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नोएडा एयरपोर्ट का कोडनेम 'DXN' क्यों है? पहली उड़ान के बाद उठा सवाल

Jewar DXN airport: उत्तर प्रदेश के जेवर में बने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू हो गई हैं. 15 जून को इंडिगो की फ्लाइट ने लखनऊ से जेवर एयरपोर्ट पर लैंडिंग की. लेकिन कई लोगों का ध्यान इसके कोडनेम पर गया है, जो है ‘DXN.’

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15 जून 2026 (अपडेटेड: 15 जून 2026, 10:03 PM IST)
Jewar DXN airport
जेवर एयरपोर्ट पर कमर्शियल फ्लाइट शुरू हो गई है. (फोटो-इंडिया टुडे)
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उत्तर प्रदेश के जेवर में बने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू हो गई हैं. 15 जून को इंडिगो की फ्लाइट ने लखनऊ से जेवर एयरपोर्ट पर लैंडिंग की. प्लेन को वॉटर कैनन से सलामी दी गई. फिर फ्लाइट ने वापस लखनऊ के लिए टेक ऑफ किया. इस दौरान प्लेन में एयरपोर्ट निर्माण में जमीन देने वाले लोग बैठे थे.

जेवर एयरपोर्ट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और देश के अन्य हिस्सों के बीच हवाई कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने की एक पहल है. मगर कई लोगों का ध्यान इसके कोड नेम ‘DXN’ पर भी गया है. जानेंगे कि यहां DXN का क्या मतलब है और ऐसे कोड कैसे दिए जाते हैं.

द हिंदू ने लिखा कि 2023 में नोएडा एयरपोर्ट के पूर्व CEO क्रिस्टोफ श्नेलमन ने इसके कोड नेम पर बात की थी. उन्होंने बताया था,

"DXN में 'D' का मतलब दिल्ली है. देश की राजधानी. और 'N' का मतलब नोएडा है. ये पश्चिमी UP इलाके में हमारी मौजूदगी को दिखाता है. हमारा मानना है कि 'X' भारत और दुनिया के बीच कनेक्टिविटी को दिखाता है."

तीन कोड और चार कोड, क्या है ये सब?

हर एयरपोर्ट के दो कोड होते हैं. इन्हें इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) और इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) तय करती है.

IATA एयरलाइन कंपनियों का एक ग्लोबल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन है. ये टिकट पर दिखने वाले तीन कोड को तय करती है. अगर आप बोर्डिंग पास पर देखेंगे तो यहां एयरपोर्ट को पूरा नाम नहीं, बल्कि कोड होगा. जैसे जेवर एयरपोर्ट का DXN और दिल्ली का DEL.

फिर इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) का नाम आता है. ये सभी एयरपोर्ट के पायलट, एयर ट्रैफिक कंट्रोलर और फ्लाइट प्लानर्स के लिए चार अक्षरों वाले कोड तय करती है. ICAO यूनाइटेड नेशंस की एक खास संस्था है.

IATA और ICAO के नाम रखने का तरीका अलग

IATA- ये संस्था अक्सर कोड नेम रखते हुए एयरपोर्ट के नाम के शुरुआती तीन अक्षरों का इस्तेमाल करती है. नोएडा के मामले में ‘D’ और ‘N’ सबसे पास के दो शहरों को दिखाते हैं, जबकि ‘X’ कनेक्टिविटी को. कुछ हवाई अड्डे जो पहले मिलिट्री एयरपोर्ट थे, उनके नाम ‘IX’ से शुरू होते हैं. माने चंडीगढ़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए ‘IXC.’

ICAO- ये काफी सख्ती से नाम रखता है. क्योंकि इसका इस्तेमाल अधिकारी और नेविगेटर करते हैं. कोड का पहला लेटर ग्लोबल एरिया को दिखाता है. दूसरा लेटर खास देश या क्षेत्र की पहचान करता है. और तीसरा व चौथा अक्षर सही एयरफील्ड की जानकारी देते हैं.

नोएडा एयरपोर्ट का ICAO कोड VIND है. ‘V’ दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए दुनिया भर में माने जाने वाले आइडेंटिफायर को दिखाता है. ‘I’ उत्तरी भारत के फ्लाइट इंफॉर्मेशन क्षेत्र के लिए है. ‘ND’ का मतलब नोएडा और दिल्ली है.

कुछ कोड-नेम बने विवाद का कारण

बिहार का गया एयरपोर्ट अपने कोड नेम के कारण विवाद में आया था. क्योंकि IATA ने इसे 'GAY' नाम दिया था. कहा गया कि ये कोड नेम किसी पवित्र जगह के लिए अपमानजनक, शर्मनाक और अनुचित है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, IATA ने कोड बदलने की मांग को खारिज कर दिया. क्योंकि उसके रेजोल्यूशन 763 के तहत एयरपोर्ट कोड स्थायी होते हैं.

2025 में ये मामला फिर उठाया गया. जिसके बाद नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने स्पष्ट किया कि कोड बदला नहीं जा सकता क्योंकि इससे सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है.

एयरपोर्ट कोडिंग की शुरुआत 1930 के दशक में कमर्शियल एविएशन के शुरुआती दिनों में हुई थी. तब एयरलाइंस और पायलट डेस्टिनेशन की पहचान के लिए अपने खुद के दो-अक्षर वाले कोड चुनते थे. मगर 1940 में जैसे-जैसे एयरपोर्ट्स की संख्या में बढ़ोतरी हुई, तो तीन अक्षर वाले कोड का एक सिस्टम बनाया गया. और 1960 के दशक में IATA ने इसे स्टैंडर्डाइज कर दिया.

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