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किसी को पैसे की तंगी, कोई बेरोजगार... सेप्टिक टैंक साफ़ करने उतरे तीन मजदूर, 2 मिनट के अंदर मौत

रायपुर में ये तीन मजदूर उन 10 लोगों के एक ग्रुप का हिस्सा थे, जिन्होंने एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक की सफाई का काम अपने हाथ में लिया था. लेकिन उन तीनों में से कोई भी मैनहोल से जिंदा बाहर नहीं निकला.

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23 मार्च 2026 (अपडेटेड: 23 मार्च 2026, 08:50 AM IST)
raipur Three workers died while cleaning a hospital septic tank.
सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान तीन मजदूरों की मौत हो गई. (सांकेतिक फोटो: आजतक)
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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान तीन मजदूरों की मौत हो गई. ये तीन लोग उन 10 लोगों के ग्रुप का हिस्सा थे, जिन्होंने एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक की सफाई का काम अपने हाथ में लिया था. इसके लिए उन्हें 7,000 रुपये मिलने थे. लेकिन उन तीनों में से कोई भी मैनहोल से जिंदा बाहर नहीं निकला. मृतकों की पहचान प्रशांत कुमार (26), गोविंद सेंद्रे (35) और अनमोल माचखंड (32) के तौर पर हुई है. ये सभी नगर पालिका के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले सफाईकर्मी थे.

सेवक कुमार (32) ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने अपने छोटे भाई प्रशांत को सेप्टिक टैंक के अंधेरे मैनहोल में जाते हुए देखा था, ताकि वह उन दो लोगों (गोविंद और अनमोल) को बचा सकें जो उनसे पहले अंदर गए थे. प्रशांत सेवक और सत्यम (30) का सगा भाई था और ये सभी अनुसूचित जाति से आते थे. ये उन 10 लोगों में शामिल थे, जिन्होंने सेप्टिक टैंक की सफाई का काम अपने हाथ में लिया था. पुलिस के मुताबिक, यह टैंक लगभग 20 फीट गहरा, 15 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा था. इनमें से तीन फीट तक ठोस कचरा भरा हुआ था.

सेवक, सत्यम और प्रशांत कभी स्कूल नहीं गए और रायपुर नगर निगम के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर सफाईकर्मी का काम करते हैं. उनमें से हर कोई अपने कॉन्ट्रैक्टर के जरिए महीने के 7,500 रुपये कमाता है. सेवक ने बताया, 

“7,500 रुपये के अलावा, हमारा कॉन्ट्रैक्टर हमारे प्रोविडेंट फंड खाते में लगभग 1,000-1,500 रुपये जमा करता है. हम (नगर निगम के लिए) सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक काम करते हैं, और उसके बाद हम खुद से काम ढूंढ़ते हैं. ऐसे दिन बहुत कम होते हैं जब हम 400 से 500 रुपये कमाते हैं. कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब हमारे पास कोई काम नहीं होता और कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब हम 150-200 रुपये ही कमा पाते हैं.”

रिपोर्ट के मुताबिक, जब उनके कॉन्ट्रैक्टर ने उन्हें अस्पताल में सेप्टिक टैंक साफ करने का काम दिया, तो उन्हें लगा कि यह जल्दी पैसे कमाने का तरीका है जिससे वे उतने पैसे कुछ ही समय में कमा लेंगे, जितने कमाने में उन्हें आम तौर पर कई दिन लग जाते. इसलिए, उन भाइयों ने वह जोखिम उठाने का फैसला किया, जिसे दूसरे लोगों ने मना कर दिया था. सेवक ने कहा, 

"हमने पहले भी सेप्टिक टैंक साफ किए थे, लेकिन उनमें से कोई भी 10 फीट से ज्यादा गहरा नहीं था."

उस दिन, उनके सहकर्मियों में से एक गोविंद सबसे पहले मैनहोल के रास्ते अंदर गए, उनके बाद अनमोल गए. सेवक ने बताया,

“गोविंद सीढ़ी से नीचे उतरे, लेकिन टंकी में बहुत जहरीली गैसें थीं और वे गिर गए. अनमोल अंदर गए, लेकिन वे भी गिर गए. फिर मेरा भाई अंदर गया और वह भी गिर गया. यह सब एक-दो मिनट में हो गया.” 

बाकी लोगों को एहसास हुआ कि उनके पीछे जाना बहुत खतरनाक होगा. सेवक ने कहा, "हम सबने एक-दूसरे को कसकर पकड़ लिया, रोते हुए खुद को पानी में कूदने से रोका."

प्रशांत कुमार की शादी नहीं हुई थी. जबकि अनमोल अपने पीछे अपनी पत्नी और चार महीने के बेटे को छोड़ गए हैं. अनमोल को सेप्टिक टैंक साफ करने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन वह हाल ही में बेरोज़गार हुए थे, इसलिए उन्हें मजबूरी में यह काम करना पड़ा. उनकी पत्नी ने इस बात पर अपना गुस्सा जाहिर किया कि मजदूरों को सही उपकरण नहीं दिए गए थे.

जिन तीनों लोगों की मौत हुई, वे सब भी अनुसूचित जाति से थे. पुलिस ने उनके ठेकेदार, किशन सोनी और अस्पताल के मैनेजमेंट के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है.

ये भी पढ़ें: सीवर साफ करने उतरे दो मजदूरों की दम घुटने से मौत, राजधानी दिल्ली की घटना

1993 से ही भारत में हाथ से मैला ढोने पर रोक लगाने वाला कानून मौजूद है. 2013 से कानून के तहत मालिकों के लिए यह जरूरी है कि वे सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई में लगे मजदूरों को 44 तरह के सुरक्षा उपकरण मुहैया कराएं. द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि पिछले पांच सालों में (2021 से 2025 तक) देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय कुल 315 लोगों की मौत हुई. इनमें सबसे ज्यादा 53 मौतें महाराष्ट्र में हुईं, जिसके बाद हरियाणा में 43 मौतें दर्ज की गईं.

हर लिहाज से यह एक कम करके बताया गया अनुमान है. कई स्वतंत्र सर्वेक्षणों में इस बात का जिक्र किया गया है कि राज्य सरकारें यह मानने में लगातार आनाकानी करती हैं कि उनकी देखरेख में भी यह गैर-कानूनी काम आज भी जारी है. लोग बार-बार सवाल उठाते रहे हैं कि जब इस तरह की सफाई के लिए मशीनों की व्यवस्था की जा सकती है, तो लोगों को सीवर और सेप्टिक टैंक्स में क्यों उतारा जाता है?

वीडियो: सीवर-सेप्टिक टैंकों की सफाई में लगे किस समुदाय से?

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