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कोलकाता में कैसे बसी चाइनीज कम्युनिटी? SIR में सैकड़ों 'चीनी' वोटरों के नाम कटे

स्पेशल इंटेंस रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया के दौरान कोलकाता की तीन विधानसभा सीटों से चीनी समुदाय के 484 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. ये कोलकाता में चीनी कम्युनिटी की घटती आबादी से चिंतित लोगों को और ज्यादा परेशान कर दिया है.

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Kolkata’s Chinese community deleted during SIR
कोलकाता के साकड़ों चीनी वोटर्स के नाम कटे (india today)
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राघवेंद्र शुक्ला
12 जनवरी 2026 (Published: 11:31 PM IST)
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एक वक्त था जब कोलकाता की गलियों से चीनी (Chinese) वोटरों का जत्था वोट देने के लिए निकलता था तो लोग अचरज से इन परदेसियों को देखते थे. चीन से आए ये लोग अब पूरी तरह से इसी देश, इसी शहर के हो गए थे. लेकिन ताजा SIR की प्रक्रिया के बाद हो सकता है कि कोलकाता के लिए ये दृश्य थोड़ा और दुर्लभ हो जाए. एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता की तीन विधानसभा सीटों से चीनी समुदाय के 484 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. कोलकाता में चीनी कम्युनिटी की घटती आबादी से चिंतित लोगों को इस रिपोर्ट ने और ज्यादा परेशान कर दिया है.

SIR से बाहर हुए चीनी कम्युनिटी के लोग

द हिंदू के मुताबिक, कोलकाता के साबर इंस्टीट्यूट (SABAR Institute) ने स्पेशल इंटेस रिवीजन की ड्राफ्ट लिस्ट प्रकाशित होने के बाद कोलकाता की कुछ विधानसभाओं की वोटर लिस्ट का विश्लेषण किया है. साबर इंस्टीट्यूट ने जिन तीन विधानसभा क्षेत्रों को चुना है, वो कसबा, एंटाली और चौरंगी हैं. विश्लेषण के मुताबिक, इन तीनों सीटों पर चीनी कम्युनिटी के कुल 252 पुरुष और 232 महिला मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं.

कसबा विधानसभा क्षेत्र वो इलाका है, जहां कोलकाता का मशहूर चाइनाटाउन स्थित है. यहां सबसे ज्यादा 307 मतदाताओं के नाम काटे गए हैं. इनमें 147 महिलाएं और 160 पुरुष शामिल हैं. एंटाली विधानसभा सीट से 56 लोगों को हटाया गया, जिनमें 26 महिलाएं और 30 पुरुष हैं. वहीं, चौरंगी विधानसभा क्षेत्र से 121 मतदाताओं के नाम हटे, जिनमें 59 महिलाएं और 62 पुरुष शामिल हैं.

साबर इंस्टीट्यूट के रिसर्चर सौप्तिक हलदर ने बताया कि उन्होंने चीनी नामों के आधार पर एक प्रोग्राम के जरिए वोटर्स लिस्ट की जांच की थी. इससे पता चला कि चीनी कम्युनिटी के 484 लोगों के नाम हटाए गए हैं. उन्होंने कहा कि हटाए गए नामों का ये आंकड़ा और ज्यादा हो सकता है क्योंकि कुछ अनपॉपुलर यानी कम प्रचलित नाम इस डेटा में शामिल नहीं हो पाए होंगे. उन्होंने बताया कि हटाए गए 484 मतदाताओं में से 389 को ‘अनट्रेसेबल’ (Untracable) कैटेगरी में रखा गया है. यानी करीब 80 प्रतिशत मतदाता ऐसे बताए गए, जिन्होंने SIR के तहत गणना फॉर्म (remuneration form) जमा नहीं किए. 

साबर इंस्टीट्यूट के एक अन्य रिसर्चर आशीष चक्रवर्ती ने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को ‘अनट्रेसेबल’ बताना चिंता की बात है. इससे यह सवाल उठता है कि कहीं सत्यापन की प्रक्रिया पुराने और वास्तविक निवासियों तक पहुंचने में नाकाम तो नहीं हो रही है. साबर इंस्टीट्यूट के सबीर अहमद ने कहा कि चीनी समुदाय कोलकाता की संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है. पिछले कई दशकों में कोलकाता में चीनी समुदाय की आबादी घटी है और अब वे शहर के कुछ ही इलाकों तक सीमित रह गए हैं. 

कोलकाता में चीनी कहां से आए? 

कोलकाता सिर्फ भारत के पूर्वी प्रदेश पश्चिम बंगाल की राजधानी नहीं है. वह भारत के सबसे बूढ़े शहरों में से एक भी है, जिसकी अमीरी का एक जमाने में जलवा था. समंदर किनारे के इस शहर के बंदरगाहों पर दुनिया के किस कोने के व्यापारियों के जहाज नहीं उतरे. सिर्फ जहाज नहीं. जहाजों पर सवार होकर आईं दूसरे देशों की संस्कृतियां. वहां के लोग. कुछ वापस गए तो कुछ यहीं रुक गए. रुकने वालों में चीनी कम्युनिटी के भी बहुत से लोग थे. 

ये कहानी शुरू होती है 18वीं शताब्दी से. कहते हैं कि 1778 के आसपास एक चीनी व्यापारी टोंग अचेव, जिन्हें अटच्यू या एटचेव (Atchew) भी कहा जाता है, यूरोप में अपनी किस्मत आजमाने के बाद बंगाल के अच्छीपुर इलाके में आया था. उस समय बंगाल के नवनियुक्त गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स थे. हेस्टिंग्स ने अटच्यू को एक चीनी कारखाना बनाने के लिए जमीन दे दी. इस कारखाने में काम करने के लिए अटच्यू ने चीन से और लोगों को बुला लिया. इस तरह से भारत में चीनी लोगों की पहली बसावट शुरू हुई. कहते हैं कि चीनी कारखानों की वजह से बंगालियों ने उन्हें पहली बार ‘चीनी’ कहना शुरू किया था.

अटच्यू की मौत के बाद उसकी फैक्ट्री में काम करने वाले चीनी लोग बेहतर रोजगार की तलाश में कोलकाता चले गए. उस समय कोलकाता को बड़ी संख्या में मजदूरों और कारीगरों की जरूरत थी. ऐसे में ये लोग यहां आसानी से खप गए. धीरे-धीरे और भी चीनी परिवार यहां आने लगे और इलाके में उनकी आबादी बढ़ती गई. इनमें बढ़ई, चमड़े का काम करने वाले और डॉक्टरी के पेशे के लोग भी थे. ये लोग तिरेट्टा बाजार के आसपास के इलाकों में रहने लगे. यही इलाका आगे चलकर कोलकाता का पहला चाइनाटाउन बना.

एक समय था जब हजारों और लाखों की संख्या में चीनी मूल के लोग कोलकाता में रहते थे. उन्होंने अपने खान-पान की खुशबू बंगाल कि मिठाइयों के साथ मिला दी. यहां के समाज से ऐसे घुले मिले कि न तो सिर्फ चीनी रह गए और न ही सिर्फ भारतीय. दोनों की संस्कृतियां घुलमिल गईं. 

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में रहने वाले बहुत सारे चीनी लोग बंधुआ मजदूर थे. उनके पूर्वजों को 19वीं शताब्दी की शुरुआत में अंग्रेज जबरन भारत लेकर आए थे. ये लोग कोलकाता, असम, शिलांग, तेजपुर, कालीम्पोंग और दीमापुर जैसी जगहों पर बस गए. समय बीतने के साथ इन चीनी प्रवासियों ने स्थानीय महिलाओं से विवाह किया और एक नया सांस्कृतिक समाज बना. धीरे-धीरे उनकी संतानों ने भारतीय संस्कृति और रीति-रिवाजों को अपना लिया.

1962 तक देश में समृद्ध चीनी आबादी थी. कोलकाता के कई ईलाकों में चीनी रेस्तरां, जूते की दुकानें, स्कूल, क्लब, सैलून और मंदिर खुल गए और उनका संचालन चीनी लोग ही करते थे.

परिवार के साथ वोट देने निकलते थे चीनी

आजादी के बाद चीनी समुदाय के इन लोगों ने चुनावों में भी हिस्सा लिया. बताते हैं कि एक समय था, जब चीनी कम्युनिटी के लोग अपने पूरे परिवार और समाज के साथ ग्रुप में वोट डालने के लिए घर से निकलते थे. तब आसपास के इलाकों में स्थानीय लोग ये देखने के लिए घरों से बाहर निकल आते थे. राजनीतिक पार्टियां भी उन्हें लुभाने के लिए चीनी भाषा में दीवारों पर नारे लिखने लगीं. 

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चीनी भाषा में प्रचार करती थीं पार्टियां (X)

लेकिन समय के साथ इन इलाकों में तेजी से चीनियों की संख्या घटने लगी. सबसे ज्यादा गिरावट आई 1962 के भारत-चीन की लड़ाई के दौरान, जब चीनी कम्युनिटी के लोगों को व्यापक स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ा. TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 19वीं सदी के आसपास कोलकाता में चीनियों की आबादी तकरीबन 1 लाख से 1 लाख 20 हजार थी, जो 1950 के दशक तक घटकर मात्र 2000 से 2500 रह गई. 

टैंगरा में रहने वाली एलिजाबेथ चू TOI से कहती हैं कि कोलकाता में चीनी आबादी जिस तरह से घट रही है, उसे देखते हुए ये आशंका गहराई है कि अगले विधानसभा चुनावों में कितने लोग मतदान करने के लिए बचेंगे?

चीनी कम्युनिटी से जुड़े एक और व्यक्ति कहते हैं कि पिछले कई दशकों में उनके समुदाय के अधिकांश युवा अन्य जगहों पर पलायन कर गए हैं. कई विदेशों में बस गए. समुदाय के कई वरिष्ठ सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं. 

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