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रेखा गुप्ता के शपथग्रहण में नहीं पहुंचे नीतीश आखिर BJP से क्या चाहते हैं?

Delhi में Rekha Gupta ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इस दौरान NDA के कई नेता भी शपथ ग्रहण में शामिल हुए. लेकिन Bihar के मुख्यमंत्री Nitish Kumar इस समारोह में नहीं पहुंच पाए. इसको लेकर कयासों का बाजार गर्म हो गया है. और इसको हवा दी है Tejashwi Yadav के करीबी राजद विधायक भाई बीरेंद्र ने.

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21 फ़रवरी 2025 (अपडेटेड: 21 फ़रवरी 2025, 04:09 PM IST)
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नीतीश कुमार 20 फरवरी को प्रगति यात्रा में नालंदा थे. (एक्स)
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रेखा गुप्ता ( Delhi CM Rekha Gupta) ने 20 फरवरी को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके शपथ ग्रहण में BJP के तमाम बड़े नेता शामिल रहे. NDA गठबंधन के नेताओं की भी उपस्थिति थी. इनमें चंद्रबाबू नायडू (Chandrababu Naidu) और पवन कल्याण (Pawan Kalyan), एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) और अजित पवार (Ajit Pawar) के नाम शामिल हैं. एकजुटता का मैसेज. लेकिन इस समारोह वहीं नेता गायब रहा. जिसके राज्य में चुनाव होना है. नाम है नीतीश कुमार. उनकी गैरमौजूदगी को बिहार के विपक्षी दलों को अवसर दिख गया. लगे हाथ लालू परिवार के करीबी एक राजद विधायक ने दावा कर दिया नीतीश कैसे जाते? वो तो उनके साथ जाने वाले हैं.

राजद विधायक ने क्या कहा?

मनेर विधानसभा सीट से राजद के विधायक हैं. भाई बीरेंद्र.  लालू यादव और तेजस्वी यादव दोनों के गुडबुक में शामिल माने जाते हैं. उनसे मीडिया ने  नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण में नहीं जाने को लेकर सवाल पूछा. जवाब में भाई बीरेंद्र ने दावा किया 

नीतीश कुमार वहां क्यों जाएंगे. वो तो हमारे साथ आने वाले हैं.

ये पहली बार नहीं है जब भाई बीरेंद्र ने ऐसा दावा किया है. बीते साल नवंबर महीने में उन्होंने कहा था कि राजनीति में कोई भी परमानेंट दोस्त और दुश्मन नहीं होता. और राजनीति में कुछ भी संभव है.

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PTI
लालू यादव भी वापसी का ऑफर दे चुके हैं

राजद में भाई बीरेंद्र अकेले नहीं जो नीतीश कुमार को ऐसा ऑफर दे रहे हैं. साल की शुरुआत यानी 1 जनवरी को लालू यादव ने भी नीतीश कुमार को राजद में आने का ऑफर दिया था. उन्होंने कहा था, 

नीतीश कुमार के लिए हमारे दरवाजे तो खुले ही हैं. नीतीश को भी खोलकर रखना चाहिए. नीतीश अगर साथ आते हैं तो क्यों नहीं लेंगे. ले लेंगे साथ. वो आएं, मिलकर काम करेंगे. वो हमेशा भाग जाते हैं. हम माफ कर देंगे.

हालांकि इसके बाद तेजस्वी यादव ने इन संभावनाओं को सिरे से खारिज किया था. उन्होंने कहा, 

 मीडिया के सवालों को टालने के लिए राजद सुप्रीमो ने ऐसा कहा था. मैं पहले ही साफ कर चुका हूं कि नीतीश के लिए हमारे दरवाजे बंद हैं.

जदयू ने क्या बताया?

पार्टी की ओर से कहा गया कि नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर हैं. 20 फरवरी को पहले से नालंदा जिले में उनकी यात्रा का शेड्यूल तय था. इसलिए वो शपथ ग्रहण में नहीं पहुंच पाए. जदयू की ओर से केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और संजय झा ने शपथ ग्रहण में हिस्सा लिया. राजद विधायक भाई बीरेंद्र के दावे पर जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने बताया, 

नीतीश कुमार बिहार की जनता के प्रति जवाबदेह हैं. और वो प्रगति यात्रा में हैं. 20 फरवरी को नालंदा जिला का कार्यक्रम था. और 21 फरवरी को पटना जिला का कार्यक्रम है. मुख्यमंत्री जी इसके चलते नहीं गए. भाई बीरेंद्र जैसे लोग दावा कर रहे हैं इसका मतलब राजद बिलकुल शून्य की स्थिति में है. उन्हें इस बात का एहसास है कि जदयू के बगैर उनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है. 

नीतीश बिना राजद का सर्वाइवल मुश्किल

नीतीश कुमार का सियासी अतीत ऐसा रहा है कि उनके किसी भी कदम पर राजनीतिक हलचल पैदा हो जाती है. उनके सहयोगी और विरोधी दोनों सतर्क हो जाते हैं. और उनका ट्रैक रिकॉर्ड भी कुछ ऐसा रहा है कि जिस गठबंधन में नीतीश कुमार होते हैं. उसका पलड़ा चुनाव में भारी रहता है. 2005 से लेकर अब तक के तमाम विधानसभा और लोकसभा चुनाव के नतीजे इसकी तस्दीक करते हैं. अब राजद को भी इस बात का इल्म है कि अगर नीतीश कुमार BJP के साथ मौजूदा गठबंधन के स्वरूप में लड़े तो NDA को बढ़त रहेगी. क्योंकि जाति और सामाजिक समीकरण NDA के पक्ष में है. राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में 2010 विधानसभा के आसपास का रिजल्ट हो सकता है. जिसमें NDA को 206 सीटों पर जीत मिली थी. वरिष्ठ पत्रकार मनोज मुकुल बताते हैं, 

 कहीं न कहीं राजद मान कर चल रही है कि नीतीश के बिना सर्वाइवल मुश्किल है. इसलिए राजद की तरफ से एक मनोवैज्ञानिक प्रेशर बनाया जा रहा है. जो लालू यादव ने 1 जनवरी को बोला. उसके बाद से गाहे बगाहे राजद नेता इसको दोहराते रहते हैं.

नीतीश कुमार भी मौका देते रहते हैं

नीतीश कुमार भी अपनी गतिविधियों से विरोधियों को बयानबाजी का मौका देते रहते हैं. ताजा घटनाक्रम को ही ले लीजिए. नीतीश कुमार पिछले कुछ दिनों में दो बार व्यक्तिगत कारणों से दिल्ली आए. लेकिन उन्होंने BJP के किसी भी शीर्ष नेता से मुलाकात नहीं की, जबकि इसी साल बिहार में चुनाव होने हैं. ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों को कयास लगाने का अवसर मिल गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नीतीश कुमार 16 फरवरी को दिल्ली आए थे. खबर चली कि वो प्रधानमंत्री से मिलकर दिल्ली जीत की बधाई देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

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NDA की मीटिंग में भी नहीं आए

रेखा गुप्ता के शपथग्रहण में आए NDA नेताओं की दिल्ली के इम्पीरियल होटल में बैठक हुई. बैठक में चंद्रबाबू नायडू, एकनाथ शिंदे, अजित पवार समेत तमाम NDA नेताओं ने शिरकत की. मीटिंग का उद्देश्य NDA की एकजुटता का मैसेज देना था. इस दौरान सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताया. और आगामी चुनावों में उनके नेतृत्व में जाने का संकल्प लिया. लेकिन जिस राज्य में अगला चुनाव होना है. वहीं का मुखिया इस मीटिंग से नदारद रहा. शायद इस कारण ही राजद ने नीतीश कुमार पर डोरे डालने शुरू कर दिया. इस बैठक से उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी नदारद रहे. इसको लेकर भी बिहार एनडीए में खटपट का अंदेशा लगाए जाने लगा. इस बैठक में नीतीश कुमार के प्रतिनिधि के तौर पर ललन सिंह और संजय झा ने शिरकत की. 

नीतीश कुमार आखिर चाहते क्या हैं?

नीतीश कुमार या फिर उनकी पार्टी का कोई भी नेता सीधे तौर पर NDA के खिलाफ कोई बयान नहीं देता है. उनका बयान होता है कि गठबंधन अटूट है. वहीं बिहार BJP के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल और दोनों डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी कई बार बोल चुके है कि NDA नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव में जाएगी. नीतीश कुमार खुद भी अब कहीं नहीं जाने की बात कर चुके हैं. लेकिन आखिर ऐसा क्या है जिसके चलते नीतीश कुमार अपनी पॉलिटिकल पोस्चरिंग से विपक्ष को मौका देते रहते हैं? इस सवाल के जवाब में मनोज मुकुल बताते हैं, 

 नीतीश कुमार को अपनी सीट बढ़ानी है. और फिर से मुख्यमंत्री बनना है. और वो इसके लिए BJP की ओर से कंक्रीट कमिटमेंट चाहते हैं. यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह या BJP अध्यक्ष की ओर से ऑन कैमरा कमिटमेंट चाहते हैं. क्योंकि उनको अनुमान है कि अभी जो लोग कमिटमेंट कर रहे हैं उनकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं है.

नीतीश कुमार को कहीं न कहीं ये डर भी सता रहा है कि BJP 2020 की तरह कोई खेल ना कर दे. कहीं फिर से चिराग की तरह कोई नया ‘हनुमान’ खड़ा करके जदयू को डेंट ना पहुंचा दे. प्रशांत किशोर की सक्रियता और महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे प्रकरण से उनकी आशंका को बल मिलता दिख रहा है. इसलिए जेडीयू के रणनीतिकार ऑन रिकॉर्ड कमिटमेंट चाहते हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव होगा. और चुनाव बाद चाहे नतीजे जो भी रहें नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे.

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राजद जदयू गठबंधन के क्या मायने होंगे?

फिलहाल जदयू -BJP गठबंधन इंटैक्ट दिख रहा है. नीतीश कुमार की प्रगति यात्रा में BJP के नेता उनके साथ दिख रहे हैं. NDA के सभी जिला के जिलाध्यक्षों की आपस में बैठक हो रही है ताकि ग्राउंड पर समन्वय बनाया जा सके. वहीं शीर्ष लेवल पर समन्वय का जिम्मा जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने संभाल रखा है. लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है. और यहां कुछ भी असंभव नहीं है. कम से कम नीतीश कुमार की राजनीति को देखकर तो यही लगता है. और नीतीश कुमार की जदयू में एक खेमा ऐसा भी है जो राजद के साथ गठबंधन के पक्ष में है. 

मनोज मुकुल बताते हैं, 

 जदयू खेमे के राजद सिंपेथाइजर्स का मानना है कि NDA के साथ लड़ने में बहुत अनिश्चितता है. BJP का ऐतबार नहीं किया जा सकता. वहीं नीतीश अगर राजद के साथ जाते हैं तो राजद को भी संजीवनी मिल जाएगी. और जदयू भी मजबूत होगी. इसके लिए वो 2015 के विधानसभा चुनाव का हवाला देते हैं.

राजद के साथ गठबंधन के हिमायती लोगों का एक तर्क ये भी है कि अभी BJP का अट्रैक्शन ज्यादा है. उनके खेमे में ज्यादा लोग हैं. जिनमें चिराग, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी शामिल हैं. साथ में नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी भी है. और BJP का वोट जदयू को ट्रांसफर होगा इस पर भी सवाल हैं. ऐसे में राजद के साथ जाना सेफ पैसेज हो सकता है.

फिलहाल जदयू में ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम है. और ये लोग हाशिए पर भी हैं. लेकिन नीतीश कुमार अपनी सहूलियत से सहयोगी बदलते रहे हैं. पार्टी के भीतर भी और बाहर भी. ऐसे में कब ये खेमा ताकतवर हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता.

वीडियो: दिल्ली चुनाव में भाजपा ने नीतीश कुमार और चिराग पासवान को अहमियत क्यों दी? बदले में मिला क्या?

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