मध्यप्रदेश के सीधी में एक साल में 53 प्रेग्नेंट महिलाओं की मौत, अस्पतालों को खुद 'इलाज' की जरूरत
मध्य प्रदेश मातृ मृत्यु दर (MMR) के मामले में सबसे खराब परफॉर्म करने वाले राज्यों में दूसरे नंबर पर है. यहां MMR 159 है. साल 2018-19 में तो ये आंकड़ा 173 था. सीधी जिले की स्थिति तो और भी खराब है. यहां मातृ मृत्यु दर 211 है, राज्य के औसत दर से भी काफी ज्यादा. इंडियन एक्सप्रेस ने इन 53 मौतों के पीछे के कारणों की पड़ताल की है.

मध्य प्रदेश के सीधी जिले में पिछले साल अप्रैल से मार्च 2026 के बीच 53 प्रेग्नेंट महिलाओं की मौत हुई है. इसमें प्रेग्नेंसी के दौरान हुई मौत, डिलीवरी के दौरान या फिर डिलीवरी के बाद हुई मौतें शामिल हैं. इनमें सबसे कम उम्र की महिला की उम्र मात्र 19 साल थी. जबकि मरने वाली महिलाओं की औसत उम्र 26 साल है.
राज्य के पब्लिक हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टरेट ने पत्र, फोन, कॉल, वॉट्सऐप मैसेज और रिव्यू मीटिंग के जरिये इस मुद्दे को उठाया था, लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. अधिकारियों की पेशानी पर बल पड़ने के वाजिब कारण हैं. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के मुताबिक भारत में मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortility Rate- MMR) प्रति एक लाख बर्थ पर 87 रह गई है.
मध्य प्रदेश मातृ मृत्यु दर (MMR) के मामले में सबसे खराब परफॉर्म करने वाले राज्यों में दूसरे नंबर पर है. यहां MMR 159 है. साल 2018-19 में तो ये आंकड़ा 173 था. सीधी जिले की स्थिति तो और भी खराब है. यहां मातृ मृत्यु दर 211 है, राज्य के औसत दर से भी काफी ज्यादा. इंडियन एक्सप्रेस ने इन 53 मौतों के पीछे के कारणों की पड़ताल की है.
महिलाओं की मौत से जुड़े कुछ फैक्ट्स
# 53 में से 16 महिलाओं की मौत रीवा स्थित श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में हुई, जो सीधी से लगभग 70 किलोमीटर दूर है.
# 13 महिलाओं ने रास्ते में दम तोड़ा. एंबुलेंस, भाड़े की गाड़ी या प्राइवेट गाड़ी में.
# 13 महिलाओं की मौत घर पर हुई. 5 मौत सीधी जिला अस्पताल में और 4 प्राइवेट हॉस्पिटल में हुई.
# एक मौत नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज और एक मौत संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल रीवा में हुई.
# मरने वाली महिलाओं में ज्यादातर पहली या दूसरी बार मां बनने जा रही थीं. जिन 40 मामलों में कारण पता चला, उनमें से कई ऐसे केस थे जिन्हें समय रहते इलाज से रोका जा सकता था.
# डिलीवरी के दौरान बहुत ज्यादा ब्लीडिंग (हेमरेज) से 12 मौतें हुईं. वहीं हाई ब्लड प्रेशर और एक्लेम्पसिया से 7 मौत, जबकि सीरियस एनीमिया से 5 महिलाओं की जान गई.
# 16 केस में आयरन और फोलिक एसिड की कमी को बड़ा कारण बताया गया. इंफेक्शन और सेप्सिस से 4 महिलाओं की जान गई और प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताओं के चलते 3 जानें गईं.
इन सब के अलावा एक महिला की मौत प्रेग्नेंसी के दौरान सांप काटने से और दूसरी आत्महत्या के चलते हुई. 13 मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब भी पेंडिंग है.
जिला अस्पताल में स्टाफ की कमी, सुविधाएं भी नहीं
सीधी जिला अस्पताल में अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच 10,022 महिलाएं भर्ती हुईं. 5,922 की डिलीवरी हुई. इनमें से सिर्फ 726 सी-सेक्शन डिलीवरी (सिजेरियन डिलीवरी) हुए. स्वास्थ्य विभाग की मानें तो ये औसत से कम है. कारण बताया गया कि अस्पताल में सिर्फ एक एनेस्थीसियोलॉजिस्ट है.
हॉस्पिटल को इस दौरान 1,109 रेफरल मिले. वहीं इसने खुद 429 मरीजों को बड़े हॉस्पिटल में रेफर किया. जिले में स्त्री रोग विशेषज्ञ के चार पद स्वीकृत हैं. लेकिन ये संख्या पर्याप्त नहीं हैै. मैटरनिटी वार्ड में सिर्फ 22 कर्मचारी हैं, जबकि जरूरत कम से कम 40 की है.
अधिकारियों के मुताबिक, जिला अस्पताल में अलग ऑपरेशन थिएटर नहीं है. पर्याप्त ब्लड स्टोरेज नहीं है. वहीं चाइल्ड डिजीज स्पेशलिस्ट्स की भी कमी है. हॉस्पिटल में एडिशनल एनेस्थीसियोलॉजिस्ट और वेंटिलेशन यूनिट भी नहीं है. ब्लड बैंक भी खस्ताहाल है. अप्रैल में अस्पताल के पास सिर्फ 7 यूनिट खून था. बाद में ब्लड डोनेशन कैंप लगाकर 53 यूनिट खून जुटाया गया.
गांव के स्वास्थ्य केंद्रों की हालत भी खराब
सीधी जिले के रामपुर नैकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में 5 की जगह सिर्फ 3 स्वास्थ्यकर्मी हैं. 8 की जगह सिर्फ 6 स्टाफ नर्स हैं. इसके अलावा बरसात में अस्पताल तक आने वाली सड़कों पर पानी लग जाता है. कई बार महिलाओं को 2 से 3 किलोमीटर खाट पर उठाकर एंबलेंस तक लाना पड़ता है.
सिहावल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति भी खराब है. यहां हाई ब्लड प्रेशर और डिलीवरी के दौरान ब्लीडिंग रोकने वाली जरूरी दवाइयों की कमी है. तीन डिलीवरी टेबल में से दो खराब हैं और स्थायी डॉक्टर तक नहीं हैं.
मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के ऑफिस ने इस मामले में कॉमेंट करने से इनकार कर दिया. वहीं स्वास्थ्य विभाग ने घिसा पिटा जवाब दिया कि राज्य में मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है. हालांकि सीधी के आंकड़े दिखाते हैं कि जमीन पर अब भी स्वास्थ्य ढांचे में गंभीर कमियां हैं.
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