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HC ने केरल सरकार को ट्रांसजेंडर आरक्षण पर दिया आदेश, कहा- 6 महीने में प्रावधान लागू कीजिए

केरल हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिए निर्देश अभी तक लागू नहीं किए जाने को लेकर राज्य सरकार से नाराजगी जताई है. कोर्ट ने सरकार को ट्रांसजेंडर्स को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने के लिए निर्देश दिया है.

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केरल हाई कोर्ट
केरल हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दिए आदेश
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15 जनवरी 2025 (Published: 11:17 PM IST)
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केरल हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स के सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के भारतीय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) मामले में दिए ऐतिहासिक आदेश को नज़रअंदाज करने पर राज्य सरकार से कड़ी नाराजगी जताई है. हाई कोर्ट ने केरल सरकार को 6 महीने के अंदर ट्रांसजेंडर्स को आरक्षण देने से जुड़े प्रावधान लागू करने का आदेश दिया है. साथ ही कहा है कि राज्य सरकार ने 2020 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 पर नियम बनाए थे. पर अब तक यह नीति लागू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं. यह आदेश 28 नवंबर, 2024 को दिया गया था, लेकिन वेबसाइट पर यह आज ही सामने आया है.

मामला क्या है?

अनीर कबीर बनाम केरल राज्य और अन्य का यह मामला ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के कुछ लोगों ने 2019 में दर्ज किया था. उन्होंने हाई कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के भारतीय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ मामले में दिए ऐतिहासिक आदेश का हवाला दिया था. 2014 के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वे ट्रांसजेंडर्स को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग मानें. और उन्हें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने के लिए नीतियां बनाएं.

हाई कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने समानता के महत्व पर जोर डालते हुए कहा है,

“राज्य के नीति बनाने के अधिकार में कोर्ट तब तक दखल नहीं दे सकती है जब तक किसी मामले में मौलिक अधिकार की बात न हुई हो. समाज में ट्रांसजेंडर्स का तिरस्कार किया जाता है. उनके विकास के लिए उन्हें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में शामिल किया जाना चाहिए. उन्हें आगे बढ़ने की जरूरत है.”

2 जज की इस बेंच ने आगे कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 2014 के आदेश को ध्यान में रखते हुए सरकार को ट्रांसजेंडर्स को आरक्षण देने में देरी नहीं करनी चाहिए. इंसानों में भेदभाव करना मानव सभ्यता के खिलाफ है. कुछ वर्ग सामाजिक समस्याओं के कारण समान रूप से मुकाबला नहीं कर पाते हैं. ऐसे में उन्हें समान सुविधाएं देने के लिए कानून की जरूरत पड़ती है. आखिर समानता और शिक्षा का अधिकार सभी को है.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक दशक बाद (2024 में) केरल स्टेट कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेस ने ट्रांसजेंडर कोटे पर एक रिपोर्ट बनाई थी. रिपोर्ट में ट्रांसजेंडर्स को अलग से कोटा देने की बात नहीं है. जबकि उन्हें उनकी जाति के आधार पर आरक्षण देने की बात की गई है. यानी अगर कोई ट्रांसजेंडर एससी/एसटी जाति का है तो उन्हें एससी/एसटी आरक्षित सीटों में 1 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. इसे 'हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन' कहते हैं. जिन ट्रांसजेंडर्स की जाति नहीं पता है या जो विकसित वर्ग से आते हैं, उन्हें जनरल सीटों पर मुकाबला करना होगा. इस आरक्षण पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जाएगा.

NALSA फैसले के बाद कुछ राज्य सरकारों ने ट्रांसजेंडर कोटे की दिशा में कदम उठाए हैं. जिनमें तमिलनाडु ने ट्रांसजेंडर्स को अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल करने का निर्णय लिया है. कर्नाटक पहला राज्य है जिसने ट्रांसजेंडर्स को 1 प्रतिशत हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन दिया है. अभी तक कुल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड बनाए गए हैं. केरल सरकार ने 2015 में ट्रांसजेंडर्स के विकास के लिए नीति भी बनाई थी.  

ट्रांसजेंडर कोटे पर यह अकेली याचिका नहीं है 

इस तरह की याचिका किसी कोर्ट में पहली बार दर्ज नहीं की गई है. अन्य कोर्ट में भी ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है. इन याचिकाओं में ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के कुछ लोग कोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के NALSA मामले में दिए आदेश का हवाला दे रहे हैं. और चाहते हैं कि कोर्ट सरकारों को ट्रांसजेंडर्स कोटे पर नीति बनाने को लेकर निर्देश दे. मद्रास हाई कोर्ट में ग्रेस बानू गणेशन बनाम तमिलनाडु राज्य और अन्य मामले में इसी मुद्दे पर 2023 से सुनवाई चल रही है.

वहीं, सुप्रीम कोर्ट में 2023 में एक से ज्यादा ऐसी याचिकाएं सामने आई हैं. इनमें से कुछ याचिकाएं उन राज्यों के खिलाफ हैं, जिनपर सुप्रीम कोर्ट के NALSA मामले में दिए गए आदेश की अवमानना करने का आरोप लगा है. सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता तय करने के लिए भी एक याचिका दायर की गई है. इस मामले का नाम स्वाती बिधान बरुआ बनाम भारत संघ है. अभी इन याचिकाओं में कोर्ट का आदेश आना बाकी है.

ये खबर हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहीं मेघा ने लिखी है

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