रेस्टोरेंट बिल में अपनी मर्जी से जोड़ सकते हैं सर्विस चार्ज? कंज्यूमर कोर्ट ने क्लियर कर दिया
Lawyer service charge case: जालंधर के कंज्यूमर कमीशन में एक वकील ने आरोप लगाया कि रेस्टोरेंट ने उससे कथित तौर पर 151.53 रुपये का सर्विस चार्ज लिया है. और जब उन्होंने टैक्स पर आपत्ति जताई, तो कर्मचारियों ने उसके साथ बतमीजी की. जिस पर 4 जून को आयोग ने सुनवाई की.

रेस्टोरेंट में खाना खाया. रेस्टोरेंट का बिल आया तो इसमें सर्विस चार्ज भी जुड़ा था. सर्विस टैक्स हटाने को कहा गया तो रेस्टोरेंट के लोगों ने कथित तौर पर बदतमीजी की. जिसके साथ ये सब हो रहा था, वो पेशे से वकील निकला. तो मामला जालंधर के कंज्यूमर कमीशन तक पहुंच गया. शिकायतकर्ता वकील ने आरोप लगाया कि वह अपने परिवार के साथ डिनर पर गया था. वहां रेस्टोरेंट ने उससे कथित तौर पर 151.53 रुपये का सर्विस चार्ज लिया. लेकिन जब उन्होंने टैक्स पर आपत्ति जताई तो कर्मचारियों ने उसके साथ बदतमीजी की.
मामले को सुनने के बाद कमीशन ने रेस्टोरेंट को आदेश दिया कि वो पीड़ित वकील को 15 हजार रुपये का मुआवजा दें.
क्या है पूरा मामला. विस्तार से बताते हैं. फिर ये भी बताएंगे कि कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला 2023 का है. जालंधर में प्रैक्टिस करने वाले संजीव दुग्गल अपने परिवार के साथ बुफे डिनर के लिए एक रेस्टोरेंट गए थे. उन्होंने रेस्टोरेंट के स्टाफ को बताया कि उनके साथ तीन बालिग और एक नाबालिग है. फिर भी उन्होंने चार बड़े लोगों के लिए बुफे का चार्ज लगाया. वकील ने शराब भी खरीदी थी और उसका बिल बनवाया था. इन बिलों में 128.13 रुपये और 23.40 रुपये के सर्विस चार्ज (कुल 151.53 रुपये) 3 प्रतिशत की दर से लगाए गए थे.
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जब उन्होंने सर्विस चार्ज और नाबालिग बच्चे के लिए बुफे का चार्ज लगाने पर आपत्ति जताई तो रेस्टोरेंट के स्टाफ ने उनके साथ बदतमीजी की. दुग्गल ने कहा कि कुछ खाने की चीजों और खासकर मछली की क्वालिटी बेकार थी. इसके बाद वकील ने सर्विस चार्ज की वापसी, सर्विस में कमी, अनुचित ट्रेड प्रैक्टिस, मानसिक परेशानी, उत्पीड़न और अपमान का दावा करते हुए 5 लाख रुपये का मुआवजा और कानूनी कार्यवाही की मांग की.
रेस्टोरेंट ने क्या दलील दी?रेस्टोरेंट की तरफ से वकील आईएस भाटिया पेश हुए. उन्होंने बदतमीजी, सर्विस में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के सभी आरोपों से इनकार किया. उन्होंने कहा कि शिकायत गलतफहमी पर आधारित थी और बुरी नियत से दायर की गई थी. रेस्टोरेंट ने दावा किया कि बिल में ली गई रकम को स्टाफ कंट्रीब्यूशन/सर्विस चार्ज के तौर पर दिखाया गया था. इसे मेनू कार्ड पर साफ-साफ लिखा था. उनकी पॉलिसी थी कि अगर कोई ग्राहक इस पर आपत्ति जताता है तो वे टैक्स हटा देते हैं. लेकिन शिकायतकर्ता ने उस समय कोई आपत्ति नहीं जताई थी. न ही नाबालिग के लिए खाना ऑर्डर किया था. उन्होंने बिना किसी दिक्कत के बिलों का भुगतान किया था.
कोर्ट ने क्या कहा?मामले पर 4 जून को कमीशन के प्रेसिडेंट हरवीन भारद्वाज और सदस्य ज्योत्सना और जसवंत सिंह ढिल्लों, वकील संजीव दुग्गल की बेंच ने कहा,
अगर मान भी लिया जाए कि 'स्टाफ कंट्रीब्यूशन' शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है. तब भी रेस्टोरेंट की जिम्मेदारी है कि वे ग्राहकों को ऐसे चार्ज लगाने के नियमों और जानकारी के बारे में बताएं. पूरी दलीलों और यहां तक कि दस्तावेजों में भी कहीं यह नहीं दिखता कि शिकायतकर्ता को कभी भी ऐसे सर्विस चार्ज/स्टाफ कंट्रीब्यूशन के लगाए जाने के बारे में पहले से बताया गया था.
इसके बाद कमीशन ने रेस्टोरेंट को आदेश दिया कि वह शिकायतकर्ता को मानसिक तनाव और उत्पीड़न के लिए मुआवजा दे. इसमें 45 दिनों के अंदर 15 हजार रुपये का कानूनी खर्च भी शामिल हो. हालांकि, शिकायतकर्ता ये साबित नहीं कर पाया कि उसके साथ रेस्टोरेंट के कर्मचारियों ने गलत व्यवहार किया था. कमीशन ने ये भी कहा कि आरोप लगाने से किसी रेस्टोरेंट का खाना भी खराब क्वालिटी का नहीं हो जाता है.
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