बहन का कंकाल लेकर बैंक जाने वाले जीतू मुंडा अब उनसे माफी क्यों मांगते रहते हैं?
जीतू को बहन के खाते में जमा पैसों के साथ-साथ मदद के तौर पर अब तक दस लाख रुपये से भी ज्यादा की रकम मिल चुकी है. लेकिन उन्होंने अब तक एक भी रुपया नहीं निकाला है. वे कुछ पैसा अपने बड़े भाई के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना चाहते हैं. इसके अलावा उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि इतने पैसे का क्या करें.

ओडिशा का केन्दुझर जिला. एक कमरे का कंक्रीट का साधारण सा मकान. दरवाजे पर 60 की वय के एक बुजुर्ग बैठे हैं. नाम जीतू मुंडा है. उनके इर्द गिर्द 'पीपली लाइव' सा सीन है. यानी मुलाकातियों का जमघट. ये सिलसिला 27 अप्रैल से शुरू हुआ, जब मुंडा बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गए. सबको कंकाल निकालने की कहानी जाननी है, जबकि जीतू कहानी बताते बताते उब चुके हैं. अब जब भी वे कहानी बयां करते हैं, कुछ ही मीटर दूर स्थित अपनी बहन की कब्र की ओर मुड़ते हैं और हाथ जोड़कर उनसे माफी की दरख्वास्त लगाते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 27 अप्रैल के बाद से जीतू मुंडा की दुनिया 360 डिग्री बदल गई है. इस तारीख को जीतू मुंडा अपनी बहन कलारा मुंडा का कंकाल लेकर नंगे पांव ओडिशा ग्रामीण बैंक की स्थानीय शाखा में पहुंच गए. वे अधिकारियों को इसका सबूत देना चाहते थे कि उनकी बहन सच में मर चुकी हैं, ताकि उनके खाते में जमा 19,300 रुपये निकालने की इजाजत मिल जाए.
कलारा के खाते में पड़े पैसे दोनों भाई-बहन ने भैसों के एक जोड़े को बेचकर हासिल किए थे. जीतू का कोई खाता नहीं था, इसलिए सारी रकम कलारा के खाते में जमा करा दिए थे. पिछले साल कलारा बीमार पड़ गईं. तब पहली बार जीतू बैंक के पास गए थे. वो बताते हैं, "बैंक के लोगों ने हर बार मुझे वापस लौटा दिया. ये बोलकर कि जिसका खाता है उसे खुद पेश होना होगा. जब मैंने कहा कि कलारा चल नहीं सकती तो वे बोले कि उसे उठा कर या किसी गाड़ी में लेकर आओ. उन्होंने कभी नहीं समझाया कि करना क्या चाहिए."
इसके बाद इस साल 26 जनवरी के दिन कलारा की मौत हो गई. जीतू बताते हैं कि वे फरवरी तक बहन का डेथ सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए भागदौड़ करते रहे, लेकिन लालफीताशाही के आगे वो हार गए. पंचायत अधिकारियों ने कहा कि डेथ सर्टिफिकेट मिलने में 5 साल लगेंगे.
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक सीनियर जिला अधिकारी सिस्टम की इस समस्या को स्वीकार करते हैं. उन्होंने कहा कि डेथ सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया मार्च तक पूरी हो जानी चाहिए थी.
लेकिन जीतू मुंडा को ये जानकारी देने वाला तब कोई नहीं था. वे बैंक जाते रहे और खाली हाथ लौटते रहे. हारकर उन्हें अपनी मृत बहन का कंकाल कब्र से बाहर निकालने का फैसला करना पड़ा.
हालांकि ओडिशा ग्रामीण बैंक के कर्मचारियों का भी एक पक्ष है. ब्रांच में बतौर बैंक मित्र के रूप में तैनात रोजी बारिक बताती हैं कि जीतू और कलारा हमेशा साथ आते थे. लेकिन कलारा की मौत के बाद जब जीतू अकेले आए तो उन्होंने (रोजी) आदिवासी शख्स से उनकी बहन के बारे में पूछा. बारिक कहती हैं कि तब जीतू ठीक से जवाब नहीं दे पाए थे.एक और बैंककर्मी गायत्री खाटुआल का कहना है कि उन्होंने जीतू को मृत व्यक्ति के खाते से पैसे निकालने की प्रक्रिया और डेथ सर्टिफिकेट की जरूरत के बारे में अच्छे से समझाया था.
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. जिसके बाद लोगों ने बैंक की काफी लानत मजामत की. मामला मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी के गृह जिले का था. फटाफट एक्शन हुआ. दो दिनों के भीतर कलारा मुंडा का डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया. बैंक ने ब्याज समेत उनके 19,400 रुपये लौटा दिया. साथ में जिला प्रशासन ने रेड क्रॉस फंड से उनको 30,000 रुपये अलग से दिलवाए.
कहानी इतने पर नहीं थमी. जीतू के बड़े भाई रायबू को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर मिला था. बिजली कनेक्शन के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे. रातोरात उनको कनेक्शन मिल गया. जीतू का नाम पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में जुड़ गया. अब उनको सस्ता अनाज मिलेगा. साथ ही राज्य सरकार की मासिक पेंशन स्कीम में भी उनका नाम दर्ज करा दिया गया. अब हर महीने उनको 1,000 रुपये की आर्थिक मदद मिलेगी, जिसकी पहली किश्त उनके खाते में आ भी चुकी है.
जीतू मुंडा को 19,300 रुपये निकालने के लिए बहुत जुगत भिड़ाना पड़ा. कंकाल तक निकालना पड़ा. लेकिन अब बैंक ऑफ इंडिया की लोकल ब्रांच में उनके नाम से 10 लाख 95 हजार रुपये जमा हो चुके हैं. ये सारे पैसे डोनेशन से मिले हैं. जीतू मुंडा के पैरों की बिवाई को जूते के दर्शन नहीं हुए थे. लेकिन अब उनके पास दान में मिले कई जोड़े जूते हैं.
इसके अलावा उनको दान में लोहे के फ्रेम वाला पलंग, एक पंखा और एक साइकिल मिली है. साथ में चावल और आलू के बोरे भी मिले हैं, जिससे उनका छह महीने का राशन पानी चल जाएगा. यही नहीं, जिस बहन के कंकाल ने जीतू कि किस्मत बदली उनकी कब्र की स्थिति भी बदल गई है. कलारा मुंडा की कच्ची कब्र को अब सीमेंट से पक्का कर दिया गया है.
जीतू को बहन के खाते में जमा पैसों के साथ-साथ मदद के तौर पर अब तक दस लाख रुपये से भी ज्यादा की रकम मिल चुकी है. लेकिन उन्होंने अब तक एक भी रुपया नहीं निकाला है. वे कुछ पैसा अपने बड़े भाई के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना चाहते हैं. इसके अलावा उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि इतने पैसे का क्या करें. 27 अप्रैल का वो दिन उन्हें आज भी डराता है. जीतू अपने कमरे एक कोने की तरफ इशारा करते हैं जहां वो और कलारा साथ मिलकर खाना बनाते थे. उन्हें इस बात का मलाल है कि उन्होंने बहन की आत्मा को शांति से रहने नहीं दिया और इसके लिए उससे माफी मांगते रहते हैं.
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