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'मां के धर्म से पहचाना जाएगा बच्चा', महाराष्ट्र सरकार के धर्मांतरण विरोधी बिल में और क्या है?

बिल में भी यह भी बताया गया कि अगर कोई अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसे जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले सूचना देनी होगी. साथ ही धर्म बदलने के बाद उसका घोषणापत्र भी जमा करना होगा.

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14 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 09:06 PM IST)
Maharashtra
महाराष्ट्र के विधानसभा में 'अवैध धर्मांतरण बिल' पेश किया गया. (फोटो- आज तक)
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महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने विधानसभा में शुक्रवार 13 फरवरी को 'अवैध धर्मांतरण बिल' पेश किया. इस बिल के मुताबिक, धर्म परिवर्तन के बाद पैदा हुआ बच्चा, उस धर्म का माना जाएगा, जो उसकी मां शादी के पहले मानती थी. अगर यह बिल विधानसभा में पास हो जाता है तो महाराष्ट्र ऐसा करने वाला देश का 10वां राज्य बन जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बिल के हवाले से बताया गया कि अगर कोई महिला अवैध धर्मांतरण के बाद बच्चे को जन्म देती है तो वह (बच्चा) उस धर्म का माना जाएगा, जो शादी या रिश्ते से पहले उसकी मां का धर्म था.

बिल में यह भी साफ किया गया कि देश का संविधान धर्म की आजादी की गारंटी देता है लेकिन जब कभी सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की बात आती है तो धर्म उसके अधीन माना जाता है.

बिल में आगे बताया गया कि अगर कोई अपना धर्म बदलना चाहता है तो उसे जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही धर्म बदलने के बाद उसका घोषणापत्र भी जमा करना होगा. ऐसा करना अनिवार्य होगा. अगर कोई भी शख्स इस नियम को तोड़ता है तो उसे 7 साल की जेल और 5 लाख रुपये तक जुर्माना भरना पड़ेगा. अगर वह ऐसा अपराध लगातार करता है तो उसे 10 साल की सख्त सजा के साथ 7 लाख का जुर्माना भरना पड़ेगा.

बिल में कथित अवैध धर्मांतरण के आधार पर शादी के बाद पैदा हुए बच्चों के अधिकारों पर ध्यान दिया गया है. यह साफ किया गया कि कानून के मुताबिक ऐसे बच्चे को माता और पिता दोनों की प्रॉपर्टी का उत्तराधिकारी होने का अधिकार प्राप्त होगा. वहीं, बिल में बच्चे के भरण-पोषण का भी ध्यान रखा गया.

बताया गया कि बच्चा 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का भी हकदार होगा. बिल में बच्चे की कस्टडी के भी प्रावधान हैं. बच्चे की कस्टडी मां के पास ही रहेगी, जब तक कोर्ट इसके खिलाफ कोई आदेश न दे.  

रिपोर्ट में बताया गया कि हरियाणा जैसे कुछ राज्य ऐसी शादियों से पैदा हुए बच्चों के उत्तराधिकार के अधिकारों को मान्यता देते हैं जबकि, महाराष्ट्र का बिल मुख्य रूप से बच्चों के धर्म पर केंद्रित है और उसे परिभाषित करता है. बता दें कि इस बिल को बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने कथित तौर पर बढ़ते "गैर-कानूनी" धार्मिक धर्मांतरण और सामूहिक धर्मांतरण की घटनाओं का हवाला देते हुए एक विशेष समिति का गठन (SIT) गठन किया था. इस समिति में पुलिस महानिदेशक (DGP) भी शामिल थे. SIT ने ही 'महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम' बनाने की सिफारिश की थी.

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अभी तक जिन राज्यों ने इसी तरह के कानून पास किए हैं, उनमें झारखंड (2017), उत्तराखंड (2018), हिमाचल प्रदेश (2019), उत्तर प्रदेश (2020), गुजरात, मध्य प्रदेश (2021), हरियाणा. कर्नाटक (2022) और राजस्थान (2025) का नाम शामिल है.

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