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'आग से मत खेलो', बंगाल में कुर्बानी पर शुभेंदु सरकार के नए रूल से भड़के हुमायूं कबीर

हुमायूं कबीर ने कहा कि कुर्बानी सदियों से चली आ रही परंपरा है और सरकारी दिशानिर्देशों के बाद भी कुर्बानी हर हाल में होकर ही रहेगी.

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23 मई 2026 (पब्लिश्ड: 02:58 PM IST)
Humayun kabir vs bengal government
शुभेंदु सरकार को हुमायूं कबीर ने चेतावनी दी है. (फोटो- India Today)
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पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार को पूर्व टीएमसी नेता हुमायूं कबीर ने चेतावनी दी है कि वो आग से न खेलें. ये चेतावनी सरकार की ओर से जारी एक नोटिस के विरोध में दी गई है. बकरीद से ठीक पहले जारी इस नोटिस में कुछ शर्तों के साथ ही गाय की बलि की इजाजत दी गई है. इस पर कबीर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुर्बानी सदियों से चली आ रही परंपरा है और सरकारी दिशानिर्देशों के बाद भी कुर्बानी हर हाल में होकर ही रहेगी. इधर पश्चिम बंगाल सरकार ने साफ किया कि मवेशियों की कुर्बानी को लेकर जारी सरकारी गाइडलाइन्स का बकरीद से कोई संबंध नहीं है. 

बता दें कि 28 मई को इद-उल-अदहा यानी बकरीद का त्योहार है. इससे पहले बंगाल सरकार ने नोटिस जारी कर कहा था कि किसी भी गाय या भैंस की कुर्बानी तभी दी जाएगी, जब तक लिखित रूप में ये साबित न हो जाए कि वो 14 साल से ज्यादा उम्र के हैं. या काम के नहीं हैं या बछड़े पैदा नहीं कर सकते. इसके अलावा, चोट लगने, अपाहित होने या फिर किसी लाइलाज बीमारी की वजह से पूरी तरह से अक्षम हो जाने पर ही मवेशियों की कुर्बानी दी जा सकेगी. 

सरकार के इस निर्देश का विरोध करते हुए आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख और रेजिनगर से विधायक हुमायूं कबीर ने कहा कि सरकार चाहे तो बीफ न खाने का नियम बना दे लेकिन कुर्बानी की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. यह एक धार्मिक प्रथा है. यह किसी भी सरकारी निर्देश के बाद भी चलती रहेगी. उन्होंने साफतौर पर ऐलान किया कि वह किसी भी आपत्ति को नहीं मानेंगे.

कोर्ट में भी पहुंचा था मामला

बता दें कि टीएमसी विधायक अखरुज्जमान ने भी कलकत्ता हाईकोर्ट में मवेशियों की बलि को लेकर सरकारी नोटिस पर रोक लगाने की मांग की थी. लेकिन, कोर्ट ने 21 मई को उनकी याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के हवाले से कहा कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी का इस्लाम की धार्मिक परंपरा से कोई लेना-देना नहीं है. कुर्बानी में गाय का होना परंपरा का हिस्सा नहीं है.

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