भारत में हर 90 मिनट में क्यों मर रही है एक बेटी, जानिए यूपी-बिहार के डरावने आंकड़े
Dowry Deaths in India: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में साल 2024 में 5737 दहेज हत्याएं हुईं. जानिए क्यों हर 90 मिनट में एक महिला की जान जा रही है. साथ कौन सा राज्य दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के मामलों में सबसे आगे है.

नोएडा की रहने वाली ट्विशा शर्मा की भोपाल में ससुराल के अंदर मौत हो जाती है. ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर की कहानी भी कुछ ऐसी ही निकलती है. जब भी अखबारों में या सोशल मीडिया पर ऐसी हेडलाइंस आती हैं, तो हमारा खून खौल उठता है. हम लोग दो-चार दिन कैंडल मार्च निकालते हैं, फेसबुक-ट्विटर पर गुस्से वाले पोस्ट लिखते हैं और फिर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप सुबह की चाय पी रहे होते हैं या रात को सुकून की नींद सो रहे होते हैं, तब भारत के किसी न किसी कोने में एक बेटी दहेज के लालच की भेंट चढ़ रही होती है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB के ताजा आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में भारत के अंदर दहेज हत्या के कुल 5,737 मामले दर्ज किए गए. अगर इसे और आसान भाषा में समझें तो देश में हर सिंगल दिन 15 से ज्यादा महिलाएं दहेज की वजह से अपनी जान गंवा रही हैं. गणित को थोड़ा और बारीकी से देखें तो पता चलता है कि भारत में हर 90 मिनट में एक महिला की मौत सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि उसकी ससुराल वालों की पैसों या सामान की भूख शांत नहीं होती. यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है, यह हमारे समाज के चेहरे पर एक ऐसा दाग है जो समय के साथ और गहरा होता जा रहा है.
यूं तो सरकारी फाइलों में यह दावा किया जा रहा है कि साल 2015 में जहां दहेज हत्या के 7,634 मामले थे, वहीं 2024 में यह घटकर 5,737 रह गए हैं. यानी करीब 1,900 मामलों की कमी आई है. लेकिन क्या इस मामूली गिरावट पर हमें खुश होना चाहिए. जब तक देश की एक भी बेटी को शादी के बाद सिर्फ इसलिए मार दिया जाए या उसे खुदकुशी के लिए मजबूर किया जाए क्योंकि वह अपने साथ मनचाही रकम लेकर नहीं आई, तब तक हर दावा खोखला नजर आता है. आज हम इस पूरे मामले की परत-दर-परत पड़ताल करेंगे कि आखिर कानून होने के बावजूद यह बीमारी हमारे समाज से खत्म क्यों नहीं हो रही है.
यूपी-बिहार में सबसे ज्यादा खौफनाक हालात
अगर हम देश के नक्शे पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह बीमारी पूरे देश में एक जैसी नहीं है. कुछ राज्यों में हालात इतने डरावने हैं कि वहां की कानून-व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल उठते हैं. साल 2024 के NCRB डेटा के मुताबिक, उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे ऊपर है. अकेले यूपी में दहेज हत्या के 2,038 मामले दर्ज किए गए हैं. इसका मतलब यह हुआ कि पूरे देश में जितनी दहेज हत्याएं होती हैं, उसका एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा सिर्फ उत्तर प्रदेश से आता है.
उत्तर प्रदेश के बाद नंबर आता है बिहार का, जहां 1,078 मामले सामने आए हैं. इसके बाद मध्य प्रदेश में 450, राजस्थान में 386 और पश्चिम बंगाल में 337 महिलाओं की जान दहेज की वजह से गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि हिंदी बेल्ट या उत्तर-पूर्वी भारत के कुछ राज्यों में यह समस्या बहुत गहरे तक धंसी हुई है. यहां शादी को आज भी एक पवित्र बंधन से ज्यादा एक बिजनेस डील की तरह देखा जाता है, जहां लड़के की नौकरी और हैसियत के हिसाब से लड़की वालों से कीमत वसूली जाती है.
सिर्फ प्रताड़ना नहीं, सीधे मर्डर हो रहे हैं
कई बार लोग सोचते हैं कि दहेज हत्या का मतलब होता है कि लड़की ने तंग आकर खुदकुशी कर ली होगी. बेशक खुदकुशी के मामले बहुत ज्यादा हैं, लेकिन NCRB का डेटा एक और खौफनाक सच सामने लाता है. आंकड़ों में बकायदा 'दहेज मर्डर' यानी सीधे तौर पर की जाने वाली हत्याओं को भी दर्ज किया जाता है. साल 2024 में इस मामले में पश्चिम बंगाल सबसे आगे रहा, जहां 163 सीधे मर्डर के मामले आए. इसके ठीक बाद ओडिशा में 161 महिलाओं को सीधे तौर पर मौत के घाट उतार दिया गया.
राजस्थान में ऐसे 75 मामले मिले, जबकि बिहार में 66 और उत्तर प्रदेश में 58 महिलाओं की सीधी हत्या की गई. यह वो मामले हैं जहां बात सिर्फ ताने मारने या मानसिक रूप से परेशान करने तक सीमित नहीं रही. जब लड़की के परिवार वाले पैसे नहीं दे पाए, तो ससुराल वालों ने खुद अपने हाथों से उस लड़की की जिंदगी का दीया बुझा दिया. यह दिखाता है कि लालच इंसान को किस हद तक अंधा और क्रूर बना सकता है.

मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स की वेबसाइट पर इस तरह के अपराधों और उनके क्लासिफिकेशन से जुड़ी विस्तृत गाइडलाइंस मौजूद है. अगर आप विस्तार से जानना चाहते हैं तो विजिट कर सकते हैं.
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घरेलू कूरता की अंतहीन कहानी
दहेज की वजह से मौत तो बिल्कुल आखिरी और सबसे भयानक अंजाम है, लेकिन उस अंजाम तक पहुंचने से पहले हर दिन जो नरक एक महिला झेलती है, उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. कानून की भाषा में इसे 'Cruelty by Husband and Kin' यानी पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली कूरता कहा जाता है. इसे भारतीय न्याय संहिता या पुरानी IPC की धारा 498A के तहत दर्ज किया जाता है. साल 2024 में पूरे भारत में ऐसे 1.20 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं.
पिछले पूरे एक दशक का रिकॉर्ड देखें तो यह आंकड़ा हर साल एक लाख से ऊपर ही बना रहता है. इसमें भी उत्तर प्रदेश 21,000 से ज्यादा मामलों के साथ सबसे आगे है और पश्चिम बंगाल 19,000 से ज्यादा मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है. इसके अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी 10,000 से ज्यादा कूरता के केस दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि हमारे देश में लाखों महिलाएं हर रोज अपने ही घर में, अपने ही पति और ससुराल वालों के हाथों मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेल रही हैं.

महिलाओं के खिलाफ होने वाले इन अपराधों के ट्रेंड को समझने के लिए आप नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (National Family Health Survey) की रिपोर्ट भी देख सकते हैं जो इस दर्द को बयां करती है.
पुलिस और कानून के मकड़जाल में उलझता इंसाफ
अब सवाल यह उठता है कि जब इतने मामले दर्ज हो रहे हैं, तो दोषियों को सजा क्यों नहीं मिल रही. इसका जवाब छुपा है हमारे सिस्टम की सुस्ती में. दहेज निषेध अधिनियम यानी Dowry Prohibition Act के तहत जो मामले पुलिस के पास आते हैं, उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा फाइलों में ही दबा रह जाता है. डेटा के मुताबिक, पिछले दस सालों में पुलिस के पास इन मामलों की पेंडेंसी यानी लंबित रहने की दर 30% से 45% के बीच रही है. साल 2024 में भी लगभग 37% मामले ऐसे थे जिन पर पुलिस कोई अंतिम फैसला या चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई थी.

जब पुलिस के स्तर पर ही मामलों में इतनी देरी होगी, तो कोर्ट में ट्रायल शुरू होने में सालों लग जाते हैं. तब तक या तो गवाह टूट जाते हैं या दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता हो जाता है. कई बार लड़की का परिवार थक-हार कर पीछे हट जाता है. इंसाफ में होने वाली यही देरी अपराधियों के हौसले बुलंद करती है. उन्हें पता होता है कि मामला दर्ज हो भी गया, तो सालों-साल कुछ नहीं होने वाला.
न्यायिक और पुलिस सुधारों पर नीति आयोग की रिपोर्ट भी इसी तरफ इशारा करती है कि पेंडेंसी को कम करना कितना जरूरी है.
एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं: समाज और सिस्टम की नाकामी
तो आखिर समस्या का समाधान क्या है? इस पूरे मुद्दे पर दिल्ली की सीनियर सोशल एक्टिविस्ट और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली एडवर्टाइजर रीना राय कहती हैं,
जब तक हम शादी को एक सामाजिक स्टेट्स और बिजनेस डील की तरह देखना बंद नहीं करेंगे, तब तक कानून कुछ नहीं कर पाएगा. आज भी हमारे समाज में लड़के की नौकरी की कीमत लगाई जाती है. मिडिल क्लास परिवार अपनी पूरी जिंदगी की कमाई सिर्फ इसलिए लुटा देते हैं ताकि बेटी की शादी बड़े घर में हो सके. हमें इस सोच को बदलना होगा कि बेटी की सुरक्षा महंगे सामान से तय होती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारे कानून नाकाफी हैं? कानूनी मामलों के जानकार और क्रिमिनल लॉयर वकील अमित मिश्रा का मानना है कि कानून में कमियां नहीं हैं. अपनी बात को समझाते हुए वो कहते हैं,
कमियां कानून के पालन में हैं. धारा 498A को लेकर कई बार यह बहस होती है कि इसका गलत इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन NCRB के आंकड़े बताते हैं कि असल पीड़ित महिलाओं की संख्या बहुत बड़ी है. पुलिस को ऐसे मामलों में बिना किसी दवाब के तुरंत और निष्पक्ष जांच करनी चाहिए. जब तक कूरता करने वालों को तुरंत और कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक समाज में डर पैदा नहीं होगा.
मिडल क्लास का नजरिया और मनोविज्ञान
दहेज की यह समस्या सिर्फ अनपढ़ या गरीब परिवारों तक सीमित नहीं है. असल में इसका सबसे गंदा रूप देश के मिडल क्लास और अपर मिडल क्लास में देखने को मिलता है. यहां दहेज को 'गिफ्ट' या 'उपहार' का सुंदर सा नाम दे दिया जाता है. लड़की के पिता पर दबाव बनाया जाता है कि समाज में हमारी नाक का सवाल है, इसलिए शादी आलीशान बैंक्वेट हॉल से होनी चाहिए, गाड़ी बड़ी होनी चाहिए और गहने भारी होने चाहिए.
मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो लड़के वाले अक्सर एक हीन भावना या सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स के शिकार होते हैं. उन्हें लगता है कि चूंकि उन्होंने बेटे को पढ़ाया-लिखाया है, इसलिए अब लड़की वालों से उस पर निवेश किए गए पैसे वसूलने का उनका अधिकार है. दूसरी तरफ लड़की को बचपन से सिखाया जाता है कि ससुराल ही तुम्हारा असली घर है और वहां चाहे जो हो जाए, तुम्हें सब कुछ सहना है. यही चुप रहने की आदत बाद में उसकी मौत का कारण बन जाती है.
सरकार की नीतियां और आगे का रास्ता
भारत सरकार ने दहेज रोकने के लिए 1961 में ही दहेज निषेध अधिनियम बना दिया था. इसके अलावा प्रोटेक्शन ऑफ विमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 भी मौजूद है. लेकिन सिर्फ कागजों पर कानून बना देने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती. सरकार को अब अपनी नीतियों में कुछ कड़े बदलाव करने होंगे. जैसे शादी के खर्चों पर एक तय सीमा लगाना बहुत जरूरी हो गया है, ताकि शादियों में होने वाले दिखावे को रोका जा सके.
इसके साथ ही स्कूलों और कॉलेजों के स्तर पर ही बच्चों को जेंडर इक्वैलिटी यानी लैंगिक समानता का पाठ पढ़ाना होगा. जब तक लड़कियां आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं होंगी और जब तक उनके माता-पिता उन्हें यह भरोसा नहीं दिलाएंगे कि 'ससुराल में मरने से बेहतर है कि तुम वापस अपने मायके आ जाओ', तब तक यह आंकड़े कम नहीं होने वाले.
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अब चुप रहने का वक्त नहीं है
दहेज हत्याएं सिर्फ किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं हैं, यह पूरे भारतीय समाज के सामूहिक फेलियर का सबूत हैं. हर 90 मिनट में मरने वाली वह महिला किसी की बेटी, किसी की बहन और किसी की सहेली होती है. हम डिजिटल इंडिया और फाइव ट्रिलियन इकोनॉमी की बातें तो बहुत गर्व से करते हैं, लेकिन जब तक हमारी आधी आबादी अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं है, तब तक यह तरक्की अधूरी है. अब वक्त आ गया है कि हम सब मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाएं और शादियों में होने वाले इस लेन-देन का पूरी तरह से बहिष्कार करें.
वीडियो: ट्विशा शर्मा मामले पर खुशबू पाटनी ने लड़कियों से क्या अपील की?

