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जज के सामने पत्नी का मृत भ्रूण रख दिया, 200 करोड़ का हर्जाना मांग रहा था

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक व्यक्ति ने मारुति सुजुकी के खिलाफ 200 करोड़ रुपये के मुआवजे का दावा ठोका था. उसने कंपनी को अपनी पत्नी के कथित गर्भपात के लिए जिम्मेदार बताया था. अपने दावे को साबित करने के लिए उसने ऐसी हरकत की जिससे कोर्टरूम में अफरातफरी मच गई.

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19 मार्च 2026 (अपडेटेड: 19 मार्च 2026, 08:20 PM IST)
Madya Pradesh High Court foetus judge maruti suzuki
जबलपुर हाईकोर्ट ने दयाशंकर पांडे की याचिका खारिज कर दी. (इंडिया टुडे)
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, जबलपुर. यहां एक याचिका पर सुनवाई हो रही थी. याचिका मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ थी. कथित तौर पर अपनी पत्नी के गर्भपात के लिए याचिकाकर्ता ने कंपनी को जिम्मेदार ठहराया था और मुआवजे के तौर पर 200 करोड़ का दावा किया था. दावे को साबित करने के लिए उसने अपनी पत्नी का मृत भ्रूण जज के डाइस पर रख दिया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता की इस हरकत से कोर्ट में अफरा-तफरी मच गई. लोग सकते में आ गए. सुनवाई कर रहे जज ने उसे जमकर फटकार लगाई. उन्होंने कहा कि अदालत को नाटक और इमोशन दिखाने का मंच नहीं बनाया जा सकता. 

जस्टिस हिमांशु जोशी ने याचिकाकर्ता के इस हरकत पर आपत्ति जताते हुए कहा, 

याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान कोर्ट के डाइस पर भ्रूण रख दिया था. यह हरकत गलत और निंदनीय है. न्याय कानून के मुताबिक दिया जाता है. भावना या नाटकीय व्यवहार के आधार पर कोर्ट में फैसले नहीं किए जाते.

याचिकाकर्ता का नाम दयाशंकर पांडे है. वो रीवा के रहने वाले हैं. दयाशंकर पहले जबलपुर के शुभ मोटर्स में अकाउंटेंट थे. उनका दावा है कि उन्हें शोरूम में करीब 200 करोड़ रुपये के घोटाले की जानकारी मिली. जब उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उन पर और उनके परिवार पर जानलेवा हमले शुरू हो गए. 

दयाशंकर पांडे का आरोप है कि इसी वजह से उनके परिवार पर कार से हमला किया गया. इस हमले के चलते उनकी पत्नी का मिसकैरेज (गर्भपात) हो गया. इसी मृत भ्रूण को वो सबूत के तौर पर कोर्ट में लाए थे.

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 11 मार्च को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई सहायक दस्तावेज नहीं दिया है. यहां तक कि पुलिस में की गई शिकायत भी कोर्ट में प्रस्तुत नहीं की है. कोर्ट ने आगे कहा,

 इस याचिका में कोई स्पष्टता नहीं है. याचिकाकर्ता ने पहले इच्छामृत्यु की मांग की थी. फिर अपना रुख बदल लिया और अब मुआवजे के तौर पर हर्जाना मांग रहा है.

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने याचिका को अस्पष्ट और बेबुनियाद बताते हुए इसे खारिज कर दिया. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्याय का फैसला कानून के आधार पर न्याय का फैसला होता है. सहानुभूति जगाने के लिए तमाशा करने से न्याय नहीं मिलता.

वीडियो: अटॉर्नी जनरल ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के किस फैसले पर टिप्पणी करते हुए 'फिल्मी' कहा?

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