'वकील' ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट से पहले और कहां-कहां पैरवी कर चुकी हैं?
Mamata Banerjee के राजनीतिक करियर का ये पहला मौका नहीं था जब वो नेता से वकील की भूमिका में अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ती नजर आईं. साल 1990 के दशक में वाम मोर्चे के शासन के दौरान भी ममता सड़क से बंगाल की अदालतों तक अपनी राजनीतिक लड़ाई खुद लड़ती रही हैं.

4 फरवरी 2026. सुप्रीम कोर्ट में आम दिनों के मुकाबले हलचल बढ़ी थी. वजह थीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. वो खुद अपनी पार्टी के मुकदमेंं की पैरवी के लिए उतरी थीं. किसी पेशेवर वकील की तरह कोर्ट में उन्होंने अपनी सरकार का पक्ष रखा.
ममता बनर्जी के इस कदम ने कई लोगों को चौंका दिया. लेकिन टीएमसी प्रमुख के करियर में यह पहला मौका नहीं था, जब वह काले कोट में नजर आईं. वाम मोर्चे की सरकार के दौरान भी ममता बनर्जी कोलकाता के मजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर बंगाल की जिला अदालतों तक में जिरह कर चुकी हैं.
बार एंड बेंच के रिपोर्टर देबायन रॉय की रिपोर्ट के मुताबिक, ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का ये पहला मौका नहीं था जब वो नेता से लेकर वकील तक की भूमिका में अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ती नजर आईं. साल 1990 के दशक में वाम मोर्चे के शासन के दौरान भी दीदी सड़क से बंगाल की अदालतों तक अपनी राजनीतिक लड़ाई खुद लड़ती रही हैं.
मजिस्ट्रेट कोर्ट में लड़ती रही हैं राजनीतिक लड़ाई
जून 2003 में कलकत्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के मेयर-इन-काउंसिल के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया था. इनकी गिरफ्तारी तब के म्युनिसिपल कमिश्नर देबाशीष सोम की शिकायत पर हुई थी. उन्होंने इन सदस्यों के खिलाफ कॉरपोरेशन के काम में रुकावट डालने और गैर कानूनी आचरण करने की शिकायत दर्ज कराई थी.
कोलकाता के बैंकशाल कॉम्पलेक्स स्थित एक कोर्ट में इन पर मुकदमा चला. ममता बनर्जी ने इनकी पैरवी के लिए काला चोगा पहना. उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक मकसद से की गई हैं. सुनवाई के बाद कोर्ट ने आरोपियों को जमानत दे दी.
21 जुलाई, 1993 को कोलकाता में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता राइटर्स बिल्डिंग की ओर मार्च कर रहे थे. तब राइटर्स बिल्डिंग में बंगाल के मुख्यमंत्री का ऑफिस हुआ करता था. उनको रोकने के लिए कोलकाता पुलिस ने गोलीबारी कर दी. फायरिंग में यूथ कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए. दूसरे कार्यकर्ताओं के खिलाफ दंगा और हिंसा फैलाने के आरोप में मुकदमें लाद दिए गए.
तब ममता बनर्जी कांग्रेस में ही थीं. इन कार्यकर्ताओं की पैरवी के लिए वो खुद कोर्ट में पेश हुईं. उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि कांग्रेसी कार्यकर्ता पुलिसिया बर्बरता का शिकार हुए हैं और बल प्रयोग को सही ठहराने के लिए उन पर मुकदमें दर्ज किए गए हैं.
साल 1996 में एक बार फिर से ममता बनर्जी बतौर वकील अदालत में उतरीं. मामला टॉलीगंज के विधायक पंकज बनर्जी से जुड़ा था. उन पर रीजेंट पार्ट पुलिस स्टेशन पर कथित हमले से जुड़े एक मामले में आरोप लगे थे. कोर्ट में दीदी ने पुलिस के बयान को चुनौती देते हुए बताया कि उनके मुवक्किल को राजनीतिक मकसद से फंसाया जा रहा है.
बंगाल के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में भी की पैरवी
देबायन रॉय के मुताबिक, 1990 के दशक के शुरुआत में पुलिस फायरिंग से जुड़े मामलों में ममता बनर्जी कोलकाता से बाहर बंगाल के दूसरे जिलों में जाकर भी मुकदमेंं की पैरवी कर चुकी हैं. दक्षिण दिनाजपुर जिले में पुलिस फायरिंग में एक छात्र की मौत हो गई थी. ममता बनर्जी पीड़ित पक्ष के वकील के तौर पर दिनाजपुर के बालुरघाट कोर्ट में पेश हुईं. उन्होंने अपनी दलीलों में पुलिस की फायरिंग पर सवाल उठाया.
कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की मौत के मामले में ममता बनर्जी हुगली जिले के चिनसुराह कोर्ट में भी पेश हुईं. वहां उन्होंने पीड़ित पक्ष की ओर से जिरह करते हुए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.
ममता बनर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से बैचलर ऑफ लॉ (LLB) की डिग्री ली है. वकालत की डिग्री लेने के बाद ममता बनर्जी ने पारंपरिक तौर पर वकालत की या नहीं, इसकी जानकारी नहीं है. लेकिन एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया है कि वह पश्चिम बंगाल स्टेट बार काउंसिल में एनरोल्ड हैं. कलकत्ता हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की 2023 की मेंबर्स डायरेक्टरी में भी सदस्य के तौर पर उनका नाम लिस्टेड है.
SIR से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर ममता बनर्जी ने अपने तीन दशक पुराने वकालत के करियर में एक और अध्याय जोड़ लिया है. इसमें डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से लेकर मजिस्ट्रेट कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में जिरह करना शामिल है.
वीडियो: सुप्रीम कोर्ट पहुंची ममता बनर्जी, सुनवाई के बाद क्या बोले CJI?

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