प्राचीन मंदिर में ASI कर्मचारी को चप्पल पहने देख भड़की महिला, वीडियो पर हिंदू-मुस्लिम शुरू
Karnataka Badami Controversy: वायरल वीडियो में पर्यटक महिला रौशनी मुस्तफी से पूछती हैं कि जब मंदिर के अंदर चप्पल पहनना मना है तो फिर कर्मचारी होकर वो ऐसा कैसे कर सकती हैं. इस पर रौशनी जवाब देती हैं कि वो कोई अधिकारी नहीं हैं. अगर नियमों को लेकर शिकायत है, तो अधिकारियों से बात कीजिए.

कर्नाटक के बागलकोट से दो महिलाओं के झगड़े का एक वीडियो सामने आया है. दावा है कि यहां बादामी गुफा मंदिर के अंदर एक महिला चप्पल पहनकर बैठी हुई थी. ये महिला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की कर्मचारी बताई जा रही है. नाम है रौशनी मुस्तफी. दूसरी महिला एक पर्यटक है, जो कर्मचारी के मंदिर के अंदर चप्पल पहनने पर कड़ी आपत्ति जता रही है.
वायरल वीडियो में पर्यटक महिला रौशनी मुस्तफी से पूछती हैं कि जब मंदिर के अंदर चप्पल पहनना मना है तो फिर कर्मचारी होकर वो ऐसा कैसे कर सकती हैं. इस पर रौशनी जवाब देती हैं कि वो कोई अधिकारी नहीं हैं. अगर नियमों को लेकर शिकायत है, तो अधिकारियों से बात कीजिए.
इसके बाद वीडियो में देखा जा सकता है कि रौशनी किसी अधिकारी को फोन लगाकर कहती हैं कि यहां कुछ लोग तमाशा कर रहे हैं. आसपास मौजूद लोग भी दोनों की बहस सुनते नजर आते हैं.
सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आने के बाद यूजर्स ने भी अपनी-अपनी राय देनी शुरू कर दी.
कुछ लोगों ने कहा,
‘अगर वीडियो ध्यान से देखें तो सिर्फ ASI कर्मचारी ही नहीं सवाल उठाने वाली महिला भी फुटवियर में नजर आ रही हैं. ऐसे में सिर्फ एक व्यक्ति को लेकर इतना हंगामा क्यों किया गया?’

एक अन्य यूजर ने कहा,
‘बादामी और हम्पी जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर कई ऐसे मंदिर हैं जहां अब पूजा पाठ नहीं होती. वहां मूर्तियां भी स्थापित नहीं हैं. ऐसे स्थानों को ऐतिहासिक स्मारक की तरह देखा जाता है और पर्यटक अक्सर जूते पहनकर ही घूमते हैं. सिर्फ उन्हीं मंदिरों में जूते उतारने का नियम माना जाता है, जहां आज भी नियमित पूजा होती है.’

लेकिन ये सोशल मीडिया है. यहां बात इतिहास से निकलकर धर्म तक भी पहुंच जाती है. कई यूजर्स ने सवाल उठाते हुए लिखा,
“एक मुस्लिम महिला मंदिर में काम क्यों कर रही है? क्या कोई हिंदू महिला मस्जिद में नौकरी करती है? ”
इस पूरे विवाद में अब तक ASI या स्थानीय प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. इसलिए ये साफ नहीं है कि उस जगह पर जूते पहनने को लेकर असली नियम क्या हैं. ये भी कंफर्म नहीं है कि वीडियो किस दिन का है और बहस के बाद प्रशासन ने कोई कार्रवाई की या नहीं.
लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है. क्या हर ऐतिहासिक मंदिर को सिर्फ धार्मिक नजरिए से देखा जाना चाहिए? क्योंकि भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जो अब पूजा स्थल कम और प्रोटेक्टेड मान्यूमेंट ज्यादा हैं. वहां ASI के नियम लागू होते है धार्मिक संस्थाओं के नहीं.
दूसरी बात सोशल मीडिया पर किसी भी घटना को पूरा संदर्भ जाने बिना सांप्रदायिक बहस में बदल देना कितना सही है? एक छोटी बहस अब धर्म और पहचान की लड़ाई बना दी गई. जबकि असली मुद्दा सिर्फ नियमों और उनके पालन का था.
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