मॉनसून पर ही क्यों अटकी हैं मुंबई की सांसें? समंदर किनारे रहकर भी बूंद-बूंद के लिए तरसती मायानगरी
Mumbai Water Crisis: मुंबई में जल संकट गहरा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शहर के जलाशयों में केवल 9.65 फीसदी पानी बचा है. जबकि कुएं सूखने से टैंकरों की सप्लाई में 50 प्रतिशत तक गिरावट आई है. BMC ने पानी बचाने के लिए सख्त कदम उठाते हुए कटौती और कई प्रतिबंध लागू कर दिए हैं

“है समुंदर सामने प्यासे भी हैं- पानी भी है, तिश्नगी कैसे बुझाएँ ये परेशानी भी है.” रमज़ आज़ीमाबादी ने जब ये शेर लिखा होगा तो यकीनन उनके जेहन में मायानगरी मुंबई या फिर उसके जैसे ही समुद्र तट पर बसे किसी शहर का ही ख्याल रहा होगा. जहां समंदर का ढेर सारा मगर खारा पानी मौजूद होने के बावजूद प्यासे लोगों की तिश्नगी (बोले तो प्यास) बुझने का नाम नहीं ले रही. क्योंकि समंदर का खारा पानी कोई पीये भी तो कैसे पीये?
कट टू, सीन-2… जरा सोचिए की आपकी नींद खुलती है और आप खुद को एक ऐसे टापू (Island) पर पाते हैं. जो चाहों तरफ से गहरे समुद्र से घिरा हो. जहां नजर घुमाओ, सागर का नीला पानी ही नजर आ रहा हो. और तभी आपको प्यास लगती है. आप भागते हुए पास के नल तक पहुंचते हैं. मगर टोटी खोलते ही ‘सांय-सांय’ की आवाज तो आती है, मगर पानी का एक बूंद भी नहीं निकलती. ये दोनों शायरी और ये फिल्मी सीन मुंबईकरों के लिए हकीकत बन चुके हैं.
एनडीटीवी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई को पानी देने वाले जलाशयों में अब सिर्फ 9.65 फीसदी पानी बचा है. हालात इतने बुरे हैं कि कुएं तक सूख गए हैं और पानी के टैंकरों की सप्लाई भी घटकर आधी रह गई है. देश की आर्थिक राजधानी कहा जाना शहर प्यासा है, बहुत प्यारा. और इस प्यास से निजात पाने के लिए मुंबई वाले आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं. और बरसात आने में इसर कदर आना कानी कर रही है, मानो उसकी मम्मी ने उसके घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी हो.

मॉनसून का 'गुलाम' क्यों है मुंबई?
अब सवाल ये उठता है कि महाराष्ट्र की राजधानी की प्यास सिर्फ बारिश की बूंदे ही क्यों बुझा सकती हैं? असल में मुंबई के जलसंकट को समझना के लिए आपको एक बेसिक गणित समझना होगा. मुंबई शहर का अपना कोई नेचुरल वॉटर सोर्स नहीं है. ये शहर पूरी तरह से बाहरी झीलों पर निर्भर है. अपर वैतरणा, मोदक सागर, तानसा, मध्य वैतरणा, भातसा, विहार और तुलसी-ये वो 7 नाम हैं जो मुंबई की प्यास बुझाते हैं.
अब आप कहेंगे कि हां तो ठीक है, इसे प्रॉब्लम क्या है? मगर यही तो सबसे बड़ी प्रॉब्लम है. दिक्कत ये है कि इन जलाशयों की क्षमता तो फिक्स है, मगर मुंबई की आबादी और उसकी जरूरतों की कोई सीमा ही नहीं है. ऐसे में होता ये है कि मॉनसून में दो हफ्ते की देरी हुई नहीं कि बीएमसी (BMC) के माथे पर पसीना आना शुरू हो जाता है.
एनडीटीवी की रिपोर्ट बताती है कि इस साल जलाशयों का स्तर खतरे के निशान से काफी नीचे चला गया है, जिसके चलते पानी की कटौती का ऐलान करना पड़ गया है.
| जलाशय का नाम | मुंबई की लाइफलाइन में भूमिका |
| भातसा | सबसे बड़ा स्रोत, कुल सप्लाई का मुख्य हिस्सा |
| तानसा | पुराना और भरोसेमंद स्रोत |
| विहार और तुलसी | शहर के भीतर स्थित, मानसून भरते ही ओवरफ्लो |
स्रोत: बीएमसी वाटर सप्लाई विभाग डेटा
क्या वाकई पानी की कमी है, या मैनेजमेंट का फेर है बाबू भईया?
ऐसा नहीं है कि ये वॉटर क्राइसेस कोई साल- दो साल में पैदा हुई हो. ये दशकों पुराना रोना है. मुंबई की समस्याओं को करीब से देखने वालों कि मानें तो प्रॉब्लम पानी की कमी नहीं बल्कि पानी का खराब मैनेजमेंट है. मीरा-भयंदर इलाके में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार विकास जे. श्रीवास्तव कहते हैं,
मुंबई का पाइपलाइन नेटवर्क दशकों पुराना है. शहर के अलग-अलग कोनों तक पानी पहुंचाने वाली इन पाइपों में भारी रिसाव (leakage) है. आप इसे ऐसे समझिए-एक बाल्टी में आप पानी भर रहे हैं, लेकिन बाल्टी में नीचे पांच छेद हैं. आप जितना पानी डालेंगे, वो जमीन में रिसता जाएगा.
इसके अलावा विकास का कहना है कि अवैध कनेक्शन और कमर्शियल इस्तेमाल की वजह से आम आदमी तक पहुंचने वाला पानी कम हो जाता है.
मुंबईकरों का कहना है कि अमीर बस्तियों में पानी की कोई कमी नहीं दिखती, लेकिन झुग्गी-झोपड़ियों और निचले इलाकों में लोग आज भी टैंकरों के पीछे दौड़ रहे हैं. ये 'वितरण की असमानता' (Distribution Inequality) ही मुंबई के जलसंकट का सबसे काला अध्याय है.

समंदर के पास होकर भी प्यासा क्यों?
मुंबई वालों को दरिया किनारे बसे होने का नाज़ है. दरिया बोले तो समुद्र. ऐसे में दूसरे शहर वाले अक्सर पूछ बैठते हैं कि ‘प्रॉब्लम क्या है, समंदर तो सामने है, उसका पानी पी लो न! जैसे सउदी, यूएई या फिर इजरायल वाले कहते हैं.’ दरअसल ये लोग 'डिसैलिनेशन' (Desalination) की उस तकनीक की तरफ इशारा कर रहे होते हैं. जिसकी मदद से खाड़ी के देश समुद्र के खारे पानी को पीने लायक मीठे पानी में बदलते हैं.
ऐसे में ये सवाल तो जायज है कि अगर वो कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं? टेक्निकली ऐसा करना मुमकिन तो है, लेकिन मुंबई के संदर्भ में ऐसा करना उतना आसान नहीं है. इसकी दो मुख्य वजह हैं,
1. भारी लागत: डिसैलिनेशन प्लांट लगाना और उसे चलाना बेहद खर्चीला है. इसके लिए बिजली की भारी खपत होती है.
2. पर्यावरण का रिस्क: खारे पानी को प्रोसेस करने के बाद जो 'ब्राइन' (अत्यधिक नमक वाला पानी) निकलता है, उसे अगर वापस समुद्र में छोड़ा जाए, तो ये वहां की समुद्री मछलियों और इकोसिस्टम को मार सकता है. मुंबई के मछुआरों की रोजी-रोटी पर ये सीधा-सीधा हमला होगा.
शायद ऐसी ही किसी बेबसी पर शायर ने कहा होगा-
"वो समंदर है तो फिर क्या उसकी मजबूरी भी है,
जो मेरी प्यास को पानी की दुआ दे न सका."
क्या सिर्फ मॉनसून ही आखिरी रास्ता है?
इस सवाल का जवाब कागजों पर तो हां में है. मगर दिक्कत फिर वही कि उसे अमली जामा पहनाए तो कौन पहनाए. अंधेरी वेस्ट इलाके में एनजीओ चलाने वाली शीतल एस. सुर्वे कहती हैं,
हमने 'रेन वॉटर हार्वेस्टिंग' (Rain Water Harvesting) को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं. मुंबई में साल में करीब 2000 से 2500 मिलीमीटर बारिश होती है. अगर हर सोसायटी, हर मॉल और हर सरकारी इमारत में बारिश का पानी जमीन के अंदर रीचार्ज करने की व्यवस्था हो, तो शहर का अंडर ग्राउंड वॉटर लेवल सही हो जाए. मगर ऐसा करे कौन?
बस, ये ‘करे कौन?’ वाला सवाल ही सारी समस्या की जड़ है. हकीकत ये है कि महाराष्ट्र सरकार और बीएमसी ने इस दिशा में कभी ज्यादा गंभीर प्रयास नहीं किया. शीतल सुर्वे कहती हैं,
मुंबई का कंक्रीट का जंगल (Concretized land) पानी को जमीन के अंदर जाने ही नहीं देता. सारा पानी नालियों से होकर समुद्र में बह जाता है. हम पानी का खजाना ऊपर से गिरते हुए देखते हैं और उसे नालियों में बहते हुए भी देखते हैं, लेकिन उसे पकड़ नहीं पाते.
देखा जाए तो मुंबई का जलसंकट सिर्फ बारिश की कमी के चलते नहीं है. ये मुंबईकरों की आदतों और सरकारी सिस्टम के ढीलेपन का मिला-जुला नतीजा है. वॉटर सप्लाई में कटौती वाले बीएससी के फरमान ने एक बार फिर आईना दिखाया है कि अगर अब भी पाइपलाइन की मरम्मत, अवैध कनेक्शनों पर लगाम और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य नहीं किया गया, तो वो दिन दूर नहीं जब 'टैंकर माफिया' ही इस शहर के असली 'जल-देवता' बन जाएंगे.
समाधान नए बांधों में नहीं है, समाधान हमारे अपने घरों और सोसायटियों की पाइपलाइनों के रखरखाव में है. मुंबई को मॉनसून की गुलामी से बाहर आना होगा, वर्ना मायानगरी की प्यास कभी नहीं बुझेगी.
आप क्या सोचते हैं? क्या मुंबई को अब डिसैलिनेशन की तरफ बड़ा कदम उठाना चाहिए या फिर पहले हमें अपना सिस्टम ठीक करने पर ध्यान देना चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें.
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