जाह्नवी कंडुला की मौत भारत में होती तो उनके जीवन को वो 'सम्मान' मिलता जो अमेरिका में मिला?
क्या इंसानी जान से जुड़े मामले को भारत में भी उसी सम्मान और संवेदनशीलता के साथ बरता जाता है, जैसा अमेरिका ने जाह्ववी कंडुला के मामले में किया?

‘जाह्नवी कंडुला का जीवन हमारे लिए मायने रखता था. यह उनके परिवार, उनके दोस्तों और हमारे समुदाय के लिए मायने रखता था.’ ये अल्फाज जाह्ववी कंडुला की वकील एरिका इवांस के हैं. जाह्नवी को जनवरी 2023 में अमेरिका के सिएटल शहर में एक पुलिसकर्मी ने तेज रफ्तार पुलिस वैन से टक्कर मार दी थी. हादसे में उनकी मौत के बाद पुलिसकर्मी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो हंसते हुए बोल रहा था, ‘जाह्नवी की जिंदगी की लिमिटेड वैल्यू थी.’
इस हादसे के करीब तीन साल बाद सिएटल शहर का प्रशासन जाह्नवी के परिवार को 29 मिलियन डॉलर यानी करीब 262 करोड़ रुपये का मुआवजा देने पर सहमत हुआ है. साथ ही पुलिस अधिकारी केविन डेव को नौकरी से निकाल दिया गया है. उस पर लापरवाही से गाड़ी चलाने के लिए 5 हजार डॉलर (लगभग साढ़े चार लाख रुपये) का जुर्माना भी लगाया गया है.
इस फैसले के बाद जाह्नवी के वकील एरिका इवांस ने पुलिसकर्मी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जाह्नवी कंडुला का जीवन हमारे लिए मायने रखता था. ये दीगर बात है कि कितना भी बड़ा मुआवजा किसी निर्दोष मनुष्य के जीवन की भरपाई नहीं कर सकता. लेकिन मुआवजे की राशि सीमित अर्थों में ही सही, मौत की जवाबदेही तय करने की ईमानदार कोशिश को तो दिखाती है. साथ ही सरकार या व्यवस्था मानवीय गरिमा और मानव जीवन का कितना सम्मान करती है, इसकी भी एक बानगी देती है.
ऐसा नहीं है कि जाह्नवी कंडुला का मामला कोई अपवाद है. जॉर्ज फ्लॉयड के मामले में भी ये साबित हुआ कि अमेरिका में इंसान की जान मायने रखती है. 25 मई 2020 को अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की एक पुलिस अधिकारी ने बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी थी. इस घटना ने पूरे अमेरिका के लोगों को आंदोलित कर दिया था. बाद में फ्लॉयड के परिवार को लगभग 262 करोड़ का मुआवजा मिला था. वहीं साल 2022 में ओरेगन के पोर्टलैंड शहर में पुलिस की गोली से मारे गए निहत्थे इमैनुअल क्लार्क को लगभग 30 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया था.
जाह्नवी कंडुला की मौत भारत में होती तो क्या होता?जाह्नवी मूल रूप से भारत के आंध्र प्रदेश की रहने वाली थीं. उनके केस की स्टडी करते हुए ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर इस तरह का हादसा भारत में होता तो क्या यही ट्रीटमेंट होता? क्या इंसानी जान से जुड़े मामले को भारत में भी उसी सम्मान और संवेदनशीलता के साथ बरता जाता है, जैसा अमेरिका ने जाह्ववी कंडुला के मामले में किया? जवाब देने की भी जरूरत नहीं लगती, क्योंकि सबको पता है यहां क्या होता है.
मामला संवेदनशील है इसलिए जबानी जमाखर्ची के बजाय आंकड़ों की मदद लेते हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के मुताबिक, साल 2023-24 में देश में पुलिस हिरासत में 160 लोगों की मौत दर्ज की गई. इनको कितना मुआवजा मिला ये डेटा उपलब्ध ही नहीं है.
लेकिन NHRC ने साल 2021-22 का डेटा दिया है. इस साल पुलिस हिरासत में 155 लोग मरे. जिसमें लगभग 4 करोड़ 53 लाख का मुआवजा दिया गया. औसत निकालें तो आंकड़े 2 लाख 92 हजार के आसपास आता है. ये तो हुआ पुलिस हिरासत में हुई मौतों का हिसाब-किताब. जिसमें कई लोगों की स्वाभाविक मृत्यु भी हो सकती है. लेकिन अब हम कुछ ऐसे केस देख लेते हैं जिनमें पुलिस पर टॉर्चर के आरोप लगे.
दुर्गेंद्र काठोलिया केस: 31 मार्च, 2025 को छत्तीसगढ़ पुलिस की हिरासत में 41 साल के दुर्गेंद्र काठोलिया की मौत हो गई. पुलिस पर टॉर्चर के आरोप लगे. 6 अक्टूबर, 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उनकी मौत को पुलिस की बर्बरता का स्पष्ट उदाहरण बताते हुए राज्य सरकार को मृतक के परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया.
सुरेश हथठेल केस: 20 जुलाई 2024 को छत्तीसगढ़ के कोरबा में पुलिस हिरासत में एक युवक सुरेश हथठेल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. 16 जून 2025 को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सुरेश की मौत पुलिसकर्मियों की लापरवाही का नतीजा है और सरकार को अपने कर्मचारियों के अत्याचारों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतक की मां को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया.
तमिलनाडु के नीलगिरि में साल 2020 में पुलिस हिरासत में ससीलन नाम के एक शख्स की मौत हो गई. पुलिस पर हिरासत में अमानवीय ढंग से टॉर्चर करने के आरोप लगे. राज्य मानवाधिकार आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपों को सही माना. आयोग ने पुलिस टॉर्चर को जीवन के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन मानते हुए पीड़ित को 7.5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कानूनी व्यवस्था के तहत अधिकतर मामलों में 2 लाख से 5 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है. कोई असाधारण मामला हो तो ये राशि 10 लाख तक जा सकती है. लेकिन ये रेयरस्ट केस में होता है.
लेकिन सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं है, किसी इंसान के जीवन के मूल्य के प्रति हमारी सामाजिक और राजनीतिक समझ को मांजने और कानून को नजीर बनाने का है. सम्मानजनक मुआवजा और पीड़ित के लिए निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करना इस बदलाव को गति देने का एक माध्यम बन सकता है. चाहे पुलिसिया कार्रवाई हो या प्रशासनिक उदासीनता के चलते गई जान (जैसे नोएडा में एक युवक की गड्ढे में डूबकर जान चली गई), मुआवजे के मामले में सिएटल शहर जैसा उदाहरण पेश किया जाना चाहिए.
मुआवजे का उद्देश्य किसी त्रासदी का मोल लगाना नहीं है. लेकिन जैसे एरिका इवांस ने कहा, यह दर्ज होना जरूरी है कि जिस जान का नुकसान हुआ वो उसका उसके परिवार और समाज के लिए कुछ मूल्य था. हमारी अदालतों और नीति नियंताओं को आम लोगों के जीवन का मूल्य समझना होगा और जवाबदेही तय करने के लिए मुआवजे को मानक बनाना होगा. इससे तंत्र को लोक के प्रति और ज्यादा जिम्मेदार और नागरिक जीवन को सम्मानजनक दृष्टि से देखने के लिए मजबूर करने में मदद मिलेगी. जिसकी आम तौर पर कोई कीमत नहीं लगाई जाती.
वीडियो: पुलिस की गाड़ी से भारतीय स्टूडेंट जाह्नवी कंडुला की मौत, परिवार को मिलेंगे 262 करोड़ रुपये

.webp?width=60)

