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ट्रांसजेंडर बिल में मोदी सरकार ने क्या बदल दिया? जमकर विरोध शुरू हो गया

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से पारित कर दिया गया है. विपक्ष ने दोनों सदनों में इस विधेयक का विरोध किया है. इस बिल में ट्रांसजेंडर पहचान की परिभाषा बदलने का प्रस्ताव है. इसके प्रावधानों के मुताबिक अब ट्रांसजेंडर व्यक्ति खुद अपनी पहचान तय नहीं कर सकता.

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25 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 10:29 PM IST)
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ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को संसद की मंजूरी मिल गई है. (इंडिया टुडे)
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संसद के दोनों सदनों ने ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकार का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी है. 25 मार्च को राज्यसभा ने ध्वनि मत से इस बिल को पारित कर दिया है. कांग्रेस सांसद तिरुची शिवा ने बिल को सेलेक्ट कमेटी को भेजने का प्रस्ताव दिया लेकिन इसे खारिज कर दिया गया. लोकसभा 24 मार्च को ही इस बिल को मंजूरी दे चुकी है. इस विधेयक में ट्रांसजेंडर पहचान की परिभाषा बदलने का प्रस्ताव है. इसमें जेंडर सेल्फ आइडेंटिफिकेशन (स्व-पहचान) को मान्यता नहीं दी गई है. यानी अब ट्रांसजेंडर व्यक्ति खुद अपनी पहचान तय नहीं कर सकता.

साल 2019 के कानून के तहत कोई भी व्यक्ति सीधे जिला कलेक्टर से अपना ट्रांसजेंडर पहचान कार्ड बनवा सकता था लेकिन नए विधेयक के मुताबिक, इसके लिए पहले मेडिकल सुपरिटेंडेंट या सीएमओ से मेडिकल सर्टिफिकेट लेना होगा. इस सर्टिफिकेट के साथ डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) के यहां आवेदन करना होगा. डीएम जांच से संतुष्ट होने के बाद ही ट्रांसजेंडर पहचान पत्र जारी करेंगे. इसके साथ ही जेंडर पहचान से जुड़ी सर्जरी की जानकारी अस्पताल प्रबंधन को डीएम को देनी होगी.

साल 2019 के कानून में क्या था?

साल 2019 में भारत सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक पारित किया था. इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट था. साल 2014 में शीर्ष कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण (NALSA) से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में नागरिकों को खुद अपनी जेंडर पहचान तय करने का अधिकार दिया. अदालत ने उन्हें थर्ड जेंडर का दर्जा भी दिया.

कोर्ट ने सरकार को ट्रांसजेंडर लोगों को सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा वर्ग मानने का आदेश दिया. इसके तहत शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाओं में आरक्षण समेत दूसरी सुविधाएं देने का भी निर्देश दिया. इस फैसले के पांच साल बाद सरकार ने ट्रांस अधिकारों के लिए कानून बनाया. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की कानूनी परिभाषा तय की गई. इस दायरे में कई तरह के लोग शामिल हैं.

इनमें जन्म के समय दी गई लैंगिग पहचान से अलग जेंडर आईडेंटिटी वालों को भी जगह मिली. इस परिभाषा में ट्रांस मेन और वुमेन दोनों शामिल हैं. जेंडर चेंज के लिए किसी व्यक्ति का मेडिकल प्रोसेस से गुजरना जरूरी नहीं था. इस परिभाषा में जेंडर क्वीर, इंटरसेक्स व्यक्ति के साथ किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय भी शामिल हैं. साल 2019 के कानून ने खुद की जेंडर पहचान तय करने का हक दिया लेकिन इसके लिए मजिस्ट्रेट से प्रमाणपत्र लेने की शर्त भी रखी गई.

नए संशोधन विधेयक के तहत किसे माना जाएगा ट्रांसजेंडर

ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकार का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026  में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा सीमित कर दी गई है. इस संशोधन में साल 2019 के कानून के आर्टिकल 4(2) हटाने का प्रस्ताव है. इस अनुच्छेद में जेंडर के सेल्फ आईडेंटिफिकेशन के अधिकार का जिक्र था. नई परिभाषा के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जिनका संबंध किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता जैसे सामाजिक सांस्कृतिक पहचान वाले समुदाय से है, उन्हें ही ट्रांसजेंडर माना जाएगा. 

इसके अलावा इंटरसेक्स लोगों को भी इस परिभाषा के अंतर्गत रखा गया है. इंटरसेक्स मतलब जिनके शारीरिक गुण, जैसे यौन अंग, क्रोमोसोम या हार्मोन जन्म के वक्त सामान्य पुरुष या महिला से अलग होते हैं. इसमें उन बच्चों और व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें धोखे से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने पर मजबूर किया गया है. इस परिभाषा में सबसे बड़ा बदलाव ये है कि यह 2019 की तुलना में ट्रांसजेंडर पहचान को सीमित कर देती है. इसमें अब सेल्फ आईडेंटिफिकेशन वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जगह नहीं मिली है.

सरकार का नए विधेयक के पक्ष में क्या तर्क है?

सरकार का तर्क है कि नए विधेयक का मकसद उन लोगों की मदद करना है जो बायोलॉजिकल कारणों से भेदभाव का सामना करते हैं. सरकार का मानना है कि साल 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा साफ नहीं है. इस वजह से सरकार असली जरूरतमंदों तक मदद नहीं पहुंचा पा रही है.

सरकार के मुताबिक, परिभाषा क्लियर नहीं होने के चलते पुलिस कोर्ट और पर्सनल लॉ से जुड़े नियमों को लागू करने में भी दिक्कत आ रही है. उनके मुताबिक, पिछले कानून का मकसद अलग-अलग जेंडर आईडेंटिटी वालों, खुद की जेंडर आईडेंटिटी चुनने वालों या फिर जिनकी जेंडर पहचान समय के साथ बदलती रहती है (जेंडर फ्लूइड) व्यक्तियों को सुरक्षा देना नहीं था.

सरकार की ओर से ये भी बताया गया है कि यह संशोधन कुछ अपराधों को ध्यान में रखते हुए भी लाया गया है. सरकार का दावा है कि एडल्ट और बच्चों का अपहरण करके उनको शारीरिक तौर पर गंभीर नुकसान पहुंचाया जाता है. फिर उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करके जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है. यह सब आमतौर पर इसलिए किया जाता है ताकि उनको भीख मांगने जैसे कामों में लगाया जा सके.

विपक्ष ने विरोध जताया है

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद के दोनों सदनों में विपक्ष ने इस विधेयक का विरोध किया है. विपक्ष ने सेल्फ आईडेंटिफिकेशन को ट्रांसजेंडर की परिभाषा से बाहर रखने पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा, 

जब हम राज्यसभा के लिए चुनकर आते हैं तो एक फॉर्म भरते हैं. इसमें हमारी पहचान जेंडर के आधार पर की जाती है. हम सभी ने इसमें खुद से लिखा है कि हम पुरुष हैं या महिला. क्या किसी मेडिकल बोर्ड ने इसे प्रमाणित किया है? यानी कोई भी हमारी जेंडर से जुड़ी पहचान पर सवाल नहीं उठा सकता लेकिन हम ट्रांसजेंडरों पर सवाल उठाएंगे. 

तृणमूल कांग्रेस सांसद संकेत गोखले ने इस विधेयक को औपनिवेशिक कानून करार दिया. उन्होंने कहा कि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, ट्रांसजेंडर आबादी 5 लाख होनी चाहिए लेकिन केवल 32 हजार लोगों ने ही ट्रांसजेंडर पहचान के लिए आवेदन किया है क्योंकि उनमें से अधिकतर लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं. उन्होंने ये भी बताया,

31 प्रतिशत ट्रांसजेंडर पहचान वाले व्यक्तियों ने आत्महत्या की कोशिश की है. इनमें से 50 प्रतिशत लोगों ने 20 साल की उम्र से पहले ही सुसाइड अटेंप्ट किया था.

शिवसेना (उद्धव गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सवाल उठाया कि स्टेकहोल्डर्स से राय लिए बिना सरकार 5 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बारे में फैसला कैसे ले सकती है. उन्होंने कहा,

 ट्रांसजेंडर पहचान के 32 हजार आवेदन स्वीकार किए गए हैं. वहीं लगभग 5500 आवेदन खारिज कर दिए गए. सार्वजनिक तौर पर खारिज किए जाने का कोई कारण भी उपलब्ध नहीं है. 

प्रियंका चतुर्वेदी ने पहचान के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि यदि कोई मेडिकल बोर्ड ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पहचान को स्वीकृति नहीं देता तो यह उनके गरिमा के अधिकार का उल्लंघन होगा.

वीडियो: जब अनाया बांगर ने ट्रांसजेंडर की चुनौतियों पर खुलकर बात की

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