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राजा रवि वर्मा की ‘यशोदा और कृष्ण’ पेंटिंग को किसने 167 करोड़ में खरीदा?

Raja Ravi Varma Yashoda and krishna painting: चित्रकार राजा रवि वर्मा की ‘यशोदा और कृष्ण’ ऑयल पेंटिंग ने इतिहास रच दिया है. ये पेटिंग एक नीलामी में 167.20 करोड़ रुपये की शानदार कीमत पर बिकी है. जिसके साथ ही ये सबसे ऊंची कीमत पर बिकने वाली पहली भारतीय कलाकृति बन गई है.

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2 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 2 अप्रैल 2026, 06:15 PM IST)
Raja Ravi Varma Yashoda and krishna painting
‘यशोदा और कृष्ण’ ऑयल पेंटिंग ने इतिहास रच दिया है. (फोटो-इंडिया टुडे)
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चित्रकार राजा रवि वर्मा की एक ऑयल पेंटिंग ‘यशोदा और कृष्ण’ ने इतिहास रच दिया है. ये पेटिंग मुंबई में सैफ्रनआर्ट की स्प्रिंग लाइव नीलामी में 167.20 करोड़ रुपये की शानदार कीमत पर बिकी है. इसके साथ ही ये सबसे ऊंची कीमत पर बिकने वाली पहली भारतीय कलाकृति बन गई है.

‘यशोदा और कृष्ण’ पेंटिंग पहले दिल्ली के एक प्राइवेट कलेक्शन में रखी थी. जिसकी 1 अप्रैल को मुंबई में नीलामी हुई. माना जा रहा था कि ये तस्वीर 80 करोड़ से 120 करोड़ रुपये की कीमत में बिक सकती है. लेकिन 7 मिनट चली बोली में ये 167.20 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड कीमत पर बिकी. पेंटिंग को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक साइरस पूनावाला ने खरीदा.

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पूनावाला ने कहा, ‘यह खरीदारी मेरे लिए सम्मान और कर्तव्य दोनों हैं. इस राष्ट्रीय धरोहर को समय-समय पर आम लोगों के देखने के लिए अवेलेबल कराया जाना चाहिए. मैं ऐसा करने की कोशिश करूंगा’. सैफ्रनआर्ट की प्रेसिडेंट और सह-संस्थापक मीनल वजीरानी ने इसे एक 'ऐतिहासिक पल' बताया.

रवि वर्मा की पेटिंग से पहले सबसे महंगी आर्ट का रिकॉर्ड एम.एफ. हुसैन की 1954 की 'Untitled (Gram Yatra)' के नाम था. जिसे पिछले साल दिल्ली के रहने वाले किरण नादर ने 118 करोड़ रुपये से अधिक में खरीदा था.

क्या है 'यशोदा और कृष्ण' पेंटिंग में?

राजा वर्मा ने 'यशोदा और कृष्ण' पेंटिंग 1890 में बनाई थी. जब वे अपने करियर में काफी अच्छा कर रहे थे. इस पेंटिंग को उनके सबसे बेहतरीन कामों में से एक माना जाता है. पेंटिंग में यशोदा को गाय का दूध निकालते हुए दिखाया गया हैं, जबकि नन्हे कृष्ण पीछे से दूध का प्याला लेने की कोशिश कर रहे हैं. तस्वीर में मां के प्यार का एक कोमल और गहरा चित्रण किया गया है.

कौन हैं राजा रवि वर्मा?

राजा रवि वर्मा का जन्म 1848 में त्रावणकोर के कुलीन किलिमानूर परिवार में हुआ था. ऑयल पेंटिंग को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें ही जाता है. वे यूरोपीय अकादमिक रियलिज्म को भारतीय मायथॉलॉजी के साथ जोड़ने के लिए भी जाने जाते हैं. कैनवास से अलग 1894 में उन्होंने एक लिथोग्राफिक प्रेस शुरू किया था. ताकि वे अपनी पेंटिंग्स को सस्ती प्रिंट्स के रूप में बड़े पैमाने पर तैयार कर सकें. 

इस तरह उन्होंने पहली बार हिंदू देवी-देवताओं की छवियों को आम भारतीयों के घरों तक पहुंचाया. उनकी कई पेंटिंग्स दिल्ली स्थित नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (NGMA) में आज भी सुरक्षित रखी हैं.

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