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मोहम्मद शमी ने रोजा ना रखकर सही किया? इस्लाम के जानकारों ने गहरी बातें बताई हैं

Champions Trophy में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल मैच खेलते हुए भारतीय तेज गेंदबाज Mohammed Shami ने रोज़ा नहीं रखा. इसे लेकर सोशल मीडिया पर उन्हें बुरी तरह ट्रोल किया गया है. शमी के रोज़ा ना रखने पर सवाल खड़े हो रहे हैं. जानते हैं इस्लाम में रोज़ा नहीं रखने को लेकर क्या नियम हैं.

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Mohammed Shami Roza
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच जिताने में मोहम्मद शमी ने अहम भूमिका निभाई थी. (Social Media)
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मौ. जिशान
7 मार्च 2025 (अपडेटेड: 8 मार्च 2025, 11:54 AM IST)
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चैंपियंस ट्रॉफी 2025 के सेमीफाइनल मैच में भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी ने एनर्जी ड्रिंक पी तो बवाल मच गया. दरअसल, मुस्लिमों का पवित्र महीना रमज़ान चल रहा है. इसमें ज्यादातर मुसलमान रोज़े रखते हैं क्योंकि इस्लाम में रोज़े रखना 'फ़र्ज़' है. ये इस्लाम के 5 अरकान (स्तंभ) में से एक है. शमी ने बीच मैदान दिन में जब एनर्जी ड्रिंक पी तो इसका मतलब था कि उन्होंने रोज़ा नहीं रखा. इसी बात को लेकर भारतीय तेज गेंदबाज को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है. कुछ लोग तो शमी को इस्लाम का उपदेश दे रहे हैं.

रोज़ा नहीं रखने के इस्लाम में क्या मायने हैं?

रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नौंवा महीना है. इस पवित्र महीने में हर बालिग और सेहतमंद मुसलमान के लिए रोज़ा रखना फ़र्ज़ (अनिवार्य) है. इस महीने में दुनिया भर के मुसलमान सहरी से लेकर इफ्तार तक रोज़ा रखते हैं. इस बीच कुछ भी खाया-पिया नहीं जाता है. लेकिन कुछ खास मौकों पर रोज़ा रखने से छूट मिल जाती है. रोज़ा माफ नहीं होता, लेकिन अगर छूट जाए तो उसे बाद में रखा जाता है.

4 मार्च को मोहम्मद शमी ने दुबई में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच के दौरान रोज़ा नहीं रखा था. सेमीफाइनल मैच में खुद को हाइड्रेट करने के लिए उन्होंने एनर्जी ड्रिंक पी. किसी भी एथलीट के लिए यह एक नॉर्मल बात है. लेकिन मौका रमज़ान का था तो इसे लेकर कई सवाल खड़े हो गए. मुस्लिम समुदाय के ही कई लोगों ने शमी के रोजा नहीं रखने पर आपत्ति जताई. वहीं कुछ ने कहा कि शमी दुबई के दौरे पर हैं, यानी वे इस समय सफर पर हैं, और सफर के दौरान रोज़ा रखने से छूट मिलती है.

इस मुद्दे पर दी लल्लनटॉप ने पुरानी दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम अहमद साहब से बातचीत की. उन्होंने बताया कि रोज़ा माफ नहीं होता है, बल्कि रोज़ा ना रखने की छूट होती है, जिसे बाद में पूरा करना पड़ता है. अगर किसी की बहुत ज्यादा मजबूरी है, जैसे कोई बेहद बीमार है, और डॉक्टर कहे कि रोज़ा रखने से बीमारी बढ़ सकती है, ऐसे मामलों में रियायत है कि रोज़ा छोड़ दें और जब ठीक हो जाएं तो उसका क़ज़ा करें. यानी बाद में रोज़ा रखें.

मुफ्ती मुकर्रम ने आगे बताया, “अगर महिला का मासिक धर्म चल रहा है तो वो रोज़ा ना रखे. गर्भवती महिला और बच्चों को दूध पिलाने वाली महिला को अगर डॉक्टर रोज़ा छोड़ने के लिए बोलते हैं, तो वे रोज़ा छोड़ सकती हैं. हालांकि, जब हालात ठीक हों तो वे इन छूटे हुए रोज़ों को रखें.”

वहीं सफर के मामले में मुफ्ती मुकर्रम ने बताया, 

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कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इस काबिल ही नहीं कि रोज़े रखें. उदाहरण के लिए, बुज़ुर्ग या कोई ऐसा बीमार जो रोज़ा नहीं रखता सकता. मुफ्ती मुकर्रम ने ऐसे लोगों के बारे में बताया, “जिन लोगों से उम्मीद ही नहीं की जा सकती है कि वे रोज़ा रखें उन्हें रोज़े का फिदया अदा करना पड़ता है. इसका मतलब है कि एक रोज़े के बदले 2 किलो 45 ग्राम गेहूं या आटा या इसकी कीमत गरीबों को दान की जाती है.”

इस्लाम में रोज़े के नियम को लेकर दी लल्लनटॉप ने लखनऊ के मुफ्ती ओसामा इदरीस नदवी से भी बात की. उन्होंने बताया कि इस्लाम में कुछ खास हालात में लोगों को रोज़ा रखने से छूट दी गई है. यह छूट कुरआन और हदीस की रौशनी में निम्नलिखित लोगों के लिए है:

बीमार व्यक्ति: जो इतनी गंभीर बीमारी में हो कि रोज़ा रखना उसकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता हो या बीमारी बढ़ने का खतरा हो.

मुसाफिर (यात्रा करने वाला): जो शरीयत के मुताबिक़ सफर पर हो, उसे रोज़ा छोड़ने की इजाज़त है, लेकिन बाद में उसकी क़ज़ा करनी होगी. हालांकि मुफ्ती ओसामा इदरीस नदवी के मुताबिक सफर कम से कम ‘78 किलोमीटर’ का होना चाहिए.

गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाएं: अगर रोज़ा रखने से खुद या बच्चे की सेहत को नुकसान हो सकता है, तो रोज़ा छोड़ सकती हैं और बाद में इसकी क़ज़ा करेंगी.

बहुत बुज़ुर्ग व्यक्ति: जो इतना कमजोर हो कि रोज़ा नहीं रख सकता और न ही बाद में इसकी क़ज़ा करने की ताकत रखता हो, तो वह 'फिदया' दे सकता है.

मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति: जो किसी मानसिक बीमारी या अक्षमता की वजह से रोज़े का एहसास या इरादा नहीं कर सकता.

हैज़ (मासिक धर्म) या निफ़ास (बच्चे के जन्म के बाद की अवधि) वाली महिलाएं: इन हालात में औरतों के लिए रोज़ा रखना मना (हराम) है, लेकिन बाद में इसकी क़ज़ा करना जरूरी है.

मुफ्ती ओसामा ने भी बताया कि रोज़े की क़ज़ा करने का मतलब है बाद में रोज़ा रखना. अगर किसी ने किसी वाजिब (फ़र्ज़) वजह से रोज़ा नहीं रखा, तो उसे बाद में उन छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा करनी होगी. क़ज़ा का तरीका यह है कि जिस दिन रोज़ा रखना हो, उसी तरह सहरी और इफ्तार का समय ध्यान में रखकर नियत करके रोज़ा रखा जाए. क़ज़ा रोज़ों को लगातार या अलग-अलग दिनों में रखा जा सकता है.

मोहम्मद शमी के ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच के दौरान जूस या सॉफ्ट ड्रिंक पीने को लेकर मुफ्ती ओसामा ने कहा, “इस मामले में कई तरह की बातें हो रही हैं. हालांकि, शरई लिहाज से सफर और कठिन हालात में रोज़े के बदले उसकी क़ज़ा करने की गुंजाइश मौजूद है, और मोहम्मद शमी ने इसी रुख्सत पर अमल किया. ऐसे में इस मसले को बेवजह बहस का मुद्दा बनाना सही नहीं है.”

इस्लामिक स्कॉलर ने कहा कि जहां तक मोहम्मद शमी का ताल्लुक है, तो उन्होंने मैच वाले दिन रोज़ा नहीं रखा और उम्मीद की जा सकती है कि भारत लौटकर इसकी क़ज़ा अदा करेंगे. रोज़ा इस्लाम के बुनियादी फराइज़ में से है और हर मुसलमान के लिए इसकी अदायगी अहम जिम्मेदारी है. 

बता दें कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मिली जीत में शमी की अहम भूमिका थी. इस मैच में उन्होंने 48 रन देकर 3 विकेट झटके थे.

वीडियो: Mohammed Shami के जूस पीने पर हल्ला काटने वाले लोग कौन हैं?

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