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'पति के जिंदा रहते मंगलसूत्र उतारना मानसिक क्रूरता...', हाई कोर्ट ने तलाक का आदेश बरकरार रखा

Madras High Court ने कहा कि कोई भी शादीशुदा हिंदू महिला अपने पति के जीवित रहते हुए अपना मंगलसूत्र नहीं उतारती. कोर्ट ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.

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3 जून 2026 (अपडेटेड: 3 जून 2026, 02:10 PM IST)
Hindu Wife Removing mangalsutra, Madras High Court
हाई कोर्ट ने कहा कि मंगलसूत्र उतारना पति के प्रति मानसिक क्रूरता के बराबर होगा. (सांकेतिक फोटो: AI/Gemini)
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मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू पत्नी का मंगलसूत्र उतारना पति के प्रति मानसिक क्रूरता के बराबर होगा. कोर्ट ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने पति की याचिका पर क्रूरता के आधार पर तलाक को मंजूरी दे दी थी, जिसे पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. जस्टिस पी. वडामलाई की एकल पीठ ने निचली अदालत के तलाक के फैसले को बरकरार रखा है.

मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा?

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलसूत्र हटाने के मुद्दे पर मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस पी. वडामलाई ने एक डिवीजन बेंच के फैसले का जिक्र किया, जिसमें यह कहा गया था,

"यह एक जानी-मानी बात है कि कोई भी शादीशुदा हिंदू महिला अपने पति के जीवित रहते, कभी भी अपनी ‘थाली’ (मंगलसूत्र) नहीं उतारती. पत्नी के गले में पहनी थाली एक पवित्र चीज है, जो शादीशुदा जिंदगी के बने रहने का प्रतीक है और इसे केवल पति की मृत्यु के बाद ही उतारा जाता है. इसलिए, याचिकाकर्ता/पत्नी द्वारा थाली को हटाना एक ऐसा काम माना जा सकता है, जो मानसिक क्रूरता के सबसे ऊंचे दर्जे को दिखाता है. क्योंकि इससे प्रतिवादी (पति) को बहुत ज्यादा तकलीफ हो सकती थी और उसकी भावनाओं को ठेस पहुंच सकती थी."

दक्षिण भारत में मंगलसूत्र को 'थाली' कहा जाता है. 

सुनवाई के दौरान पत्नी ने खुद यह स्वीकार किया कि उसने अपनी 'थाली' (मंगलसूत्र) उतार दी थी. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पति के इस आरोप को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि पत्नी ने ईसाई धर्म अपना लिया है.

हाई कोर्ट ने यह भी माना कि पत्नी का पति के वरिष्ठ अधिकारियों को उसके खिलाफ शिकायतें भेजना मानसिक क्रूरता का आधार है. इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि पति क्रूरता साबित करने में सफल रहा है. इस तरह हाई कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा दिया गया तलाक का आदेश बरकरार रखा. 

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक रिटायर्ड सेना कर्मी और उनकी पत्नी का है. कपल की 1977 में शादी हुई थी और दोनों का एक बेटा और एक बेटी है. पति के मुताबिक, शादी की शुरुआत से ही पत्नी अक्सर उससे झगड़ा करती थी और कहती थी कि उसके कई औरतों के साथ नाजायज संबंध हैं. पति का आरोप है कि पत्नी उसे सबके सामने बेइज्जत करती थी.

उसने यह भी बताया कि पत्नी ने सेना में उसके सीनियर अधिकारियों को चिट्ठियां भी भेजी थीं और उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी, जिसके लिए उसे 7 साल की सजा हुई थी. इसे बाद में अपील करने पर कम कर दिया गया था.

पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने ईसाई धर्म अपना लिया था और उसे मानसिक तौर पर बहुत परेशान किया था. उसने दलील दी कि पत्नी उसे छोड़कर भी चली गई थी और अब दोनों के फिर से साथ रहने की गुंजाइश नहीं थी.

पत्नी ने क्या आरोप लगाया?

दूसरी तरफ, पत्नी ने पति पर दूसरी औरतों के साथ नाजायज संबंध रखने का आरोप लगाया. उसने बताया कि जब उसने इस बारे में पति से पूछा, तो उसने उसे और बच्चों को घर के अंदर बंद कर दिया और घर में आग लगा दी. इसके लिए उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. पत्नी ने दलील दी कि पति एक दूसरी औरत के साथ रहने लगा था और उस पर जोर डाल रहा था कि वह उसे उस दूसरी औरत से शादी करने की इजाजत दे दे.

ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, ‘पति को छोड़ पत्नी का अपना करियर बनाना क्रूरता नहीं’

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोप है कि जब पत्नी ने मना कर दिया, तो पति ने उसका दाहिना अंगूठा काट दिया. इसके लिए बेटे ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और पिता को सजा हुई. इसके बाद पति ने निचली अदालत में तलाक की अर्जी दी.

अदालत ने पति की अर्जी मान ली और तलाक मंजूर कर लिया. पत्नी ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ जाकर अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) में चुनौती दी. लेकिन फास्ट ट्रैक कोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया. इसके बाद पत्नी ने मद्रास हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की. हाई कोर्ट ने भी तलाक का फैसला बरकरार रखा.

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