The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • Last 15 Minutes Of Heat Stroke, How Body Organs Fail One By One.

हीट स्ट्रोक के वो आखिरी 15 मिनट, शरीर के भीतर जब अंग दम तोड़ने लगते हैं, तो क्या होता है?

Heat Wave India: देश में एक ही दिन में हीट स्ट्रोक से 3400 मौतों की खबर आ रही हो तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वक्त आ गया है कि हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया जाए. सवाल ये भी है कि जब किसी को गंभीर लू लगती है तो मौत से पहले के आखिरी 15 मिनट में शरीर के भीतर दिमाग, दिल और किडनी कैसे काम करना बंद करते हैं?

Advertisement
pic
2 जून 2026 (पब्लिश्ड: 11:46 AM IST)
heat stroke organ failure
क्या हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का वक्त आ गया है? (फोटो- PTI)
Quick AI Highlights
Click here to view more

उत्तर भारत में इस समय सूरज ऐसा पगलाया है कि पूछिए मत. सीधे खोपड़ी पर तेजाब उड़ेल रहा है. पारा 45 डिग्री तो कब का पीछे छूट गया. अब तो लगता है सूरज मामू 50 पार करने को बेताब बैठे हैं. सड़कें ऐसी सुनसान पड़ी हैं कि देखकर ही रूह कांप जाए. लेकिन अस्पतालों के मुर्दाघरों में पैर रखने की जगह नहीं है. इंडिया टुडे की एक खबर आई है और भाई, उसे पढ़कर सच में भीतर तक सब हिल गया है. देश में लू के थपेड़ों ने सिर्फ एक दिन के भीतर 3400 लोगों को मौत की नींद सुला दिया.

​गजब है भाई! सोचिए, 3400 मौतें! ये कोई मामूली बात नहीं है. सीधे-सीधे कत्लेआम है बॉस. ये 3400 लोग सिर्फ कागजी नंबर नहीं थे. इनमें से ज्यादातर वो थे जो कंक्रीट के इस तपते नरक में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर थे. सिर पर फटी बोरी रखे रिक्शा खींच रहे थे. या किसी टिन शेड के नीचे बिना पंखे के घुट-घुट कर दम तोड़ रहे थे.

ऐसे में सवाल उठता है गुरु, आखिर ऐसा भी क्या गजब हो जाता है कि एक भला-चंगा आदमी धूप में पैर रखता है और कुछ ही घंटों में उसकी मौत हो जाती है? जब किसी को भयानक लू मारती है, तो शरीर के भीतर के वो आखिरी 15 मिनट कैसे होश उड़ाते हैं? अंग कैसे एक-एक करके बैठ जाते हैं? और सबसे बड़ा सवाल, जब देश में इतनी बड़ी आफत आन पड़ी है, तो हमारी सरकारें इसे 'राष्ट्रीय आपदा' मानकर इन गरीब मजदूरों को कोई कानूनी ढाल या मुआवजा क्यों नहीं देतीं? आइए, आज इसका पूरा कच्चा चिट्ठा खोलते हैं.

​वेट-बल्ब तापमान का खौफनाक गणित

​हम और आप अक्सर मोबाइल पर पारा देखते हैं, 47 डिग्री. हमें लगता है कि बस गर्मी थोड़ी बढ़ गई है. लेकिन वैज्ञानिक सिर्फ तापमान नहीं देखते. वो देखते हैं 'वेट-बल्ब तापमान'. सीधे शब्दों में कहें तो ये हवा की उमस यानी नमी और गर्मी का वो खौफनाक घालमेल है, जो ये तय करता है कि आपका शरीर पसीना बहाकर खुद को ठंडा रख पाएगा या नहीं.

​हम तो कह रहे हैं कि हमारे शरीर का एक सीधा सा नियम है. जब बहुत गर्मी लगती है, तो दिमाग त्वचा को सिग्नल भेजता है. पसीना निकलता है और हवा से वो पसीना सूखता है तो शरीर अंदर से ठंडा हो जाता है. लेकिन जब हवा में उमस बहुत ज्यादा हो और तापमान भी हाई हो, तो पसीना सूखना पूरी तरह बंद हो जाता है. फिर शरीर की कूलिंग सिस्टम 'निल बटा सन्नाटा' हो जाती है.

​अगर वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री को पार कर जाए, तो चाहे आप कितने भी तगड़े हों, पंखे के नीचे ही क्यों न बैठे हों, आपका शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाएगा. कंक्रीट की ऊंची इमारतें, कोलतार की सड़कें और चौबीसों घंटे चलने वाले एसी से निकलने वाली गर्मी पूरे इलाके को 'ओवन' बना देती है. नतीजा? हमारे समाज का सबसे गरीब तबका इस अदृश्य जाल में जिंदा उबलने लगता है.

​जब एक-एक करके बैठ जाते हैं सारे ऑर्गन

​अब बात करते हैं उस खौफनाक सच की, जिसे जानकर आपकी रूह कांप जाएगी. जब किसी व्यक्ति का शरीर हीट स्ट्रोक के चरम स्तर पर पहुंचता है, तो आखिरी 15 मिनट में उसके अंगों के भीतर एक तरह का 'मल्टिपल ऑर्गन फेल्योर' शुरू हो जाता है. 

डॉक्टर बताते हैं कि ये पूरी प्रक्रिया किसी भयानक म्यूटेशन जैसी होती है.

​दिमाग का थर्मोस्टेट फेल: जैसे ही शरीर का आंतरिक तापमान 104 डिग्री फारेनहाइट या 40 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है, दिमाग में मौजूद 'हाइपोथैलेमस' यानी जो शरीर का एसी है, वो घुटने टेक देता है. दिमाग को समझ नहीं आता कि इस आग से कैसे निपटें. न्यूरॉन्स डैमेज होने लगते हैं. व्यक्ति का मानसिक संतुलन नौ दो ग्यारह हो जाता है. वो अजीब हरकतें करता है, बड़बड़ाता है और बेहोश होकर गिर पड़ता है.

​दिल पर जानलेवा लोड: शरीर को ठंडा करने के चक्कर में दिल पागल की तरह धड़कने लगता है. वो त्वचा की तरफ खून की सप्लाई को कई गुना बढ़ा देता है ताकि गर्मी बाहर निकल सके. इस आपाधापी में ब्लड प्रेशर एकदम से क्रैश कर जाता है. आखिरी मिनटों में दिल पर इतना लोड बढ़ता है कि वह अचानक धड़कना बंद कर देता है, यानी सीधे कार्डिएक अरेस्ट.

​किडनी और लिवर का दम टूटना: जब बीपी गिरता है, तो किडनी और लिवर को खून मिलना बंद हो जाता है. खून की कमी के कारण किडनी के सेल्स मरने लगते हैं, जिसे मेडिकल की भाषा में 'एक्यूट किडनी इंजरी' कहते हैं. शरीर के भीतर जहरीले तत्व जमा होने लगते हैं. लिवर के एंजाइम आसमान छूने लगते हैं और वो खून के थक्के जमाने की क्षमता खो देता है.

​खून का थक्का जमना: गर्मी की वजह से शरीर के भीतर मौजूद प्रोटीन फटने लगते हैं. ठीक वैसे ही जैसे अंडे को उबालने पर उसका लिक्विड ठोस बन जाता है. नसों के अंदर खून के छोटे-छोटे थक्के जमने लगते हैं, जिससे शरीर के हर हिस्से में ऑक्सीजन पहुंचना पूरी तरह बंद हो जाता है.

आगे बढ़ने से पहले हीट स्ट्रोक के कहर को इस ग्राफिक प्लेट के जरिए आसान भाषा में समझते हैं,

शरीर के भीतर का कबाड़ा: हीट स्ट्रोक के वो आखिरी 15 मिनट

शरीर का अंग भीतर क्या गदर मचता है? अंतिम नतीजा
दिमाग (Brain) तापमान 104 डिग्री पार होते ही कुदरती एसी यानी हाइपोधैलेमस पूरी तरह क्रैश कर जाता है. गर्मी से न्यूरॉन्स उबलने लगते हैं. मतिभ्रम, दौरे पड़ना और कोमा
दिल (Heart) बॉडी को ठंडा करने के चक्कर में धड़कन 180 के पार भागती है. अचानक ब्लड प्रेशर एकदम से नीचे गिर जाता है. जानलेवा कार्डिएक अरेस्ट
किडनी और लिवर पानी खत्म होने से खून गाढ़ा हो जाता है और अंगों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती. किडनी फिल्टर करना बंद कर देती है. एक्यूट ऑर्गन शटडाउन
खून की नसें गर्मी की वजह से अंदरूनी प्रोटीन फटने लगते हैं. नसों के भीतर खून के छोटे-छोटे थक्के जमने लगते हैं. मल्टी ऑर्गन फेल्योर
⚠️ रेड अलर्ट लक्षण: बिना पसीने के त्वचा का लाल होना, चक्कर आना या उल्टी लगना मामूली थकान नहीं मौत का बुलावा है.

Note: AI की मदद से तैयार ग्राफिक्स​, सोर्स- AIIMS की गाइडलाइंस

मामूली थकान समझने की भूल मत करना, ये रहे बॉडी के वॉर्निंग सिग्नल

​अक्सर लोग शुरुआत में इसे 'सामान्य सुस्ती' या 'थकान' समझकर नजरअंदाज कर देते हैं और पानी पीकर दोबारा काम पर लग जाते हैं. नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी की हीट वेव से जुड़ी गाइडलाइन्स के मुताबिक सबसे बड़ी भूल है. डॉक्टरों का कहना है कि हीट स्ट्रोक अचानक नहीं आता, शरीर पहले कई इशारे करता है.

​पसीना आना पूरी तरह बंद होना: अगर बहुत गर्मी लग रही है लेकिन आपकी त्वचा सूखी, गर्म और बिल्कुल लाल हो चुकी है, तो समझ लीजिए कि इमरजेंसी आ चुकी है.

​चक्कर और उल्टी का आना: सिर में तेज दर्द होना और मतली आना इस बात का संकेत है कि दिमाग पर आंच पहुंच चुकी है.

​मांसपेशियों का जकड़ना: पैरों या पेट की मांसपेशियों का अचानक ऐंठ जाना शरीर में नमक और पानी के गंभीर संकट को दिखाता है.

​तेज सांसें: अगर बिना किसी भारी काम के भी आपकी सांसें ऐसे चल रही हैं जैसे आप मीलों दौड़कर आए हों, तो तुरंत छांव की तलाश करें.

​आखिर हीटवेव को 'राष्ट्रीय आपदा' क्यों नहीं मानती सरकार?

​अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे कड़वे और तीखे प्रशासनिक एंगल पर. जब देश में बाढ़ आती है, चक्रवात आता है, या भूकंप आता है, तो सरकारें तुरंत मुस्तैद हो जाती हैं. सेना बुलाई जाती है, एनडीआरएफ की टीमें तैनात होती हैं, और मृतकों के परिवारों को आपदा राहत कोष से तुरंत लाखों रुपये का मुआवजा मिलता है.

​लेकिन जब हीटवेव से एक ही दिन में 3400 लोग मर जाते हैं, तो सरकारें इसे 'मौसम का मिजाज' कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं और राहत के नाम पर 'निल बटा सन्नाटा' हाथ आता है. भारत के वर्तमान आपदा प्रबंधन कानून के तहत हीटवेव को अभी भी उस तरह की 'अधिसूचित राष्ट्रीय आपदा' का दर्जा नहीं मिला है, जैसा कि चक्रवात या भूकंप को मिला हुआ है.

ये भी पढ़ें: आसमान से बरस रही 'आग', दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में 94 भारत के, देखें लिस्ट

​मुआवजे से महरूम रह जाने का दर्द

चूंकि ये लिस्टेड आपदा नहीं है, इसलिए लू से मरने वाले गरीब मजदूरों के परिवारों को कोई तयशुदा सरकारी मुआवजा नहीं मिलता. परिजनों को साबित करना पड़ता है कि मौत सिर्फ धूप से हुई है. इसे पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अक्सर 'हार्ट फेल्योर' लिखकर रफा-दफा कर दिया जाता है.

​कड़े कानूनी संरक्षण का अभाव भी एक बड़ी प्रॉब्लम है. वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी गिरिजेश वशिष्ठ कहते हैं,

अगर हीटवेव राष्ट्रीय आपदा घोषित हो जाए, तो सरकारों के पास ये कानूनी अधिकार और मजबूरी होगी कि वो रेड अलर्ट के दौरान दोपहर 12 से 4 बजे के बीच निर्माण कार्यों, रेहड़ी-पतरी और खुली धूप में होने वाले हर काम पर 'अनिवार्य प्रतिबंध' लगा सकें. अभी केवल 'एडवाइजरी' यानी सलाह जारी होती है. इसे बिल्डर्स और ठेकेदार रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं और मजदूर पेट की भूख के कारण 47 डिग्री में भी काम करने को मजबूर होता है.

​ये हमारी व्यवस्था का सबसे क्रूर नीतिगत विरोधाभास है. क्या धूप में उबलकर मर जाना, पानी में डूबकर मर जाने से कम दर्दनाक है? जब मरने वालों की संख्या हजारों में है, तो इसे केवल 'मौसम का मिजाज' बताकर फाइलों में बंद कर देना नीतिगत संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. अब वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट और संसद इस लूपहोल पर चोट करे और हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर इसके खिलाफ एक मुकम्मल कानूनी लड़ाई की बुनियाद रखे.

वीडियो: हीट वेव के कारण हज पर गए 98 भारतीय समेत 1300 लोगों ने गंवाई जान, नई जानकारी सामने आई

Advertisement

Advertisement

()