संसद में बवाल मचाने वाली किताब क्यों नहीं छपी? एमएम नरवणे ने लल्लनटॉप को बताया था
जनरल नरवणे ने कहा कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ नाम की किताब को उन्होंने एक मेमोर (Memoir) या ऑटोबायोग्राफी के तौर पर लिखी थी. पेंग्विन प्रकाशन ने इसे छापा था.
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राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की जिस किताब का जिक्र संसद में किया, वो प्रकाशित क्यों नहीं हो पाई, जबकि किताब लिखे 15 महीने से ज्यादा हो गए हैं? ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ नाम की ये किताब नरवणे ने अपनी ऑटोबायोग्राफी और संस्मरण के तौर पर लिखी थी.
कुछ समय पहले जब एमएम नरवणे ‘दी लल्लनटॉप’ के न्यूजरूम में गेस्ट बनकर आए थे, तब उन्होंने इस पर बात की थी. किताब पर बहुत खुले नहीं और ‘डिसिप्लिन्ड जनरल’ की तरह उतनी ही बातें कहीं, जितनी उन्हें खुद ठीक लगीं. उन्होंने बताया कि अपने संस्मरणों पर किताब छापने का विचार उन्हें कैसे आया और क्यों इसे प्रकाशित होने में इतनी देरी हो रही है?
जनरल नरवणे ने कहा कि ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ नाम की किताब को उन्होंने एक मेमोर (Memoir) या ऑटोबायोग्राफी के तौर पर लिखा. पेंग्विन प्रकाशन ने इसे छापा था. फिलहाल वह रक्षा मंत्रालय के पास है, जहां उसका रिव्यू किया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि उनका काम सिर्फ किताब लिखना था. अब उसे प्रकाशित करने के लिए क्लियरेंस से संबधित बातचीत पेंग्विन प्रकाशन रक्षा मंत्रालय से कर रहा है. जब क्लियरेंस आ जाएगा, तभी किताब छपेगी.
किताब लिखने का विचार कैसे आया?
जनरल नरवणे कहते हैं कि इसके पीछे भी एक स्टोरी है. उनका इरादा ऑटोबायोग्राफी या संस्मरण लिखने का नहीं था. वो दिवंगत पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत पर पेंग्विन से ही छपी एक किताब के विमोचन कार्यक्रम में गए थे. ये मार्च 2023 की बात है. नरवणे ने बताया,
“इस दौरान पेंग्विन पब्लिशर्स की तरफ से आए लोगों से मैंने मजाक-मजाक में कहा कि आप मेरी किताब कब छपवा रहे हो? तो उन्होंने पूछा कि क्या आपने किताब लिखी है? मैंने कहा कि अभी तो नहीं लेकिन अगर आप कहते हो तो मैं लिख दूंगा. इसके बाद पब्लिशर्स ने कहा कि यह तो उनके लिए गर्व की बात होगी.”
पूर्व जनरल ने कहा कि इसके बाद उन्होंने ये किताब लिखकर पब्लिशर को दे दी.
हालांकि, इस किताब की रिलीज रोक दी गई है क्योंकि सरकार उसका रिव्यू कर रही है. किताब के तमाम ब्योरे पब्लिक डोमेन में भी आए. एक साल से भी ज्यादा समय से किताब रिव्यू के लिए रक्षा मंत्रालय के पास है और अभी तक प्रकाशित नहीं हो पाई है.
इस पर नरवणे कहते हैं कि जब हम किताब लिखते हैं तो नेशनल सिक्योरिटी के लिए उसका रिव्यू किया जाना जरूरी होता है. इसमें कोई खराबी नहीं है. रिव्यू में देखा जाता है कि गलती से या अनजाने में कहीं कोई ऐसी बात न छप जाए, जिससे बाकी देशों के साथ हमारे संबंध बिगड़ जाएं. इसलिए किताब का रिव्यू जरूर होना चाहिए.

रिव्यू में इतनी देरी क्यों लग रही है?
जनरल नरवणे ने इसका जवाब दिया कि रिव्यू में कई मंत्रालय शामिल होते हैं. इसकी वजह से ज्यादा टाइम लग सकता है. हर मिनिस्ट्री से पूछना पड़ेगा कि इसके ऊपर उनकी क्या राय है? अगर उस किताब में मान लो सड़कों के बारे में कुछ लिखा है तो सड़क-परिवहन मंत्रालय से भी पूछना पड़ेगा. अगर किसी देश के साथ संबंध के बारे में है तो विदेश मंत्रालय को भी पूछना पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि रिव्यू सिर्फ रक्षा मंत्रालय के अंदर ही सीमित है. रिव्यू में दूसरे मिनिस्ट्री से भी पूछना पड़ता है. उनकी भी राय लेनी पड़ती है इसलिए काफी वक्त लग सकता है.
सेना के अधिकारी की लिखी किताब के रिव्यू का प्रावधान आर्मी रूल्स में भी है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आर्मी रूल्स, 1954 का सेक्शन 21 कहता है कि सेना में सेवा दे रहे किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक मुद्दे, सैन्य सेवा से जुड़ी जानकारी सीधे या परोक्ष रूप से प्रेस को देने की इजाजत नहीं है. इसके अलावा बिना केंद्र सरकार की पहले से इजाजत लिए कोई भी सैनिक किसी राजनीतिक मुद्दे या सर्विस से जुड़े विषयों से संबंधित कोई किताब, लेटर, आर्टिकल या कोई और दस्तावेज प्रकाशित नहीं करवा सकता और न ही करवाने की वजह बन सकता है. सेवा में मौजूद अधिकारी बिना किसी पूर्व अनुमति के किसी राजनीतिक मुद्दे पर या सेना से जुड़े विषय पर अपने विचारों के साथ कोई स्पीच, लेक्चर या रेडियो संबोधन भी नहीं दे सकता.
हां, अगर कोई सैन्यकर्मी ऐसी किताब लिखता है, जिसका उसकी सर्विस से कोई लेना-देना नहीं है. जो पूरी तरह साहित्यिक या कलात्मक कृति है तो इन नियमों का उस पर लागू होना जरूरी नहीं है.
हालांकि, ये नियम सर्विस के दौरान सैनिकों पर लागू होते हैं. लेकिन क्या रिटायर्ड अफसरों के लिए भी यही नियम होते हैं?
रिटायर्ड सैन्य अफसरों के लिए आर्मी रूल्स में ऐसे कोई निर्देश साफ-साफ नहीं दिए गए हैं. लेकिन केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत कहा गया है कि ऐसे रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी, जिन्होंने खुफिया या सुरक्षा से जुड़े संगठनों में काम किया है, वो रिटायरमेंट के बाद संगठन से जुड़ी कोई भी जानकारी बिना पूर्व अनुमति के प्रकाशित नहीं कर सकते.
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