9 साल पहले ही पता चला गया था कि इंदौर का पानी मल-मूत्र से दूषित है, पर रिपोर्ट दबा दी गई थी!
इंदौर जैसे महानगर में दूषित पानी के मामले के बीच, केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट ने राज्य के ग्रामीण इलाकों में भी पानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.

भारत के सबसे साफ और स्वच्छ शहर इंदौर के पानी को लेकर केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट सामने आई है. जिसने सूबे के प्रशासन पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है. यह रिपोर्ट उस वक्त सामने आई है. जब शहर में प्रदूषित पानी पीने की वजह से अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है.
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की 2016-17 की एक रिपोर्ट में राज्य के कई इलाकों के पानी को मल-मूत्र से दूषित बताया गया था. इस रिपोर्ट से यह पता चलता है कि यह समस्या सालों पुरानी है. जो संबंधित अधिकारियों को पता थी. लेकिन इस समस्या पर खासा ध्यान नहीं दिया गया. इंडिया टुडे से जुड़े रवीश पाल सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, PCB द्वारा 2016-17 में राज्य में पिए जाने वाले पानी का एक सर्वेक्षण किया गया था. जिसमें पता चला कि भागीरथपुरा और इंदौर के अन्य 58 इलाकों में जमीन के नीचे से आने वाला पानी (Groundwater) दूषित हो गया था. इस सर्वेक्षण को करने के लिए जांच टीम ने बोरवेल, हैंडपंप और अन्य भूजल स्रोतों के साथ करीब 60 जगहों से पानी के सैंपल इकट्ठा किया था.
लैब टेस्ट्स में पता चला कि लगभग सभी सैंपल्स में कुल कोलीफॉर्म का लेवल 10 MPN (Most Probable Number) प्रति 100 मिलीलीटर से ज्यादा का था. जो इंसानों के पीने के लिए उपर्युक्त नहीं है. इस रिपोर्ट में साफ हो गया कि पानी मल से प्रदूषित है. जिसे लोग अपने रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं.
उस समय MPPCB ने अपनी जांच के निष्कर्ष को इंदौर नगर निगम को भेजा. साथ ही प्रभावित ग्राउंड वाटर सोर्स को आम जनमानस के पीने के लिए असुरक्षित घोषित करने की सिफारिश भी की. सुझावों में दूषित हैंडपंपों और बोरवेलों पर वार्निंग स्टिकर और चेतावनी बोर्ड लगाने को कहा गया. इसके साथ-साथ सीवेज को पानी की लाइनों में मिलने से रोकने के उपायों को शामिल करने की सिफारिश की गई . क्योंकि, रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि इंदौर के बड़े हिस्सों में ग्राउंड वाटर लोगों के पीने योग्य नहीं है. क्योंकि, उन इलाकों में लगातार सीवेज प्रदूषण बना हुआ था.
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कई ग्राणीण इलाकों का पानी भी सुरक्षित नहींइंदौर जैसे महानगर में दूषित पानी के मामले के बीच,केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट ने राज्य के ग्रामीण इलाकों में भी पानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य में 'जल जीवन मिशन' के तहत केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में किए गए एक जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. जिसमें मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लिए गए पीने के पानी के 36.7% सैंपल पीने सही नहीं पाए गए.
केंद्र सरकार की ‘फंक्शनैलिटी असेसमेंट ऑफ हाउसहोल्ड टैप कनेक्शन 2024’ रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर से अक्टूबर 2024 के बीच 15,094 ग्रामीण परिवारों को जांच में शामिल किया गया. जिसकी रिपोर्ट पिछले महीने जारी की गई. टेस्ट के दौरान प्रत्येक जल स्रोत/योजना से दो घरों से पानी के सैंपल लिए गए. इन नमूनों की जांच मान्यता प्राप्त लैब में ई-कोलाई (E. Coli) और टोटल कोलीफॉर्म के साथ pH वैल्यू की जांच की गई.
बता दें कि जिलेवार आंकड़ों में भारी असमानता देखने को मिली. जिसमें अलीराजपुर, बड़वानी, झाबुआ, नरसिंहपुर और सीधी में सर्वे किए गए. इन सभी घरों में 100% पिने का पानी सुरक्षित पाया गया. जबकि, अनूपपुर, डिंडोरी, पन्ना, रीवा और उमरिया के घरों में एक भी पानी का सैंपल पीने योग्य नहीं मिला.
राज्य के अन्य जिलों में भी पीने के पानी की स्थिति चिंताजनक रही है. जिसमें ग्वालियर (20.9%), अशोकनगर (21.9%), मुरैना (25.2%), दमोह (33.5%), खंडवा (35.2%), उज्जैन (35.3%) और शिवपुरी (36.4%) में ही सीमित मात्रा में पीने योग्य सुरक्षित पानी मिला. जबकि, राजधानी भोपाल (56.9%) और जबलपुर (54.3%) में आंकड़े औसत के आसपास ही रहे.
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