पावर कट से आप परेशान और पड़ोसी को बिक रही आपके सूबे की बिजली? समझिए पूरा 'ग्रिड गेम'
Power grid politics: देश में चिलचिलाती गर्मी के बीच एक तरफ आम जनता भारी बिजली कटौती से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकारें पड़ोसी सूबों को बिजली बेच रही हैं. क्या है राज्यों के बीच छिड़ा ये 'पावर ग्रिड' विवाद, जिसने सबकी नींद उड़ा रखी है.

गर्मी का मौसम है, पारा 45 डिग्री से भी पार जाने के छटपटा रहा है. हीट वेव कहर बनकर इंडियावालों पर बरस रहा है. अगर कोई कसर बाकी थी तो आये दिन होने वाली बिजली कटौती (Power Cuts) ने पूरी कर दी है. इस झुलसती हुई गर्मी में बाहर तो छोड़िये. घर के अंदर भी बिना एसी, कूलर या पंखे के रहना आसान काम नहीं है. ऐसे में आपको पता चले कि जिस वक्त आप अपने घर में लोड शेडिंग झेल रहे थे. ठीक उसी वक्त आपके राज्य की सरकार पड़ोसी सूबे को धड़ल्ले से बिजली बेच रही थी. तो आप क्या कहेंगे.
जाहिर सी बात है कि ये सब सुनकर आपका खून खौलना लाजमी है. आम आदमी सोच में डूब जाता है कि कि जब अपने ही घर में अंधेरा है, तो दूसरों का घर क्यों रोशन किया जा रहा? क्या ये कोई सियासी साजिश है या इसके पीछे का गणित कुछ और ही है? अगर आप भी इसी सवाल का जवाब खोज रहे हैं तो चलिए साथ मिलकर जवाब तलाशते हैं.
असल में ये कोई सीधा-साधा मामला नहीं है. बल्कि राज्यों के बीच छिड़ा एक बहुत बड़ा इकोनॉमिक और स्ट्रैटेजिक घमासान है. इसे देश की 'पावर ग्रिड पॉलिटिक्स' (Power Grid Politics) कहते हैं.
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) और ऊर्जा मंत्रालय के पास इस साल की शुरुआत से ही कई राज्यों की आपत्तियां पहुंच रही हैं. तो फिर देर किस बात की है. चलिए बहद आसान भाषा में इस पूरे पावर ग्रिड विवाद का पोस्टमार्टम करते हैं और जानते हैं कि कैसे राज्यों की ये लड़ाई आपके घर में होने वाली लोड शेडिंग से जुड़ी है.
आपके हक की बिजली पड़ोसी को क्यों?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए बेसिक से शुरू करते हैं. येां सबसे बड़ा और बुनियादी पेंच फंसता है, 'सरप्लस पावर' (Surplus Power) और 'कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट्स' का. कोई भी राज्य सरकार बिजली का उत्पादन अपनी मर्जी से रोज घटा-बढ़ा नहीं सकती. जिन राज्यों के पास कोयले की खदानें हैं या जहां बड़े सोलर प्लांट लगे हैं, वहां कभी-कभी जरूरत से ज्यादा बिजली बन जाती है.
इस बात को विस्तार से समझाते हुए उ.प्र. राज्य विद्युत कर्मचारी संघ के पूर्व महासचिव प्रमोद तिवारी कहते हैं,
अब मान लीजिए, किसी राज्य में रात के समय फैक्ट्रियां बंद हैं और बिजली की मांग अचानक कम हो गई. बिजली को बड़े डिब्बों में बंद करके स्टोर तो किया नहीं जा सकता. अगर ग्रिड में जरूरत से ज्यादा बिजली बनी रही, तो पूरा सिस्टम क्रैश हो सकता है. ऐसे में राज्य सरकारें नेशनल ग्रिड के जरिए उस फालतू बिजली को खुले बाजार (Power Exchange) में ऊंचे दामों पर बेच देती हैं.
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि ये एक शुद्ध बिजनेस है, जहां मुनाफे का खेल चलता है.
पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स की मजबूरी
दूसरा बड़ा पेंच है लॉन्ग-टर्म पीपीए (Power Purchase Agreement) यानी बिजली खरीद समझौता). राज्य सरकारें दूसरी कंपनियों या राज्यों के साथ 25-25 साल का एडवांस एग्रीमेंट साइन करके रखती हैं.
इन समझौतों के तहत एक राज्य को दूसरे राज्य को तय मात्रा में बिजली देनी ही पड़ती है, भले ही उस वक्त उसके अपने राज्य में लोड बढ़ गया हो. अगर कोई राज्य ऐन वक्त पर बिजली रोकने की कोशिश करता है, तो उस पर भारी-भरकम जुर्माना (Penalty) ठोक दिया जाता है. येी वजह है कि कानूनी कागजों में बंधी सरकारें अपने लोगों को कट झेलने पर मजबूर कर देती हैं, पर पड़ोसी की सप्लाई नहीं रोक पातीं.
केंद्र का 'गैप-मैनेजमेंट' और राज्यों का गुस्सा
देशभर में मचे इसी बवाल को शांत करने के लिए बिजली मंत्रालय ने 'गैप-मैनेजमेंट' (Gap-Management) के नए नियम जारी किए हैं. इस व्यवस्था का सीधा मकसद ये देखना है कि देश के किसी भी कोने में बिजली बेकार न जाए और जहां संकट है, वहां तुरंत सप्लाई पहुंचे.
पर इसी नियम को लेकर अब पॉलिटिक्स शुरू हो गई है. जो राज्य बिजली संकट से जूझ रहे, वे केंद्र सरकार पर भेदभाव का सीधा आरोप लगा रहे. उनका कहना है कि जब वे खुले बाजार से बिजली खरीदने जाते हैं, तो बिजली बनाने वाले राज्य आपदा का फायदा उठाकर दाम सातवें आसमान पर पहुंचा देते हैं. इस साल की शुरुआत में कई मुख्यमंत्रियों और बिजली मंत्रियों ने केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) को चिट्ठी लिखकर इस ट्रेडिंग पर लगाम लगाने की मांग की है.
लोड शेडिंग रोकने की बैठकों का सच
आजकल हर राज्य के बिजली मुख्यालयों में इमरजेंसी मीटिंग्स का दौर जारी है. अफसर एसी कमरों में बैठकर लोड शेडिंग रोकने के उपायों पर माथापच्ची कर रहे. पर असलियत ये है कि जब तक ग्रिड के भीतर राज्यों का आपसी तालमेल और नए नियमों का संतुलन नहीं बैठता, तब तक जमीनी हालात बदलना मुश्किल है.
बिजली बनाने वाले राज्य चाहते हैं कि वे अपनी सरप्लस बिजली ऊंचे रेट पर बेचकर सरकारी खजाना भरें. वहीं, खरीदने वाले राज्यों के पास इतना बजट नहीं होता कि वे रोज महंगी बिजली खरीद सकें. नतीजतन, वे अपने येां चुपचाप दो-चार घंटे का पावर कट लागू कर देते हैं ताकि भारी खर्च से बचा जा सके.
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इस शॉर्ट पूरा मामला ये है कि आपके घर का पावर कट सिर्फ कोयले की कमी से नहीं होता. ये ग्रिड की खरीद-बिक्री, पुराने समझौतों और राज्यों के बीच चल रहे नफे-नुक्सान के गणित का नतीजा है. जब तक केंद्र और राज्यों के बीच इस पावर गेम का कोई स्थाई हल नहीं निकलता, तब तक आम उपभोक्ता को इस चिलचिलाती गर्मी में ऐसे ही पसीने से दो-चार होना पड़ेगा.
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