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अस्पताल हैं, डॉक्टर हैं… फिर भारत के आम आदमी की उम्र चीन वालों से 10 साल कम क्यों?

2026 के यूनियन बजट में हेल्थ बजट बढ़ा, लेकिन क्या इससे इलाज की क्वालिटी सुधरेगी? मेडिकल जर्नल 'लांसेट' रिपोर्ट बता रही है कि भारत में अस्पताल और डॉक्टर होने के बावजूद सही इलाज नहीं मिल पा रहा. आलम ये है कि चीन के आम आदमी की औसत उम्र भारतीयों के मुकाबले 10 साल ज्यादा है.

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द लांसेट जर्नल के संपादक रिचर्ड हॉर्टन. (फोटो-इंडिया टुडे)
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सोनल मल्होत्रा
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4 फ़रवरी 2026 (अपडेटेड: 4 फ़रवरी 2026, 01:08 PM IST)
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2026 का यूनियन बजट आया, तो सरकार ने हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर मंत्रालय के लिए 1.05 लाख करोड़ रुपये निकाल दिए. पिछले साल से करीब 9 फीसदी ज्यादा. सुनने में ठीक लगता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या इतना पैसा काफी है? और अगर पैसा बढ़ रहा है, तो भारत के लोग अब भी जल्दी क्यों मर रहे हैं?

भारत की आबादी करीब 140 करोड़ है. औसतन एक भारतीय 70 साल जीता है. वहीं चीन को देख लीजिए. आबादी लगभग उतनी ही, लेकिन वहां की लाइफ एक्सपेक्टेंसी 80 साल है. यानी औसतन 10 साल ज्यादा. अब सोचिए, फर्क कहां पड़ रहा है?

पिछले कुछ सालों में मेडिकल कॉलेज बढ़े, MBBS की सीटें बढ़ीं, नर्सों की भर्ती भी हुई. कागज़ पर सब ठीक लग रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और कहती है. यही बात सामने लाई है एक रिपोर्ट ने, जो छपी है दुनिया की नामी मेडिकल जर्नल द लांसेट में.

लांसेट की रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत में सुविधाएं होते हुए भी इलाज की क्वालिटी कमजोर है. मतलब अस्पताल तो हैं, डॉक्टर तक पहुंच भी है, लेकिन सही इलाज नहीं मिल पा रहा. द लांसेट के एडिटर डॉ रिचर्ड हॉर्टन ने इंडिया टुडे से बातचीत में सीधी बात कही. बोले,

भारत में लोगों की अस्पताल पहुंचने के बाद भी मौत हो जाती है, क्योंकि उन्हें सही दवाइयां और सही इलाज नहीं मिल पाता है.   

डॉक्टर पर चेक और बैलेंस

अब जरा डॉक्टर सिस्टम को समझिए. भारत में एक डॉक्टर पर औसतन 811 मरीज हैं. MBBS करने के बाद डॉक्टर का लाइसेंस बनता है और वो पूरी जिंदगी वैलिड रहता है. मान लीजिए कोई 25 साल की उम्र में डॉक्टर बन गया, तो 65 साल तक बिना दोबारा परीक्षा दिए प्रैक्टिस कर सकता है. न कोई रिव्यू, न कोई चेक. इलाज कैसा हो रहा है, मरीज क्या कह रहे हैं, इसकी कोई ठोस निगरानी नहीं.

यहीं से खतरा शुरू होता है. इसका एक बड़ा उदाहरण है AMR यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस. जब बिना जरूरत एंटीबायोटिक दी जाती है, तो बैक्टीरिया और वायरस उन दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं. फिर वही दवाएं बेअसर हो जाती हैं. इसमें लोकल केमिस्ट की भी बड़ी भूमिका है, जहां बिना पर्ची के एंटीबायोटिक मिल जाती है.

अब जरा UK का सिस्टम देखिए. वहां डॉक्टर का लाइसेंस हर पांच साल में रिन्यू होता है. डॉक्टर को बताना पड़ता है कि उसने कैसे इलाज किया, मरीजों का फीडबैक क्या रहा, कई बार एग्जाम भी देना पड़ता है. कई विकसित देशों में ऐसा सिस्टम है. लेकिन भारत में अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ?

सरकार ने कभी नेशनल एग्जिट टेस्ट यानी NEXT लाने की कोशिश की थी, ताकि MBBS के बाद लाइसेंस के लिए एग्जाम हो. लेकिन छात्रों के विरोध के बाद ये प्लान ठंडे बस्ते में चला गया.

प्राइमरी हेल्थ केयर की हालत खस्ता

दूसरी बड़ी दिक्कत है प्राइमरी हेल्थ केयर. भारत अपनी GDP का सिर्फ 3.31 फीसदी हेल्थ पर खर्च करता है. ये खर्च चीन, नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों से भी कम है. नतीजा ये कि सिर्फ 5 फीसदी लोग ही क्वालिटी हेल्थ केयर अफोर्ड कर पाते हैं. 75 फीसदी लोग इससे बहुत दूर हैं और बाकी 20 फीसदी जैसे-तैसे जूझ रहे हैं.

जब कोई बीमार पड़ता है, तो सरकारी अस्पताल के जनरल डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे प्राइवेट स्पेशलिस्ट के पास भागता है. वजह साफ है. सरकारी सिस्टम पर भरोसा कमजोर हो चुका है. जांच में देरी, डॉक्टरों पर जरूरत से ज्यादा बोझ, सब मिलकर हाल और बिगाड़ देते हैं.

इंडिया टुडे से बात करते हुए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के पूर्व डायरेक्टर डॉ दिलीप मावलंकर और IMA के पूर्व अध्यक्ष रवि वनखेड़कर भी यही कहते हैं. उनका कहना है कि 

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर पर ज्यादा ज़िम्मेदारी थोप दी जाती है. इसलिए इसका असर ट्रीटमेंट पर दिखाई देता है. एक वक़्त पर भारत में ट्रेन किए गए डॉक्टर की प्रशंसा दुनियाभर में होती थी. आज जो नए लोग प्रैक्टिस कर रहे हैं वो क्लीनिकल एग्जामिनेशन से ज़्यादा जांच रिपोर्ट पर ध्यान देते हैं. 

एक और कड़वी सच्चाई ये है कि हर साल करीब एक लाख MBBS ग्रेजुएट निकलते हैं, जिनमें आधे प्राइवेट कॉलेज से होते हैं. इन कॉलेजों की फीस कई बार एक करोड़ रुपये से ज्यादा होती है. जब इतना पैसा लगाया हो, तो प्रैक्टिस शुरू करते ही उसे निकालने की जल्दी भी होती है. इसका असर सीधा मरीज पर पड़ता है.

राजनीतिक सुधार

भारत को FDA जैसी बॉडी का गठन करने की ज़रूरत है. FDA यानी फूड और ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन, जो हेल्थ केयर क्वालिटी और बाज़ार में बिकने वाली दवाओं का निरिक्षण करती है. अमेरिका में ये बॉडी काम करती है. नेताओं को आगे आकर ऐसी बॉडी की मांग करनी होगी जो हेल्थ केयर सेक्टर की अनियमितताओं को परखे और उसके उपाए सुझाए. रिचर्ड हॉर्टन का कहना है कि,

जनता सरकार को चुनती है तो सरकार ही जनता के प्रति जवाबदेह है. उन्हें डॉक्टर के रीलाइसेंसिंग के लिए सोचना चाहिए और अहम कदम उठाना चाहिए. लेकिन इसके पहले प्रॉब्लम को पहचानना ज़रूरी है. जैसे चीन ने बीजिंग की दिक़्क़त को पहचाना और उसके लिए ठोस कदम उठाए. जब बीजिंग में वायु प्रदुषण हद से ज़्यादा बढ़ा तब सरकार ने शहर के आस पास सभी इंडस्ट्री को बंद करवा दिया. उस दौरान हवा के सफाई का काम किया गया. 

भारत में हर साल करीब 10 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से होती है. इसे भी हेल्थ क्राइसिस की तरह देखने की जरूरत है. और सिर्फ सरकार नहीं, जनता को भी सवाल पूछने होंगे. क्योंकि जब तक आवाज नहीं उठेगी, तब तक इलाज अधूरा ही रहेगा.

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