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पहलगाम आतंकी हमला नहीं होता, अगर ये दो लोग 3000 रुपये के लालच में न आते

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को आज साल भर हो गया. मामले की जांच में पता चला है कि दो स्थानीय कश्मीरियों ने बैसरन घाटी में छिपे आतंकियों को देख लिया था. अगर वे चाहते तो आतंकी हमले में मारे गए 26 लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

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22 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 22 अप्रैल 2026, 05:36 PM IST)
pahalgam terror attack kashmiri tourist terrorist
पहलगाम में हुए आतंकी हमले को आज एक साल हो गए. (इंडिया टुडे)
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22 अप्रैल, 2025. इसी तारीख को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था. पाकिस्तान से आए आतंकियों ने 26 पर्यटकों की बेरहमी से हत्या कर दी थी. हमले को आज एक साल पूरा हो गया. जांच एजेंसियां इसकी जांच में जुटी हैं जिसे लेकर एक नया दावा सामने आया है. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जांच में पता चला है कि दो स्थानीय कश्मीरी अगर समय रहते पुलिस को सूचना देते तो इस हमले को रोका जा सकता था.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ये दोनों कश्मीरी जेल में बंद हैं. उन पर आरोप है कि हमले से एक रात पहले उन्होंने तीन पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह दी थी और खाना भी खिलाया था. दोनों की पहचान परवेज अहमद और बशीर अहमद जोथड के तौर पर हुई है.

रिपोर्ट के मुताबिक जांच में सामने आया कि इन दोनों ने कथित तौर पर 3000 रुपये के लालच में आतंकियों को अपने घर में पनाह दी थी. आतंकी इनके यहां 5 घंटे तक रुके थे. हमले के बाद आतंकियों की पहचान फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी के तौर पर हुई.

बातचीत के दौरान आतंकी पाकिस्तानी लहजे वाली उर्दू-पंजाबी मिली हुई भाषा बोल रहे थे. उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे. वे 'अली भाई' नाम के किसी शख्स का जिक्र कर रहे थे. अली भाई लश्कर-ए-तैयबा के द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) के टॉप कमांडर और पहलगाम हमले के मुख्य आरोपी साजिद जट्ट का उपनाम है. वह पाकिस्तान के कसूर इलाके का रहने वाला है.

रिपोर्ट के मुताबिक ‘अली भाई’ का जिक्र आने के बाद दोनों आरोपियों को इलाके में आतंकी हमला होने का अनुमान हो गया था, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी. अखबार ने बताया है कि अगर वे चाहते तो आसानी से पुलिस को फोन कर सकते थे या इलाके में आतंकियों को देखे जाने की सूचना स्थानीय टूरिस्ट ऑपरेटर एसोसिएशन को दे सकते थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, 21 अप्रैल, 2025 की रात करीब 10.30 बजे आतंकी उनके घर से निकले. जाते समय उन्होंने अपने साथ कुछ खाना पैक किया और खाना पकाने का बर्तन, कंबल और तिरपाल भी साथ ले गए. इसके बाद 22 अप्रैल (हमले के दिन) को दोपहर में लगभग 12.30 बजे भी इन दोनों ने बैसरन घाटी की बाड़ के पीछे आतंकियों को छिपते देखा था. फिर भी उन्होंने किसी को इसकी जानकारी नहीं दी. वे अपने टट्टुओं के साथ वहां से दूर चले गए और अपने पर्यटक ग्राहकों के लौटने का इंतजार करने लगे.

दोपहर 1 बजे से 1.30 बजे के बीच बशीर और परवेज अपने टट्टुओं पर पर्यटकों को लेकर वापस पहलगाम आए. फिर रात में जब उन्हें बैसरन में हुए आतंकी हमले की जानकारी मिली, तो वे समझ गए कि जिन आतंकियों को उन्होंने शरण दी थी, ये उनका ही काम है. इसके बाद खुद को बचाने के लिए दोनों तुरंत अपनी 'ढोक' (पहाड़ों पर बनी अस्थायी झोपड़ी) छोड़कर वहां से भाग गए.

लेकिन 22 जून, 2025 को NIA ने दोनों को ढूंढ निकाला और गिरफ्तार कर लिया. दिसंबर 2025 में NIA ने इस मामले में चार्जशीट फाइल की. चार्जशीट में मुख्य साजिशकर्ता साजिद जट्ट, तीनों पाकिस्तानी हमलावर (जो मारे जा चुके हैं.) और लश्कर ए तैयबा के साथ-साथ परवेज अहमद और बशीर अहमद को भी आरोपी बनाया गया.

वीडियो: पहलगाम आतंकी हमले को एक साल हो गए, पीड़ित परिवारों का ज़ख्म अब भी ताज़ा

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