मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन: क्या है 'टनल हूड' टेक्नोलॉजी, जो भारत में पहली बार इस्तेमाल हो रही है?
Mumbai-Ahmedabad Bullet Train: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में भारत पहली बार 'टनल हूड तकनीक' का इस्तेमाल कर रहा है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी तस्वीरें साझा की हैं. जानिए कैसे ये जापानी तकनीक 300 kmph की रफ्तार पर होने वाले 'टनल बूम' के धमाके को रोककर बुलेट ट्रेन के सफर को शांत और सुरक्षित बनाएगी.

भारत की पहली हाई-स्पीड रेल यानी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना कागजों से निकल कर तेजी से जमीन पर उतर रही है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी तस्वीरें साझा की हैं, जिन्होंने इस महा-परियोजना की इंजीनियरिंग बारीकियों की ओर सबका ध्यान खींचा है. इस प्रोजेक्ट में एक ऐसी खास तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो भारतीय रेलवे के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई. इसे नाम दिया गया है- टनल हूड टेक्नोलॉजी (Tunnel Hood Technology).
पहाड़ों को चीरकर निकलने वाली बुलेट ट्रेन जब 300 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से दौड़ेगी, तो यात्रियों को कानों में कोई तकलीफ न हो और न ही आसपास के गांवों में कोई धमाका सुनाई दे, इसी के लिए ये एडवांस जापानी इंजीनियरिंग भारत लाई गई है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ये टनल हूड तकनीक क्या है और ये कैसे काम करती है. सबसे बड़ा सवाल कि इसकी वजह से बुलेट ट्रेन ट्रैक के निर्माण में कितनी सहूलियत होने वाली है?
क्या होती है टनल हूड टेक्नोलॉजी?
‘टनल हूड’ को आप एक तरह के ‘बफर’ या ‘ट्रांजिशन’ ज़ोन की तरह देख सकते हैं. सीधे सादे अंदाज़ में कहें तो ‘टनल हूड’ का मतलब है सुरंग के प्रवेश (Entry) और निकास (Exit) पॉइंट्स पर कंक्रीट के एक खास तरह का स्ट्रक्चर तैयार कर देना. ये ढांचा, मुख्य टनल से करीब 30 से 45 मीटर आगे तक निकला होता है.
जब ट्रेन खुले आसमान से अचानक एक बंद सुरंग में दाखिल होती है, तो हवा और ट्रेन के बीच का संतुलन एकदम से बिगड़ता है. टनल हूड इसी बदलाव को अचानक न करके धीरे-धीरे (Gradual) होने में मदद करता है. इस हिसाब से कहा जा सकता है कि ‘टनल हूड’ के जरिए हवा और बुलेट ट्रेन के एयरोडायनामिक्स के बीच एक तालमेल बिठाने का काम किया जाता है.
'टनल बूम' की समस्या और इसका वैज्ञानिक समाधान
अब बात करते हैं फिजिक्स (Physics) के उस नियम की, जिसकी वजह से इस तकनीक की जरूरत पड़ी. असल में जब कोई बुलेट ट्रेन बेहद तेज रफ्तार से किसी सुरंग में घुसती है, तो वह अपने आगे मौजूद भारी मात्रा में हवा को आगे की तरफ धकेलती है. ये प्रॉसेस बिल्कुल वैसे ही होता है जैसे किसी सिरिंज या सिलेंडर के भीतर पिस्टन काम करता है.
सुरंग के संकरे रास्ते में हवा बहुत तेजी से कंप्रेस हो जाती है और दबाव की एक ताकतवर लहर (Pressure Wave) सुरंग के भीतर आगे बढ़ने लगती है. यदि इस दबाव को रास्ते में कंट्रोल न किया जाए, तो जैसे ही ट्रेन सुरंग के दूसरे छोर से बाहर निकलेगी, वो कंप्रेस हो चुकी हवा एक बहुत बड़े धमाके के साथ बाहर फूटेगी. साइंस की भाषा में इस तेज आवाज को 'टनल बूम' (Tunnel Boom) या 'माइक्रो-प्रेशर वेव जनरेशन' कहा जाता है. ये आवाज इतनी तेज होती है कि जैसे कोई बम फटा हो.
कैसे काम करते हैं इसके वेंट्स?
टनल हूड के डिजाइन में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं इसकी खिड़कियां, जिन्हें तकनीकी रूप से 'प्रेशर-रिलीफ वेंट्स' (Pressure-Relief Vents) कहा जाता है. नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के मुताबिक,
हर टनल हूड पर करीब 20 से 26 विशेष खिड़कियां बनाई जाती हैं. जैसे ही बुलेट ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती है, दबी हुई हवा का एक बड़ा हिस्सा इन वेंट्स के जरिए धीरे-धीरे और नियंत्रित तरीके से वायुमंडल में छोड़ दिया जाता है.
इससे सुरंग के भीतर हवा का भारी दबाव नहीं बन पाता और शॉकवेव्स कमजोर पड़ जाती हैं.
ये तकनीक क्यों है बेहद जरूरी?
अब सवाल ये है कि आखिरकार इस टेक्नॉलजी से होगा क्या? हमारा बुलेट ट्रेन का सफर कितना आसान हो जाएगा और कैसे? इस सवाल के एक नहीं दो-दो जवाब है.
1. यात्रियों का सफर होगा सुपर-स्मूथ300 किमी प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार पर अगर हवा का दबाव अचानक बदल जाए, तो यात्रियों के कानों में तेज दर्द या 'पॉपिंग' (कान बंद होना) जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. जैसा अक्सर हवाई जहाज के टेक-ऑफ या लैंडिंग के समय होता है. टनल हूड इस दबाव के झटके को पूरी तरह सोख लेता है. नतीजा ये होता है कि यात्रियों को सुरंग के भीतर भी एक शांत और आरामदायक सफर का अनुभव मिलता है.
2. आसपास की आबादी को शोर से मुक्तिपहाड़ी इलाकों में सुरंगों के आसपास कई आवासीय बस्तियां और गांव होते हैं. अगर 'टनल बूम' की वजह से लगातार धमाके जैसी आवाजें आएंगी, तो ये ध्वनि प्रदूषण का एक बड़ा कारण बन जाएगा. ये तकनीक उस धमाके को शांत करके आसपास के पर्यावरण और आबादी को किसी भी तरह की अशांति से बचाती है.
बुलेट ट्रेन रूट पर कहां-कहां बन रहे हैं ये हूड?
मुंबई-अहमदाबाद के बीच 508 किलोमीटर लंबे इस पूरे कॉरिडोर का एक बड़ा हिस्सा बेहद चुनौतीपूर्ण रास्तों से होकर गुजरता है. इस रूट पर कुल 8 पहाड़ी सुरंगें (Mountain Tunnels) बनाई जा रही हैं.

इन सभी आठों सुरंगों के दोनों सिरों (शुरुआत और अंत) पर टनल हूड का निर्माण किया जा रहा है. पालघर जिले में स्थित सबसे लंबी सुरंगों (MT-3 और MT-4) पर सबसे बड़े टनल हूड लगाए जा रहे हैं, जिनकी लंबाई 45 मीटर तक है और इनमें 26 प्रेशर-रिलीफ वेंट्स दिए गए हैं. वहीं वलसाड की सुरंग पर 31 मीटर लंबे हूड बनाए जा रहे हैं.
कब शुरू होगी देश की पहली बुलेट ट्रेन?
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, भारत की इस पहली बुलेट ट्रेन परियोजना का काम बेहद सिस्टमेटिक ढंग से कई चरणों में पूरा किया जा रहा है. सरकार का लक्ष्य है कि साल 2027 के अगस्त महीने (स्वतंत्रता दिवस) तक देश की पहली बुलेट ट्रेन का टिकट आम जनता के लिए उपलब्ध हो जाए.
प्रोजेक्ट के परिचालन को कुछ इस तरह चरणों में बांटा गया है,
1. पहला चरण: सूरत से बिलिमोरा के बीच शुरुआती खिड़की खोली जाएगी.
2. दूसरा चरण: वापी से सूरत और फिर वापी से अहमदाबाद को जोड़ा जाएगा.
3. अंतिम चरण: ठाणे से अहमदाबाद के बीच पूरे रूट को पूरी तरह चालू कर दिया जाएगा.
जापान की प्रसिद्ध 'शिनकानसेन' तकनीक पर आधारित ये रेल सेवा न केवल मुंबई और अहमदाबाद के बीच की दूरी को घटाकर करीब दो घंटे कर देगी, बल्कि टनल हूड जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के दम पर भारतीय रेल को वैश्विक मानकों के समकक्ष खड़ा करेगी.
वीडियो: रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पहली बुलेट ट्रेन शुरू करने की तारीख बता दी!

