एमएम नरवणे की जो किताब छपी ही नहीं वो राहुल गांधी के पास कैसे आई?
पिछले हफ्ते नरवणे की किताब एकदम छपी-छपाई राहुल गांधी के हाथ में दिखी. संसद भवन के बाहर राहुल गांधी के हाथ में लहराती वह कोई पांडुलिपि नहीं थी. वह एक हार्डबाउंड असली किताब थी.
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ये साल 2024 की बात है. पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की ‘आत्मकथा’ वाली किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars Of Destiny) छपने वाली थी. किताब के विमोचन की डेट भी फाइनल हो गई थी. लोगों ने प्री-बुकिंग भी शुरू कर दी, लेकिन तभी इसका विमोचन रोक दिया गया. इस घटना के दो साल हो गए लेकिन आज तक ये किताब छप नहीं पाई है. वजह बताई गई कि रक्षा मंत्रालय किताब का रिव्यू कर रहा है. वहां से मंजूरी मिलेगी, उसके बाद ही किताब बाजार में आ पाएगी.
लेकिन, पिछले हफ्ते नरवणे की वही किताब एकदम छपी-छपाई राहुल गांधी के हाथ में दिखी. संसद भवन के बाहर राहुल गांधी के हाथ में लहराती वह कोई पांडुलिपि नहीं थी बल्कि एक हार्डबाउंड असली किताब थी, जिसे छापने के लिए अभी तक तो रक्षा मंत्रालय ने अपनी मंजूरी नहीं दी है.
दरअसल, 2 फरवरी 2026 को संसद के बजट सत्र के दौरान राहुल गांधी ने जनरल नरवणे की ‘अप्रकाशित’ किताब पर आधारित एक पत्रिका में छपे लेख का सदन में जिक्र कर हंगामा मचा दिया था. राहुल गांधी 5 मिनट से भी कम समय बोले थे. लेकिन इसी दौरान उनकी स्पीच पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह समेत कई भाजपा सांसदों ने आपत्ति जता दी.
राहुल गांधी ‘कारवां पत्रिका’ में छपे लेख के आधार पर जिस किताब के अंश को कोट कर रहे थे, उसे लेकर सत्ता पक्ष के सांसदों ने उन पर काफी तीखे हमले किए.
राजनाथ सिंह ने पूछा, ‘क्या वह किताब प्रकाशित हो चुकी है जिसमें ये सब बातें लिखी हैं? अगर प्रकाशित हो चुकी है तो उनका उल्लेख करिए. अगर प्रकाशित नहीं हुई है तो उनका जिक्र करना उचित नहीं है.’

राजनाथ सिंह के इस सवाल के बाद दो दिनों के अंदर राहुल गांधी वही किताब लेकर संसद में हाजिर हो गए, जिसके न छपने का दावा बहुत जोर-शोर से राजनाथ सिंह ने किया था. जनरल नरवणे के ‘अप्रकाशित’ संस्मरण 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' की एक प्रति लहराते हुए उन्होंने कहा कि वह इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गिफ्ट में देना चाहते हैं.
अब सवाल है कि जिस किताब के बारे में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में साफ-साफ कहा था कि ऐसी किसी किताब का अस्तित्व ही नहीं है. ऐसी कोई किताब छपी ही नहीं है, वो राहुल गांधी के पास कहां से और कैसे आ गई?
किसी भी सैन्य अधिकारी की लिखी किताब को प्रकाशित होने से पहले उसकी पांडुलिपि या ट्रांसस्क्रिप्ट को रक्षा मंत्रालय के पास अप्रूवल के लिए भेजा जाता है. जिस पत्रिका में इस किताब के अंश छपे हैं, उसके पास भी पुस्तक की हार्ड कॉपी नहीं थी बल्कि उसे किताब की पांडुलिपि ही मिली थी.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 और 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय के पास कुल 35 ऐसी पुस्तकें पहुंची थीं, जो सेना से जुड़े लोगों ने लिखी हैं. इनमें से 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' एकमात्र ऐसी पांडुलिपि है जिसे मंजूरी अभी तक नहीं मिली है. ऐसे में राहुल गांधी के पास हार्डकवर वाली छपी-छपाई किताब आने का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है.
क्या बिना मंजूरी के इस किताब को प्रकाशक ने छाप दिया?
किताबों की जो पांडुलिपियां होती हैं, उसे आमतौर पर सॉफ्ट कॉपी यानी पीडीएफ या डॉक्युमेंट फाइल के रूप में आगे बढ़ाया जाता है. इसे हार्डकॉपी यानी असली किताब में बदलने के लिए टाइप की गई पांडुलिपि को प्रिंट और फिर बाइंड करना होता है. इसमें इन्वेस्टमेंट की जरूरत होती है. अगर किताब में छोटे-मोटे बदलाव भी करने होते हैं तो इसके लिए किताब का पुनर्मुद्रण यानी फिर से छपाई की जाती है. यही वजह है कि ज्यादातर प्रकाशक पांडुलिपियों को अंतिम मंजूरी मिलने के बाद ही उसे छापाखाने में भेजते हैं.
यहां ये सवाल है कि क्या पेंगुइन इंडिया ने बिना मंजूरी का इंतजार किए ही किताबें छपने के लिए भेज दी थीं? और क्या किताबें छपकर दुकानों तक भी पहुंच गई थीं? क्योंकि 2024 में इस किताब का विमोचन होना था और 2023 से ही इसकी प्रीबुकिंग शुरू हो गई थी.
इंडिया टुडे डिजिटल ने पुष्टि की है कि जनरल नरवणे की किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' की छपी हुई प्रतियां दिल्ली के बुकस्टोर्स तक पहुंच गई थीं, लेकिन बाद में उन्हें वापस मंगा लिया गया था. पब्लिकेशन इंडस्ट्री के एक व्यक्ति का दावा है कि उसने दिल्ली के एक बुकस्टोर में 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' बिकने के लिए रखी देखी थीं.
इंडिया टुडे ग्रुप की पॉलिटिकल एडिटर मौसमी सिंह ने कांग्रेस के सूत्रों के हवाले से दावा किया कि राहुल गांधी को ये किताब लेखक से ही मिली थी, लेकिन यह किताब किसी को दिखाने या देने के लिए नहीं थी. राहुल गांधी के साथ बीते दिनों ऐसी परिस्थितियां बनीं कि उन्हें वो किताब सामने लानी पड़ी. वह सदन में जो कहना चाहते थे, वह बिना इस किताब को सामने लाए नहीं बोल सकते थे.
छपी किताब को लेकर इंडिया टुडे डिजिटल ने फोन कॉल और ईमेल के जरिए पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन प्रकाशन के कर्मचारियों ने एमएम नरवणे की किताब के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
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