जज ने इस्तीफा दिया तो पेंशन मिलेगी या नहीं? क्या कहता है कानून
बंगले में जले हुए नोट मिलने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा को इस्तीफा देना पड़ा. उन्हें हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया जा रहा था, उससे पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया.

बंगले में जले हुए नोट मिलने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा को इस्तीफा देना पड़ा. उन्हें हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया जा रहा था, उससे पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपे अपने इस्तीफे में जस्टिस वर्मा ने कहा कि वह राष्ट्रपति के दफ्तर को ये तो नहीं बता सकते कि उन्हें ये फैसला क्यों लेना पड़ा लेकिन उन्हें इसका बहुत दुख है. अब जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा तो दे दिया लेकिन सवाल ये है कि क्या उनके इस्तीफे को ‘रिटायरमेंट’ माना जाएगा. क्या उन्हें जजों के रिटायर होने पर मिलने वाली पेंशन मिलेगी?
ये सवाल इसलिए है क्योंकि जस्टिस यशवंत वर्मा ने ‘गंभीर कदाचार (serious misconduct) का दोषी’ पाए जाने के बाद इस्तीफा दिया है. ऐसे में क्या उनके रिटायरल बेनेफिट्स के अधिकार खत्म हो जाते हैं? ये सवाल पहली बार नहीं उठे हैं. इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन ने भी जब 2011 में अपने पद से इस्तीफा दिया था, तब भी ये सवाल किया गया था कि क्या जजों के सेवा के मध्य में दिए इस्तीफों को रिटायरमेंट माना जाएगा? क्या इसके बाद उन्हें पेंशन इत्यादि मिलेंगे या नहीं मिलेंगे?
TOI के मुताबिक, इसे लेकर एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल ने आरटीआई के जरिए सरकार से ही सवाल पूछा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं तो क्या उन्हें सामान्य रिटायरमेंट के फायदे मिलते हैं या नहीं?
जानते हैं इस सवाल पर सरकार ने क्या कहा?
इसके जवाब में ‘डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस’ ने बताया कि जस्टिस सौमित्र सेन हों या जस्टिस दिनाकरण. कोई भी जज अगर अपने पद से इस्तीफा देते हैं तब भी उन्हें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले सभी फायदे मिलते रहेंगे. भले ही उन्होंने अपने खिलाफ महाभियोग (इम्पीचमेंट) की कार्रवाई शुरू होने से पहले ही इस्तीफा क्यों न दिया हो. विभाग का कहना है कि ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे मामलों में उनके पोस्ट रिटायरमेंट बेनेफिट्स को रोकने वाला कोई संवैधानिक या कानूनी प्रावधान संविधान में नहीं है.
विभाग के मुताबिक, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 221 जजों को सैलरी, भत्ते, छुट्टी और पेंशन से जुड़े अधिकार देता है. इन्हें समय-समय पर संसद के बनाए कानून से तय किया जाता है. विभाग ने कहा कि हाईकोर्ट के जजों ने भले ही अवमानना या जांच की कार्रवाई से बचने के लिए अपने पद से इस्तीफा दिया हो. लेकिन, उनके अपने पद से समय से पहले इस्तीफा देने पर रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों से रोकने वाला कोई संवैधानिक या कानूनी प्रावधान नहीं है.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी किया क्लियर
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा ही एक मामला साल 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट में आया था. हाईकोर्ट की एक पूर्व एडिशनल जज थीं पुष्पा गनेदीवाला. उन्होंने भी रिटायर होने से पहले पद से इस्तीफा दिया था. इसके बाद उनकी पेंशन बॉम्बे हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के आदेश के बाद रोक दी गई थी. कहा गया कि उन्हें पेंशन का हक नहीं है. हालांकि, इसकी कोई ठोस वजह नहीं बताई गई. जस्टिस पुष्पा इस मामले को लेकर हाईकोर्ट चली गईं. इस केस पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट के किसी जज का इस्तीफा भी कानून के तहत रिटायरमेंट माना जाएगा. ऐसे में जो जज इस्तीफा देकर पद छोड़ता है, उसे भी वही पेंशन मिलेगी जो उम्र पूरी होने पर रिटायर होने वाले जज को मिलती है.
हाईकोर्ट ने कहा कि 1954 के कानून की धारा 14 और 15(1) में रिटायरमेंट शब्द में इस्तीफा भी शामिल है. ‘रिटायरमेंट’ शब्द का दायरा बहुत व्यापक है. इसका मतलब है करियर का अंत. ‘रिटायर’ शब्द का एक अर्थ ‘इस्तीफा देना’ भी होता है. अगर कानून बनाने वालों का इरादा सिर्फ उन जजों को पेंशन देने का होता जो उम्र पूरी होने पर रिटायर होते हैं, तो वे इसे साफ-साफ लिखते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसलिए रिटायरमेंट' को सिर्फ सुपरएनुएशन (उम्र पूरी होने पर रिटायरमेंट) तक सीमित नहीं माना जा सकता.
कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 14 और 15 को ध्यान से देखने पर साफ होता है कि जज को पेंशन उसके रिटायर होने पर मिलती है और इसमें मजबूरी वाले हालात भी शामिल हैं.
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