'PoK भारत का हिस्सा, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से कारोबार पर टैक्स छूट नहीं,' HC का आदेश
कारोबारियों ने दलील दी थी कि क्रॉस-LOC ट्रेड GST एक्ट के दायरे में नहीं आता है, क्योंकि ये भारत सरकार के SOP के तहत रेगुलेट किया जाता है. हालांकि, High Court ने उनकी दलील नहीं मानी.

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने लाइन ऑफ कंट्रोल (LOC) के आर-पार होने वाले कारोबार पर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (Pok) जम्मू-कश्मीर का क्षेत्र है यानी भारत का हिस्सा है. इसलिए कोर्ट ने फैसला दिया कि जम्मू-कश्मीर के बंटे हिस्सों के बीच कारोबार अंतरराष्ट्रीय नहीं बल्कि राज्य का अंदरूनी व्यापार माना जाएगा और टैक्स में छूट नहीं मिलेगी.
कोर्ट के फैसले के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में LoC के आर-पार रहने वाले लोगों के बीच का कारोबार जम्मू-कश्मीर का अंदरूनी कारोबार है. गुरुवार, 27 नवंबर को 'मैसर्स न्यू जी एन एंड संस बनाम भारत संघ' और अन्य के मामलों में हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि क्रॉस-LOC (लाइन ऑफ कंट्रोल) व्यापार अब राज्य के अंदर का ही व्यापार माना जाएगा. यह करोबारी लाइन 2008 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली के तौर पर शुरू की गई थी.
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट की श्रीनगर बेंच में क्रॉस-LOC ट्रेड से जुड़े टैक्स मामले की सुनवाई हुई. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने कहा,
"किसी भी पक्ष की तरफ से मौजूद वकील ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं की कि राज्य का वो क्षेत्र जो वर्तमान में पाकिस्तान के वास्तविक कब्जे में है, जम्मू-कश्मीर राज्य के भूभाग का हिस्सा है. इसलिए, इस मामले में सप्लायर्स की लोकेशन और माल की सप्लाई की लोकेशन तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य (अब केंद्र शासित प्रदेश) के अंदर थी और इसलिए, संबंधित टैक्स पीरियड के दौरान याचिकाकर्ताओं का प्रभावित क्रॉस-LOC ट्रेड एक अंतर-राज्य व्यापार के अलावा और कुछ नहीं था."
क्या है क्रॉस-LOC व्यापार?
यह व्यापार एक प्रकार का बार्टर (सामान के बदले सामान) सिस्टम के तहत होने वाला कारोबार था. इसमें में किसी भी प्रकार की करेंसी का लेनदेन नहीं होता था. इसका मकसद सीमा के दोनों तरफ के स्थानीय लोगों को फायदा पहुंचाना था.
2008 में शुरू हुए इस व्यापार में श्रीनगर-मुजफ्फराबाद और पूंछ-रावलकोट रूट से व्यापार होता था. लेकिन 2019 में पुलवामा हमले के बाद यह व्यापार सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया था. ऐसी भी खबरें आई थीं कि इन ट्रेड रूट का इस्तेमाल हथियारों, नशीली दवाओं और नकली मुद्रा के गैरकानूनी कारोबार के लिए किया गया.
जम्मू-कश्मीर वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट, 2005 के तहत क्रॉस-LOC ट्रेड को टैक्स से छूट दी गई थी. हालांकि, सेंट्रल गुड्स एंड सर्विस टैक्स एक्ट (CGST Act) और जम्मू-कश्मीर गुड्स एंड सर्विस एक्ट (J&K GST) के तहत इसके लिए कोई छूट नहीं थी. इस वजह से व्यापारी टैक्स अधिकारियों के निशाने पर आ गए थे. उन्होंने व्यापारियों को नोटिस जारी कर GST के तहत टैक्स की मांग की थी.
कोर्ट ने कहा कि इस व्यापार को 'इंट्रा-स्टेट' यानी राज्य के अंदर का कारोबार माना जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि इसलिए इस पर GST लागू होगा. कोर्ट ने पहली नजर में यह भी पाया कि व्यापारियों ने जानबूझकर जानकारी छुपाई थी, क्योंकि उन्हें मालूम था कि यह व्यापार राज्य के भीतर ही हो रहा है और इस पर GST देना चाहिए था.
कोर्ट ने कहा,
"वे (याचिकाकर्ता) यह भी जानते थे कि ये सप्लाई चाहे आने वाली हों या जाने वाली हों, इंट्रा-स्टेट सप्लाई थीं और CGST एक्ट, 2017 के सेक्शन 7 के अनुसार GST के अधीन थीं. यह याचिकाकर्ताओं की जिम्मेदारी थी कि वे GST रिटर्न दाखिल करते समय अपनी GST देनदारी का खुद से मूल्यांकन कर उसे पूरा करते."
इसके अलावा हाई कोर्ट ने व्यापारियों को दो अहम निर्देश दिए-
पहला निर्देश: अगर याचिकाकर्ताओं ने CGST एक्ट, 2017 के सेक्शन 74(1) के तहत उन्हें जारी किए गए कारण बताओ नोटिस का जवाब दाखिल नहीं किया है, तो उन्हें (27 नवंबर 2025) से चार हफ्तों के अंदर ऐसा करना होगा. इसके बाद, GST अधिकारी को इस मामले का निपटारा तीन महीने के भीतर करना होगा.
दूसरा निर्देश: अगर GST अधिकारियों ने पहले ही टैक्स की मांग को अंतिम रूप दे दिया है, तो व्यापारियों को 27 नवंबर 2025 से तीन महीने के भीतर अपील करने का अधिकार होगा.
व्यापारियों ने भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिकाओं के जरिए हाई कोर्ट में नोटिस को चुनौती दी थी. याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि भारत सरकार के जारी स्टैंडर्ड ऑफ प्रोसीजर (SOP) के तहत क्रॉस-LOC ट्रेड किया जाता है. उनका कहना था कि इसलिए क्रॉस-LOC ट्रेड GST एक्ट के दायरे में नहीं आता है.
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