को अपनी ओर खींच सके. लेकिन अल नीनो इस दबाव के चक्र को बिगाड़ देता है, जिससे मानसूनी हवाएं भारत तक पहुंचने से पहले ही कमजोर पड़ जाती हैं.
नमी में कमी: चूंकि ज्यादातर नमी और गर्मी प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में जमा हो जाती है, इसलिए हिंद महासागर से उठने वाली मानसूनी हवाओं को उतनी ताकत नहीं मिल पाती. नतीजतन, बादल तो बनते हैं लेकिन उनमें उतनी बारिश नहीं होती जितनी होनी चाहिए.
मौसम पर असर: इस गर्मी की वजह से पूरी दुनिया के मौसम का चक्र बदल जाता है. भारत में इसकी वजह से अक्सर मानसून कमजोर हो जाता है और सूखा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. जबकि अमेरिका जैसे देशों में इसकी वजह से भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है.
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के मुताबिक, प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति मई से जुलाई 2026 के बीच बनना शुरू हो सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह अल-नीनो अक्टूबर और नवंबर 2026 के दौरान अपने चरम (Peak) पर होगा, जिसे ‘सुपर अल-नीनो’ कहा जा रहा है.
वीडियो: गर्मी में एसी का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो ये वीडियो आपको देखना चाहिए

