ऑपरेशन सिंदूर का एक साल, कितना तैयार है भारत और अब तक क्या बदला? आर्मी ने दिया जवाब
Operation Sindoor: 7 मई 2025 को रात के लगभग 1 बजे जब भारत के लोग अपने-अपने घरों में सो रहे थे, उसी समय इंडियन एयरफोर्स के विमान एयरबॉर्न हुए. मकसद था पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में मौजूद आतंकी कैंप्स को तबाह करना. क्योंकि भारत के 26 निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तान के भेजे हुए आतंकियों ने पहलगाम में बेरहमी से मार दिया था.

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो छद्म हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध.’ पाकिस्तान ने 1947 से ही भारत के खिलाफ एक छद्म युद्ध यानी एक प्रॉक्सी वॉर छेड़ रखा है. इसलिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों में एक शब्द बदला गया है. यहां ‘तटस्थ’ की जगह ‘छद्म’ शब्द लिखा हुआ है. 7 मई 2025 को रात के लगभग 1 बजे जब लोग अपने घरों में सो रहे थे, उसी समय इंडियन एयरफोर्स के विमान एयरबॉर्न हुए. मकसद था पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में मौजूद आतंकी कैंप्स को तबाह करना. पानी अब सिर से ऊपर जा चुका था. भारत के 26 निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तान के भेजे हुए आतंकियों ने पहलगाम में बेरहमी से मार दिया था. भारत ने जवाब दिया और इस ऑपरेशन को नाम दिया गया ‘सिंदूर’.
लेकिन सवाल ये है कि क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद से सब ठीक हो गया? क्या आतंकी हरकतें बंद हो गईं? इसका जवाब है नहीं. और जैसी पाकिस्तान की फितरत है, वो कभी आतंक की फंडिंग बंद नहीं करेगा. ये कभी न खत्म होने वाली जंग है. इसलिए ये जरूरी है कि भारत लगातार अपने-आप को अपग्रेड कर आने वाली संभावित जंग के लिए तैयार रहे. समझते हैं कि बीते एक साल में भारत ने ऐसे कौन से कदम उठाए जिनसे भविष्य में होने वाली लड़ाई में भारत और मजबूती से उतरेगा.

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत के सामने ड्रोन वॉरफेयर की नई तस्वीर पेश की है. भारत ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ड्रोन्स में कुछ बदलाव किए हैं. इन बदलावों का सबसे अहम हिस्सा सेना में एक नई ड्रोन और काउंटर ड्रोन सिस्टम माने ड्रोन को रोकने वाले सिस्टम्स को इंफेंट्री (पैदल सेना) बटालियंस में शामिल करना है. इसके अलावा इन्हें आर्मर्ड और आर्टिलरी (तोप) रेजिमेंट्स में भी शामिल किया जाएगा. फिलहाल सेना में जो बटालियंस ड्रोन का इस्तेमाल कर रही हैं, वो इसे सेकेंड्री हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती हैं. यानी इन बटालियंस में जरूरत के हिसाब से ड्रोन सिस्टम्स का इस्तेमाल किया जाता है. इस वजह से सैनिक ड्रोन्स के इस्तेमाल को कभी भी अपने पहले एक्शन के तौर पर नहीं लेते. लेकिन अब हर सैनिक ड्रोन और काउंटर ड्रोन ऑपरेट करने में माहिर हो, इसका ध्यान रखा जाएगा.
सेना का लक्ष्य हर यूनिट के अंदर एक ऐसी प्लाटून (सेना की छोटी ईकाई जिसमें 30-32 सैनिक होते हैं) तैयार करना है जो खास तौर पर ड्रोन्स को हैंडल करेगी. सेना की हर यूनिट को निर्देश दिए गए हैं कि एक ऐसा स्ट्रक्चर बनाया जाए जिसमें कुछ चुनिंदा सैनिकों को सिर्फ ड्रोन वॉरफेयर की ट्रेनिंग दी जाए. इंफेंट्री रेजिमेंट्स में फिलहाल प्लाटून और कंपनी (एक कंपनी में 120 सैनिक) के स्तर पर सर्विलांस ड्रोन्स को शामिल किया जाएगा. इसके लिए अलग-अलग यूनिट्स से लगभग 70 जवानों को इस काम के लिए नियुक्त किया जाएगा. साथ ही कुछ अन्य सैनिकों की जिम्मेदारियों में बदलाव करने की भी जरूरत होगी. यानी हर सैनिक को कम से कम इतनी ट्रेनिंग दी जाएगी, कि वो ड्रोन जैसी चीजों को हैंडल कर सकें.
भैरव और रूद्र कमांडो बटालियन की शुरुआतइंडियन आर्मी ने अपनी स्ट्राइक करने की क्षमता को और घातक बनाने के लिए भैरव नाम की एक कमांडो यूनिट का गठन किया है. इंडियन आर्मी फिलहाल भैरव कमांडो फोर्स की 30 बटालियन का गठन करने जा रही है. हर बटालियन में लगभग 250 कमांडो होंगे. इन कमांडोज़ को हमला करने, दुर्गम इलाकों में ऑपरेट करने के लिए खासतौर पर प्रशिक्षण दिया जाएगा. साथ ही, इन्हें उन्नत हथियार और गियर्स से भी लैस किया जाएगा. अभी तक सेना में पैराशूट रेजिमेंट की स्पेशल फोर्स (Para SF) या सेना की घातक प्लाटून्स ऐसे ऑपरेशंस को अंजाम देती हैं.
सूत्रों के मुताबिक हर इंफेंट्री के रेजिमेंटल सेंटर को ये निर्देश दिया गया है कि भैरव कमांडो बटालियन पर काम शुरू करें. रेजिमेंटल सेंटर्स को ये निर्देश दिया गया है कि एक महीने के अंदर इन कमांडोज़ को ऑपरेशनल स्तर पर तैयार कर लिया जाए. इसके अलावा इंडियन आर्मी ने रूद्र ब्रिगेड के गठन का भी फैसला लिया है. इस ब्रिगेड में हर तरह की रेजिमेंट के सैनिक होंगे जो ड्रोन के अलावा सभी उन्नत गियर्स से लैस होंगे. ये एक तरह की इंटीग्रेटेड यूनिट होगी जिसमें इंफेंट्री, आर्मर्ड और आर्टिलरी; तीनों अंगों के सैनिक शामिल होंगे. इससे ये फायदा भी होगा कि अलग-अलग खूबियों वाले सैनिक एक साथ काम करेंगे.
आर्टिलरी में दिव्यास्त्रआर्टिलरी रेजिमेंट में भी तोपों की संख्या में बदलाव किया जाएगा. हर यूनिट में कम से कम दो बैटरियां (एयर डिफेंस या तोप का लॉन्चिंग सिस्टम) और जोड़ने के साथ-साथ निगरानी और लड़ाकू ड्रोन से लैस एक तीसरी ड्रोन बैटरी जोड़ने पर विचार किया जा रहा है. वर्तमान में, हर आर्टिलरी रेजिमेंट में तीन बैटरियां हैं. हर बैटरी में छह तोपें होती हैं. इसके अलावा दिव्यास्त्र आर्टिलरी बैटरियां अगली पीढ़ी की लंबी दूरी की तोपों और लोइटरिंग हथियारों (सुसाइड ड्रोन्स) से लैस की जा रही हैं जो निगरानी करने, दुर्गम इलाकों में टारगेट्स की पहचान करने, और उन पर हमला करने में सक्षम हैं.
इसके अलावा निगरानी को बढ़ाने के लिए भी उन्नत सिस्टम के इस्तेमाल की बात सामने आ रही है. सुरंग का पता लगाने, जासूसी मिशंस और किसी एरिया की मैपिंग के लिए हर कंपनी में एक ड्रोन यूनिट शुरू करके Electronics and Mechanical Engineers (EME) रेजिमेंट में भी बदलाव करने की योजना पर भी चर्चा की जा रही है. EME वो रेजिमेंट है जो सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे उपकरणों के मेंटेनेंस और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है. यानी कुल मिलाकर देखें तो भविष्य के वॉरफेयर को देखते हुए इंडियन आर्मी की लगभग हर यूनिट में मूलभूत बदलाव किए जा रहे हैं. साल 2025 की शुरुआत में ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि ये साल सेनाओं के लिए रिफॉर्म्स का साल है. ये सारे सुधार रक्षा मंत्री की उसी पहल का हिस्सा हैं.

आमतौर पर जहां रक्षा बजट हर साल 8-10 प्रतिशत बढ़ाया जाता था, इस बार इसमें लगभग 15 प्रतिशत यानी 1 लाख 3 हजार 468 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी देखने को मिली है जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर का इफेक्ट’ भी कहा जा रहा है. सेना के स्तर पर भारत कई बार दोहरा चुका है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है. ऐसे में रक्षा बजट में 15 पर्सेंट की बढ़ोतरी साफ इस बात की ओर इशारा करती है कि भारत अपने पड़ोसियों, खासकर पाकिस्तान और चीन की हरकतों के मद्देनजर सैन्य तैयारियां बढ़ा रहा है.
डिफेंस बजट में रक्षा उपकरणों, हथियारों, फाइटर जेट्स और जंगी जहाज जैसी चीजों की खरीद के लिए अलॉट किए जाने वाले फंड को कैपिटल एक्सपेंडिचर कहा जाता है. बीते साल जहां ये बजट 1.80 लाख करोड़ का था, वहीं 2026-27 में इसे बढ़ा कर 2.19 लाख करोड़ कर दिया गया है. इसके तहत, विमान और एयरो इंजन के लिए 63,733 करोड़ रुपये अलग रखे गए हैं, जबकि नेवी की फ्लीट के लिए 25 हजार 23 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.
डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) वो संस्था है जो सेनाओं के लिए नई तकनीक बनाती है और टेस्टिंग का काम करती है. इस बार के बजट में DRDO का फंड 26 हजार 816.82 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 29 हजार 100.25 करोड़ रुपये कर दिया गया है. इस आवंटन में से, 17,250.25 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा कैपिटल खर्च के लिए आवंटित किया गया है.
ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर राजस्थान के जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल घई ने कहा कि उस समय के DGMO के तौर पर, मैं इसे न केवल एक सैन्य ऑपरेशन के रूप में देखता हूं, बल्कि शायद भारत की रणनीतिक यात्रा का एक निर्णायक मोड़ भी मानता हूं. उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने बहुत सोच-समझकर और पूरी एकजुटता के साथ अपने पुराने तरीकों से आगे बढ़कर LoC और पाकिस्तान के साथ अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार आतंकवाद को निशाना बनाया.
लेफ्टिनेंट जनरल घई ने बताया कि शुरुआत से ही सरकार ने हमें स्पष्ट निर्देश दिए थे. उन्होंने कहा,
साफ तौर पर कहा गया था कि आतंकवाद के पूरे तंत्र को खत्म करना और कमजोर करना, उनकी योजनाओं को नाकाम करना और इन ठिकानों से भविष्य में होने वाले किसी भी हमले को रोकना ही हमारा अंतिम लक्ष्य है. यह बात बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कही गई थी. सेनाओं को इस ऑपरेशन की योजना बनाने और उसे अंजाम देने के लिए जरूरी सभी संसाधन और अधिकार सौंपे गए थे. ऑपरेशन सिंदूर कोई अंत नहीं था, बल्कि यह तो बस एक शुरुआत थी. आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई जारी रहेगी. भारत अपनी संप्रभुता, अपनी सुरक्षा और अपने लोगों की रक्षा पूरी दृढ़ता, पेशेवर तरीके और पूरी जिम्मेदारी के साथ करेगा.
भारत में बीते काफी समय से तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान पर जोर दिया जा रहा है. सीडिएस के पद से लेकर थियेटर कमांड इसी का हिस्सा हैं. इसका मकसद है कि जंग के समय तीनों सेनाओं का तालमेल बना रहे. लेफ्टिनेंट जनरल घई ने बताया कि यह ऑपरेशन तीनों सेनाओं का था. इसमें जमीन, हवा और समुद्र की क्षमताओं को एक साथ जोड़ा गया. इसमें साझा जानकारी, साझा ऑपरेशन, खुफिया जानकारी, और तुरंत फैसले लेने की क्षमता शामिल थी. उन्होंने कहा कि भारतीय हमले ने दुश्मन को पूरी तरह चौंका दिया गया था. पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के अंदरूनी इलाकों और पाकिस्तान के मुख्य हिस्सों में बने हर ठिकाने को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाया गया.
लेफ्टिनेंट घई ने कहा कि इस ऑपरेशन ने भारत की अपनी क्षमताओं को भी दिखाया। उन्होंने बताया कि इस्तेमाल किए गए हथियारों, गोला-बारूद, रॉकेट, मिसाइलों, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट का एक बड़ा हिस्सा भारत में ही बनाया और तैयार किया गया था. उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस, आकाश, निगरानी और निशाना लगाने वाले आधुनिक सिस्टम, और साथ ही भारत में ही बना गोला-बारूद और ; इन सभी ने इस ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाई. वहीं एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि पहलगाम की घटना अपने आप में इतनी भयानक थी कि उसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह कम ही होगी.
एयर मार्शल भारती ने कहा कि हम अपने उन देशवासियों को तो वापस नहीं ला सकते, जिनकी 22 अप्रैल, 2025 को बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. लेकिन हम यह पक्का करने का संकल्प जरूर ले सकते हैं कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों.
वीडियो: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया क्यों रोका गया था 'ऑपरेशन सिंदूर'?

