300 K9 Vajra तोपें खरीदने की तैयारी में भारतीय सेना, समझें क्यों मानी जाती है गेमचेंजर?
Indian Army 23 हजार करोड़ की लागत से 300, K9 Vajra Self Propelled Howitzer खरीदने की तैयारी में है. आर्मी इस प्रस्ताव को Defence Procurement Board -DFB के सामने रखेगी. खबर है कि 50 किमी की रेंज तक मार करने वाली ये तोप चीन और पाकिस्तान से लगी सीमा पर तैनात की जाएगी.

'ईश्वर उन फौजों के साथ है, जिनके पास तोपें हैं'. ये कहना था अपने समय के सबसे उम्दा मिलिट्री कमांडर माने जाने वाले फ्रेंच शासक नेपोलियन बोनापार्ट का. नेपोलियन से पहले आर्टिलरी यानी तोपखाने को सेना के एक 'सपोर्ट आर्म' के रूप में देखा जाता था. लेकिन नेपोलियन को एक आर्टिलरी अफसर के तौर पर ट्रेनिंग दी गई थी, इसलिए वो तोपों का महत्व बखूबी समझते थे. मॉडर्न लड़ाई में भी एक तोप का गोला दुश्मन को न सिर्फ नुकसान पहुंचाता है, बल्कि उसकी पूरी पोजिशन/पोस्ट को तहस-नहस कर देता है. इसी कड़ी में इंडियन आर्मी अपने तोपखाने में इजाफा करने पर विचार कर रही है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद इंडियन आर्मी अपनी फायरपावर को बढ़ाने के लिए 300 K-9 वज्र (K9 Vajra) तोपें खरीद सकती हैं.
रक्षा मंत्रायल से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, आर्मी इस प्रस्ताव को जून 2026 में रक्षा खरीद बोर्ड (Defence Procurement Board -DFB) के सामने रख सकती है. 300 तोपों की इस डील की कीमत लगभग 23 हजार करोड़ रुपये होगी. ये डील पक्की हुई तो इंडियन आर्मी के पास लगभग 500 K9 Vajra तोपें हो जाएंगी. इससे पहले 2017 में 100 तोपों का ऑर्डर दिया गया था, जिनकी डिलीवरी 2021 में तय समय से पहले कर दी गई थी. इसके बाद साल 2024 में भी 100 तोपों का ऑर्डर दिया जा चुका है.
इस तोप को भारत की कंपनी लार्सन एंड ट्यूब्रो (L&T) बना रही है. L&T इसे साउथ कोरिया की डिफेंस कंपनी 'हानवा एयरोस्पेस' से लाइसेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भारत में बनाती है. यह तोप साउथ कोरिया के K9 Thunder आर्टिलरी सिस्टम का ही इंडियन वेरिएंट है. इस तोप में क्या खास है और कैसे ये इंडियन आर्मी को नई ताकत देगी, इसे समझते हैं. लेकिन पहले थोड़ा तोप के बेसिक्स जान लें.
बोर और कैलिबर का गणितजब भी हम तोपों की बात करते हैं, तो उनके साथ दो शब्द सुनने में आता हैं. ये शब्द हैं 'बोर' 'कैलिबर'. जैसे K9 वज्र 155 मिलिमीटर (mm) बोर और 52 कैलिबर (cal) की है. यहां 155mm से गन का मतलब है उस जगह का माप (डायमीटर) जहां से गोला निकलता है. साथ ही 52 कैलिबर बैरल यानी नली की लंबाई को दर्शाता है. बैरल की लंबाई पता करने के लिए बोर के डायमीटर को कैलिबर के नंबर से गुना (Multiply) किया जाता है. K9 वज्र के मामले में 155mmX52cal करें तो 8060mm आता है. इसका मतलब है कि K9 Vajra की बैरल 8060mm (8.06 मीटर) लंबी है. ठीक यही गणित छोटी बंदूकों जैसे पिस्तौल और रायफल में भी लागू होता है.

K9 Vajra एक सेल्फ प्रोपेल्ड होवितजर तोप (Self Propelled Howitzer Artillery) है. यानी एक गाड़ी पर लगाई हुई खुद से फायर करने वाली बड़ी सी गन. इस तरह की तोपों को खास तौर पर 'शूट एंड स्कूट' यानी 'मारो और दौड़ो' जैसे ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया जाता है. ये तोप पहले तो दुश्मन के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमला करती है. इसके बाद जब दुश्मन जवाबी गोले दागता है, तब तक ये अपनी जगह बदल चुकी होती है.
इसमें इसकी मदद इसमें लगा हाईड्रॉलिक सिस्टम करता है. इसमें एम टी यू फ्रेडरिकशाफेन (MTU Friedrichshafen) का 1000 हॉर्सपावर की ताकत वाला डीजल इंजन लगा है. आठ सिलिंडर के इस इंजन में वाटर कूल्ड सिस्टम है जो इसे ठंडा रखता है. जैसे हमारी बाइक और कारों में आजकल कूलिंग सिस्टम लगा होता है, कुछ वैसे ही.
अपने ताकतवर इंजन की बदौलत ये तोप लगभग 1 मीटर ऊंची किसी भी रुकावट को पार कर उसे रौंदते हुए आगे बढ़ जाता है. ये लगभग 3 मीटर चौड़ी खाई और 2 मीटर गहरे पानी में भी आराम से गुजर सकता है. इसका ऊपरी हिस्सा 360 डिग्री घूम सकता है जो इसे ऑपरेट करने वाले सैनिक को हर कोने से सुरक्षा देता है. खास बात ये है कि ये NBC यानी न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल और केमिकल) Nuclear, Biological and Chemical -NBC) अटैक के दौरान भी अपने ऑपरेटर को सुरक्षित रखता है.
शुरूआती K9 तोपों को मैदानी और रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया था. लेकिन दूसरे ऑर्डर के बाद बनी तोपों में खास तरह के बदलाव करके इन्हें कश्मीर और लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले इलाकों (High Altitude Warfare) के लिए तैनात किया गया है. यानी इलाका कोई भी हो, K9 के गोले कहीं भी दुश्मनों पर 'वज्र' बनकर गिर सकते हैं.
तीन तरह के फायरिंग मोड, कई गोलेइस गन में एक बार में 48 गोले लोड किए जा सकते हैं. इसमें फायरिंग के लिए तीन मोड दिए गए हैं. सबसे पहला है बर्स्ट मोड (Burst Mode). बर्स्ट मोड में यह तोप 30 सेकेंड के अंदर तीन गोले दाग सकती है. दूसरा है इंटेंस मोड (Intense Mode). जैसा कि नाम से जाहिर है, इसमें काफी इंटेस यानी ताबड़तोड़ फायरिंग की जाती है. इस मोड में 3 मिनट के भीतर 15 गोले दागे जा सकते हैं. तीसरा है सस्टेंड मोड (Sustained Mode). इस मोड में फायरिंग की स्पीड कम होती है. लेकिन लंबी जंग के लिए ये बहुत ही कारगर है. इसमें 1 मिनट में 1 गोला दागा जा सकता है जो लगातार 1 घंटे तक फायर कर सकता है. इस तरह ये तोप जरूरत के हिसाब से गोले दागने में सक्षम है.
इसमें जरूरत के हिसाब से कई तरह के गोले इस्तेमाल किए जाते हैं. K9 में हाई एक्सप्लोसिव यानी बड़ा धमाका कर दुश्मन को तितर-बितर करने से लेकर रॉकेट वाले गोले इस्तेमाल होते हैं. यूं तो इसकी 40 किलोमीटर से अधिक है. लेकिन रॉकेट सपोर्ट वाले गोलों के साथ ये तोप 50 किलोमीटर से भी अधिक दूरी तक मार कर सकती है.

साल 2026 भारत-साउथ कोरिया की दोस्ती के लिहाज से काफी अहम रहा है. अप्रैल 2026 में साउथ कोरिया के प्रेसिडेंट ली जे म्युंग ने भारत का दौरा किया था. इसके बाद मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी साउथ कोरिया का दौरा किया. रक्षा मंत्री के दौरे पर K9 Vajra के अलावा एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम्स से लेकर मिसाइल प्रोग्राम तक में सहयोग की बात सामने आई. जानकारों के मुताबिक K9 प्रोग्राम, दोनों देशों की दोस्ती का एक बेहतरीन उदाहरण है.
सबसे खास बात यह है कि इस तोप को भारत में बनाया जाता है जो 'मेक इन इंडिया' प्रोग्राम को आगे बढ़ाने में मदद करता है. साथ ही इस तोप में 50 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है जो डिफेंस सेक्टर में भारत के 'आत्मनिर्भर' बनने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है. बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद गुजरात के हजीरा में स्थित L&T प्लांट का दौरा किया. इससे पहले पीएम ने 2019 में K9 वज्र प्रोग्राम का मुआयना किया था. इस प्लांट में K9 Vajra के अलावा सेना का जोरावर लाइट टैंक भी बन रहा है जो लद्दाख जैसे उंचे और दुर्गम इलाकों में सेना की जरूरतों को पूरा करेगा.
वीडियो: ग्राउंड रिपोर्ट: लाल किले पर कैसे दी जाती है 21 तोपों की सलामी?

