9 घंटे नहीं 36 मिनट में पहुंचेंगे केदारनाथ, श्रद्धालुओं के लिए बड़ी खबर
रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर स्थित है. यहां हर साल लगभग 20 लाख श्रद्धालु आते हैं. मंदिर साल में सात महीने ही खुला रहता है. अभी लोगों को यहां पहुंचने के लिए 16 किमी की दूरी तय करनी होती है. इसमें नौ घंटे का समय लगता है. अनुमान है कि रोपवे बनने के बाद ये समय घटकर 36 मिनट रह जाएगा.

प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने उत्तराखंड के दो बड़े रोपवे प्रोजेक्ट को मंजूरी दे ही है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कमेटी ने पांच मार्च के दिन इसका एलान किया. इसमें दो प्रमुख तीर्थ स्थल केदारनाथ और हेमकुंड साहिब शामिल हैं. दोनों रोपवे प्रोजेक्ट को ‘पर्वतमाला परियोजना’ के तहत बनाया जाएगा.
अभी स्थिति क्या है?रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर स्थित है. यहां हर साल लगभग 20 लाख श्रद्धालु आते हैं. मंदिर साल में सात महीने ही खुला रहता है. अभी लोगों को यहां पहुंचने के लिए 16 किमी की दूरी तय करनी होती है. इसमें नौ घंटे का समय लगता है. अनुमान है कि रोपवे बनने के बाद ये समय घटकर 36 मिनट रह जाएगा. यह रोपवे सोनप्रयाग से केदारनाथ के बीच बनाया जाएगा. इसकी कुल लंबाई 12.9 किमी होगी. इसको बनाने में 4,081 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत आएगी.
वहीं चमोली जिले में स्थित हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा, साल में केवल पांच महीने खुला रहता है. हर साल करीब डेढ़ से दो लाख श्रद्धालु यहां आते हैं. फिलहाल श्रद्धालुओं को 21 किमी की खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है. यहां गोविंदघाट से हेमकुंड साहिब के बीच रोपवे बनेगा. 12.4 किमी लंबे रोपवे को बनाने में 2,730 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है. इसके बनने के बाद 12 घंटे की ट्रैकिंग के बजाय सिर्फ 45 मिनट ही लगेंगे.
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अश्विनी वैष्णव ने जानकारी दीकेंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट के फैसलों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट को पूरा होने में चार से छह साल का समय लगेगा. साथ ही रोपवे को इस क्षेत्र की वहन क्षमता को ध्यान में रख कर बनाया जाएगा. उन्होंने एक्स पर एक वीडियो शेयर कर लिखा,
"कैबिनेट ने 4,081 करोड़ रुपये की केदारनाथ रोपवे परियोजना को मंजूरी दी, जिससे यात्रा का समय 8-9 घंटे से घटकर सिर्फ 36 मिनट रह जाएगा!"
रोपवे को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत बनाया जाएगा. इसमें मोनोकेबल डिटैचेबल गोंडोला और ट्राईकेबल डिटैचेबल गोंडोला (3S) तकनीक का उपयोग किया जाएगा. गोंडोला एक प्रकार की ‘रोपवे कैबिन’ होती है. जिस बड़े डिब्बे के अंदर बैठकर हम यात्रा करते हैं. अक्सर ऊंचाई वाले इलाकों में इसे देखा जा सकता है.
गोंडोला वायर पर चलते हैं. इस तरीके से मोनोकेबल गोंडोला में एक वायर का इस्तेमाल होता है, वहीं ट्राईकेबल गोंडोला में तीन वायर का इस्तेमाल होता है. इस कारण ट्राईकेबल गोंडोला ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. वहीं रोपवे को बनाने में जमीन अधिग्रहण की जरूरत कम पड़ती है. इस कारण हाईवे की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान होता है.
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