जिस पीर पंजाल पर जम्मू-कश्मीर में बवाल मच गया, वो 'वजूद' में कैसे आया?
पीर पंजाल पर बीजेपी नेता सुनील शर्मा के इस बयान ने बवाल काट दिया है. जम्मू-कश्मीर का राजौरी और पुंछ जिला मिलाकर पीर पंजाल का क्षेत्र बनता है. इन दोनों इलाकों के विधायक सुरिंदर चौधरी और जावेद राणा ने बीजेपी नेता से माफी मांगने को कहा है. उन्होंने शर्मा के खिलाफ सदन के बाहर और अंदर जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया.

पीर पंजाल को लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बवाल मचा है. भारतीय जनता पार्टी के नेता सुनील शर्मा ने एक इंटरव्यू में कहा कि पीर पंजाल का कोई वजूद नहीं है. ऐसा कोई नाम उन्होंने किसी भी शब्दकोश में नहीं सुना है. इसके साथ ही उन्होंने ये दावा भी किया कि जिस इलाके को पीर पंजाल कहते हैं उस क्षेत्र को पहले चंद्रभागा कहा जाता था.
सुनील शर्मा के इस बयान ने बवाल काट दिया है. जम्मू-कश्मीर का राजौरी और पुंछ जिला मिलाकर पीर पंजाल का क्षेत्र बनता है. इन दोनों इलाकों के विधायक और उमर अब्दुल्ला सरकार में मंत्री सुरिंदर चौधरी और जावेद राणा ने बीजेपी नेता से माफी मांगने को कहा है. उन्होंने शर्मा के खिलाफ सदन के बाहर और अंदर जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया.
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि सुनील शर्मा के बयान से ‘पूरा क्षेत्र आहत हुआ है’. कई विधायकों ने तो भाजपा नेता के माफी मांगने तक विधानसभा का कामकाज न चलने देने की धमकी दी है.
इसी बीच सुनील शर्मा के दावे के बाद कश्मीर घाटी में ‘पीर पंजाल के इतिहास और उसके अस्तित्व’ की पड़ताल शुरू हो गई है. उनके दावे की सच्चाई के लिए सरकारी दस्तावेज खंगाले गए तो पता चला कि कई बार आधिकारिक दस्तावेजों में भी ‘पीर पंजाल’ शब्द की ‘एंट्री’ है.

पीर पंजाल क्षेत्र जम्मू-कश्मीर के भूगोल एक अहम हिस्सा है. इसमें हिमालय की निचली श्रेणी की पहाडि़यां हैं, जिन्हें लघु हिमालय (Lesser Himalaya) भी कहा जाता है. यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से लेकर भारत के जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश तक फैली हैं.
कश्मीर का ये वो दुर्गम इलाका है, जहां के लोग पाकिस्तान के हर अटैक, हर गोलीबारी को झेलने वाले ‘फ्रंटलाइनर्स’ हैं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट में एक पॉलिटिकल एक्सपर्ट अश्वनी एस हांडा कहते हैं कि पीर पंजाल इलाके में सीमा के पास रहने वाले लोग हर दिन भारत की रक्षा करते हैं. साल 1989 से लेकर अब तक 14 हजार से ज्यादा निर्दोष लोग इस इलाके में मारे गए हैं. ये ही असली बलिदानी लोग हैं.
पुंछ और राजौरी का नाम ही भारत के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों ने पाकिस्तानी सीजफायर के उल्लंघन की खबरों के जरिए सुना है. यही वो इलाके हैं, जहां गोलीबारी, मोर्टार और बम के धमाके आजकल 'आम बात' है.
कश्मीर की दक्षिणी पट्टी में स्थित ये इलाका नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पाकिस्तान की सीमा के एकदम पास है. इसमें डोडा, किश्तवाड़ और रामबन के चिनाब घाटी जिले भी आते हैं. पीर पंजाल इलाका हमेशा से पाकिस्तान की गोलाबारी का शिकार रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी पाकिस्तानी गोलाबारी में यहां के कई घर तबाह हो गए थे.
निर्दलीय विधायक मुजफ्फर इकबाल खान ने बताया कि सिर्फ पुंछ शहर में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 16 लोग मारे गए. वो कहते हैं कि सुनील शर्मा के बयान ने इन लोगों के बलिदानों का अपमान किया है.
भाजपा नेता ने ऐसा क्यों कहा?
दरअसल, बीते दिनों जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने चिनाब घाटी जिलों के साथ पीर पंजाल के लिए एक अलग प्रशासनिक प्रभाग बनाने की मांग की थी. इसी के बाद सुनील शर्मा ने कहा कि पीर पंजाल नाम का कोई क्षेत्र ही नहीं है. उन्होंने इसका नाम किसी भी डिक्शनरी में नहीं सुना और घाटी में अलग क्षेत्रीय पहचान बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो जम्मू-कश्मीर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक एकता के खिलाफ है और उसे चुनौती देते हैं.
शर्मा ने दावा किया कि प्राचीन शास्त्रों और वैदिक ग्रंथों में इस इलाके को 'चंद्रभागा' के नाम से जाना जाता था.
ये बात तो सही है कि प्राचीन शास्त्रों और वैदिक ग्रंथों में पीर पंजाल का उल्लेख है. लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि पूरे क्षेत्र को चंद्रभागा कहा जाता था. चंद्रभागा दरअसल पीर पंजाल पर्वतमाला से बहने वाली प्रमुख नदियों में से एक चिनाब नदी का प्राचीन संस्कृत नाम है. ऐसा माना जाता है कि इसी नदी ने इस क्षेत्र को इसकी प्रारंभिक सभ्यतागत पहचान दी थी.
फिर पीर पंजाल का नाम क्यों मिला?
पीर पंजाल के नामकरण को लेकर कई तरह के मत हैं. 'फ्रंटलाइन' की एक रिपोर्ट के अनुसार, कल्हड़ की राजतरंगिणी में पांचालदेव (Panchaladeva) नाम से इस इलाके का जिक्र मिलता है. पांचाल महाभारत के काल में एक राज्य भी था, जिसके राजा द्रुपद थे. उनकी बेटी द्रौपदी से पांडवों का विवाह हुआ था. द्रौपदी को इस इलाके में पैदा होने की वजह से ‘पांचाली’ भी कहा गया है.
राजतरंगिणी का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले विद्वान एमए स्टीन (M A Stein) बताते हैं कि ऊंचे पहाड़ी दर्रों को हमेशा ‘देवता’ माना जाता था या उनसे किसी देवता को जोड़ा जाता था. ये परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहीं. लेकिन बाद में जब कश्मीर में इस्लाम का प्रभाव बढ़ा तो ‘देव’ शब्द की जगह ‘पीर’ (मुस्लिम संत) शब्द इस्तेमाल होने लगा. इस तरह से ‘पांचालदेव’ पीर पंजाल हो गया.
शुरुआत में यह नाम पूरे पीर पंजाल पर्वत श्रंखला के लिए इस्तेमाल होता था जो नियंत्रण रेखा (LoC) के पार पश्चिमी कश्मीर में नीलम (किशनगंगा) नदी से शुरू होकर दक्षिण-पूर्व दिशा में करीब 320 किलोमीटर तक फैली हुई है. पीर पंजाल की पहाड़ियां जम्मू-कश्मीर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से से लेकर हिमाचल प्रदेश के उत्तर-पश्चिम में ऊपरी ब्यास नदी तक फैली हुई हैं.
आज के समय में ‘पंजाल’ नाम सिर्फ पर्वत श्रंखला तक सीमित रह गया है और दर्रे को आमतौर पर ‘पीर की गली’ कहा जाता है.
इसके अलावा, पीर पंजाल क्षेत्र के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि ‘पीर’ का अर्थ प्राचीन डोगरी भाषा में ‘पहाड़’ होता है. कश्मीरी भाषा में इसका समानार्थी शब्द है- ‘पंतसाल’. दोनों को मिलाकर और थोड़ा सा ‘बिगाड़कर’ इस इलाके को पीर पंजाल कहा जाने लगा.
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