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कोर्ट ने बेल के बदले दलित-आदिवासियों से कहा- 'थाने की सफाई करो', रिपोर्ट में दावा

ओडिशा के रायगढ़ा जिले में एक जगह है तिजिमाली. साल 2023 से इस इलाके में रहने वाले आदिवासी और दलित समुदाय के लोग एक बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ विरोध कर रहे हैं.

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1 मई 2026 (अपडेटेड: 1 मई 2026, 07:15 PM IST)
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ओडिशा की कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों को विवादित शर्त के साथ जमानत दी. (फोटो- सोशल मीडिया-X)
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पुलिस स्टेशन की सफाई करने की शर्त के साथ किसी को बेल मिलने के बारे में सुना है? ओडिशा में वेदांता के एक प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले कई किसानों को कोर्ट ने इसी शर्त के साथ जमानत दी है. अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि उन्हें उसी काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई रोजाना सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच करनी होगी, जहां वो महीनों बंद रहे. इस शर्त ने जेल से छूटने की उनकी खुशी को ‘अपमान’ में बदल दिया. 

आर्टिकल-14 नाम की वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, कुमेश्वर नायक ओडिशा के उन 8 किसानों में से एक हैं, जिन्हें काशीपुर पुलिस थाने की सफाई करने का निर्देश दिया गया. कोर्ट के कहे मुताबिक, वह ये काम कर भी रहे हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने 100 लोगों के साथ मिलकर सितंबर 2024 में पुलिस स्टेशन के बाहर विरोध प्रदर्शन के दौरान दंगा किया था. अफसरों के काम में बाधा डाली थी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था. लोक सेवकों पर हमले का आरोप भी उन पर लगा.

इस केस में नाइक महीनों तक जेल में रहे. 28 मई 2025 को जब ओडिशा हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दी तो उसके साथ ये शर्त रखी कि वो दो महीने तक हर सुबह काशीपुर पुलिस थाने में सफाई करेंगे. नाइक को कोर्ट की ये शर्त ‘अपमानजनक’ लगी. उन्होंने कहा, 

इस जमानत आदेश के जरिए अधिकारी हमें खनन विरोधी आंदोलन का हिस्सा होने के लिए अपमानित करना चाहते हैं. 

उन्होंने बताया कि जमानत मिलने के बाद जब वो कोर्ट के निर्देशों का पालन करने के लिए काशीपुर पुलिस स्टेशन गए तो पुलिसकर्मी भी असहज थे. उन्होंने उनसे एक कागज पर साइन करके जाने के लिए कहा. उनमें से कई दलित और आदिवासी समुदाय से थे, जिन्हें जमानत की ये शर्त बिल्कुल पसंद नहीं आई थी.

विरोध की वजह क्या है?

ओडिशा के रायगढ़ा जिले में एक जगह है तिजिमाली. साल 2023 से इस इलाके में रहने वाले आदिवासी और दलित समुदाय के लोग एक बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ विरोध कर रहे हैं. ये परियोजना आंध्र प्रदेश की कंपनी वेदांता लिमिटेड को दी गई है, ताकि वह ओडिशा के कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ में अपनी रिफाइनरी के लिए कच्चा माल ले सके. 

गांव के लोगों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की वजह से उन्हें अपना घर और जमीन छोड़कर कहीं और जाना पड़ेगा. इसके बदले में मुआवजे को लेकर भी अभी कोई बात नहीं हुई है. जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी आधिकारिक तौर पर शुरू नहीं हुई है. गांव में दलित वर्ग के ऐसे कई लोग हैं, जो दूसरों की जमीन पर काम करते हैं. ऐसे में जमीन अधिग्रहण होने पर उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलेगा.

रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 से लेकर अब तक इस प्रोजेक्ट का विरोध करने पर कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. गिरफ्तार लोगों और उनके परिवार के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि कोर्ट ने इन्हीं में से कम से कम 8 दलित और आदिवासी लोगों को जमानत देने के लिए पुलिस स्टेशन साफ करने की शर्त रखी. इनमें 6 दलित समुदाय से आते हैं और 2 आदिवासी हैं. 

इसके अलावा, जिन लोगों को ऐसी जमानत की शर्तें दी गई हैं, वे सभी ‘मां माटी माली सुरक्षा मंच’ से भी जुड़े हैं. यह एक जमीनी स्तर का संगठन है. इसे रायगढ़ा जिले की कुई भाषा बोलने वाले आदिवासी और दलित लोगों ने तिजिमाली पहाड़ियों में खनन का विरोध करने के लिए बनाया है.

सामाजिक संगठनों ने जताया विरोध

‘पुलिस स्टेशन साफ करने की शर्त’ के साथ जमानत देने के कोर्ट के फैसले का कई सामाजिक संगठन के लोगों ने विरोध किया है. उनका कहना है कि ये शर्तें ‘जातिवादी और अपमानजनक’ हैं. इनके जरिए लोगों से ऐसा काम करवाया जा रहा है जो लंबे समय तक ऐतिहासिक रूप से दबे-कुचले जातियों पर थोपा जाता रहा है.

नियम क्या कहते हैं?

आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट में सितंबर 2025 की ‘द लीफलेट’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि बेल के लिए ऐसी शर्तें लगाना कोर्ट की ताकत से बाहर है. बेल इसलिए दी जाती है ताकि ये तय किया जा सके कि आरोपी ट्रायल के दौरान कोर्ट में पेश होता रहे. 2023 में बने भारतीय न्याय संहिता (BNS) में कुछ मामलों में सजा के तौर पर सामुदायिक सेवा यानी कम्युनिटी सर्विस का प्रावधान है. लेकिन वह अपराध की कुछ धाराओं तक ही सीमित है. जैसे सार्वजनिक जगह पर नशे में बदसलूकी करने की धारा 355 और मानहानि की धारा 356(2) में कोर्ट बेल की शर्त में कम्युनिटी सर्विस का निर्देश दे सकती है.  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 23 के अनुसार, कम्युनिटी सर्विस का मतलब है, ऐसा काम जो कोर्ट सजा के तौर पर करवाए. लेकिन, इससे समाज को फायदा हो और जिसके बदले में कोई पैसा न मिले. लेकिन कुमेश्वर नायक वाले मामले पर क्या ये लागू होता है? उन पर जो आरोप लगे हैं, उनमें हत्या की कोशिश की धारा 109 के अलावा दंगे की धारा 191 लगी है. दोनों ही गंभीर और गैर-जमानती अपराध हैं और इनमें जमानत के लिए कम्युनिटी सर्विस जैसी कोई शर्त नहीं बताई गई है.

कोर्ट पर भेदभाव के आरोप

ऐसे में बेल की शर्त में सफाई का आदेश देने के चलते कोर्ट पर ‘पूर्वग्रह’ के आरोप लग रहे हैं. पिछले साल (2025) जुलाई में वकीलों, नागरिकों और एक्टिविस्ट के एक ग्रुप ने इसकी शिकायत करते हुए सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी लिखी थी. इसमें सर्वोच्च अदालत से मामले में स्वतः संज्ञान लेने को कहा गया था. ये मांग की गई थी कि वो बेल की इन शर्तों को रद्द करे जो कमजोर वर्गों को लेकर भेदभाव से भरी हैं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की ओर से अब तक इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया गया. 

इसी बीच 2026 की 18 फरवरी को तीन और प्रदर्शनकारियों को एक साल से ज्यादा समय तक जेल में रहने के बाद जमानत मिली. इनमें नारिंग देई माझी, रमाकांत नायक और सुंदर सिंह माझी शामिल हैं. उनकी रिहाई पर भी कोर्ट ने वही विवादित शर्त रखी. रायगढ़ा की अतिरिक्त जिला जज अल्पना स्वैन ने आदेश में कहा कि उन्हें उसी शर्त पर जमानत दी जा रही है, जिस पर बाकी सह आरोपियों को दी गई थी. तीनों दो महीने तक हर सुबह सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच काशीपुर पुलिस स्टेशन की सफाई करेंगे.

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