The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • india gps navigation system navic failed atomic clock stopped as one satellite end of life

भारत का अपना GPS सिस्टम बंद होने की कगार पर, ट्रेन से लेकर गाड़ियों तक पर असर का खतरा

Indian GPS Navigation System: जो सिस्टम स्वदेशी नेविगेशन NavIC पर निर्भर है, उसमें एक्यूरेट लोकेशन पता करने में दिक्कत आ सकती है. समुद्री नेविगेशन, गाड़ियों को ट्रैक करना और डिजास्टर अलर्ट भी इसी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं. सैटेलाइट बंद होने की वजह से इन पर असर पड़ सकता है.

Advertisement
pic
16 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 03:04 PM IST)
gps crippled india one staellite stopped working
NavIC भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम है. (सांकेतिक फोटो: इंडिया टुडे)
Quick AI Highlights
Click here to view more

Navigation with Indian Constellation: भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम (NavIC) अब कमज़ोर पड़ चुका है. इसके चार में से एक सैटेलाइट ने काम करना बंद कर दिया है. यानी अब ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी GPS ट्रैकिंग में परेशानी आ सकती है. एटॉमिक क्लॉक ने भी काम करना बंद कर दिया है.

भारत में कई सर्विसेज NavIC नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं. इसलिए उन पर असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है. लेकिन ऐसा अचानक क्यों हुआ? चलिए जान लेते हैं. दरसअल, भारत की स्पेस एजेंसी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) ने एक प्रेस रिलीज़ जारी की. इसमें बताया गया कि IRNSS-1F सैटेलाइट की 10 साल की मियाद 10 मार्च को पूरी हो गई.

ये सैटेलाइट NavIC नेविगेशन सिस्टम का हिस्सा है, जिसे साल 2016 में 10 मार्च को लॉन्च किया गया था. इस सैटेलाइट ने पूरी तरह काम करना बंद नहीं किया है, लेकिन अब ये केवल एक तरफ से ही मैसेज भेजने में सक्षम होगा.

isro
ISRO ने सैटेलाइट IRNSS-1F के बारे में बताया. 

इंडिया टुडे से जुड़ीं रदीफा कबीर की रिपोर्ट के मुताबिक़, किसी जगह की लोकेशन ट्रैक करने यानी GPS सिस्टम के लिए कम से कम चार सैटेलाइट चाहिए. लेकिन भारत के पास अब केवल तीन सैटेलाइट ही काम के लायक बची हैं.

जो सिस्टम स्वदेशी नेविगेशन NavIC पर निर्भर है, उसमें एक्यूरेट लोकेशन पता करने में दिक्कत आ सकती है. समुद्री नेविगेशन, गाड़ियों को ट्रैक करना और डिजास्टर अलर्ट भी इसी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं. सैटेलाइट बंद होने की वजह से इन पर असर पड़ सकता है.

2025 में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में जवाब दिया था कि NavIC और अन्य GNSS (ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) कॉन्स्टेलेशन का इस्तेमाल करके लगभग 12,000 ट्रेनों को रियल-टाइम में ट्रैक करने का लक्ष्य रखा गया है. उन्होंने बताया था कि करीब 8700 ट्रेनें पहले से ही NavIC के साथ-साथ अन्य GNSS कॉन्स्टेलेशन से भी लैस हैं.

तीन सैटेलाइट अब भी काम कर रहे हैं

नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC) भारत का अपना रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है, जो IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) का हिस्सा है. इसे ISRO ने 2006 में शुरू किया था, जिससे भारत के पास अपना PNT (Position, Navigation and Timing) सर्विस सिस्टम हो.

रिपोर्ट के मुताबिक़, फिलहाल IRNSS-1B (साल 2014 में लॉन्च), IRNSS-1L (साल 2018 में लॉन्च), NVS-01 (साल 2023 में लॉन्च), तीन सैटेलाइट एक्टिव हैं. इनमें सबसे पुराना IRNSS-1B है जो अपने टारगेट समय से ज़्यादा पर चल रहा है. वहीं सबसे आधुनिक और लेटेस्ट है NVS-01. लेकिन केवल एक सैटेलाइट के ज़रिए पूरे भारत में GPS ट्रैकिंग संभव नहीं है.

दरअसल, साल 2025 में ये सामने आया कि इस नेविगेशन सिस्टम के तहत कुल 11 सैटेलाइट लॉन्च किए गए थे. लेकिन इनमें से केवल चार फंक्शनल थे. बाकी बचे सैटेलाइट में से चार एकतरफा मैसेज देने के लिए थे. एक को उम्र पूरी होने पर काम से हटा दिया गया और दो कभी तय ऑर्बिट में पहुंच ही नहीं पाई. अब इन चार में से भी एक कमज़ोर पड़ चुका है. NavIC को 7 सैटेलाइट वाले नेविगेशन सिस्टम के तौर पर बनाया गया है.

NVS-02: Advancing India's Regional Navigation Capabilities
टेस्ट के दौरान NVS-02 सैटेलाइट.
इस संकट का विकल्प क्या है?

NVS-02 को रिप्लेसमेंट के तौर पर 2025 में लॉन्च किया गया था. लेकिन तकनीकी फॉल्ट की वजह से वो अपनी तय ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी वजह से ये लॉन्च फेल हो गया. पिछले साल केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया था कि 6 महीने के अंदर NVS-O3 लॉन्च किया जाएगा और उसके 6 महीने बाद NVS -04. मगर अब तक NVS-O3 ही लॉन्च नहीं किया गया है.

अटॉमिक क्लॉक क्या होता है?

इस नेविगेशन सिस्टम के चलते भारत ने अपना एटॉमिक क्लॉक सेटअप किया था, ताकि इम्पोर्टेड क्लॉक पर निर्भरता कम की जा सके. ये क्लॉक एटम के वाइब्रेशन का समय मापती है. एक सैटेलाइट को अंतरिक्ष से हमारे फ़ोन तक सिग्नल पहुंचाने में जो समय लगता है उसे मापने का काम करती है.

हल्की सी चूक हमारी लोकेशन में बड़ा बदलाव दिखा सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक़, एक सेकंड के अरबवें हिस्से की गलती आपकी कैलकुलेटेड पोजीशन को सैकड़ों मीटर तक आगे बढ़ा सकती है. बिना काम करने वाली क्लॉक के नेविगेशन सैटेलाइट बेकार है.

वीडियो: GPS Jamming क्या होता है, जिसने Middle East में ‘भटका’ दिए जहाज?

Advertisement

Advertisement

()