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अरावली का असली संकट! अवैध खनन की गाड़ियों को चेकिंग से किसने बचाया? SDM पर गंभीर आरोप

हरियाणा में अरावली इलाके में अवैध खनन की माल ढुलाई के लिए एक 'स्पेशल' रोड बनाया गया, जो पूरी तरह से अवैध था. इस रोड के अबाध संचालन के लिए प्रशासनिक अधिकारी को लाखों की रिश्वत दी गई.

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Haryana illegal mining
अवैध खनन केस में हरियाणा के एसडीएम का नाम शामिल (india today)
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राघवेंद्र शुक्ला
2 जनवरी 2026 (Published: 08:31 PM IST)
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हरियाणा के एक प्रशासनिक अधिकारी (एसडीएम) पर घूस लेकर ‘भ्रष्टाचार की राह’ आसान करने के आरोप लगे हैं. आरोप है कि अरावली इलाके में अवैध खनन की गाड़ियों को चेकपोस्ट से बचाने के लिए एक अवैध सड़क बनाई गई. ये रास्ता बिल्कुल गैर कानूनी था और इसे बनाने की सरकारी इजाजत नहीं थी. जिन इलाकों से होकर ये सड़क गुजरती थी, वहां पर खनन (Mining) पूरी तरह से बैन या अवैध था. 

इस सड़क को बनाने में प्राइवेट खनन कारोबारियों का पैसा लगा था. ये कारोबारी अपने माल की ढुलाई के लिए इस सड़क का इस्तेमाल करते थे ताकि रेगुलेटरी चेकिंग (नियमित जांच) से बच सकें. इसमें उनका साथ दिया था नूंह जिले के एक सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने. आरोप है कि इस अवैध सड़क का उपयोग करने के लिए एसडीएम ने '40 लाख की रिश्वत मांगी' थी. 

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ये सब 129 पन्नों की उस चार्जशीट में दर्ज है, जिसे हरियाणा पुलिस ने तैयार किया है. रिपोर्ट में एसडीएम का नाम तो नहीं बताया है लेकिन चार्जशीट के कई हिस्सों में प्रशासनिक अधिकारी की ओर से इस कथित रिश्वत की मांग का जिक्र है. अधिकारियों ने बताया कि चार्जशीट में कुछ गवाहों के बयान का जिक्र है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अवैध सड़क और अवैध खनन दोनों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न हो, इसके लिए 40 लाख रुपये मांगे गए थे. 

इतना ही नहीं, कई बार शिकायत होने के बावजूद अवैध सड़क पर न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही उसे कभी जांच में फंसने दिया गया. चार्जशीट में जिले के राजस्व अधिकारियों को भी प्रमुख साजिशकर्ता बताया गया है. उन पर चकबंदी प्रक्रिया में हेरफेर करके अवैध सड़क को ‘राजस्व सड़क’ में बदलने का आरोप लगाया गया है. जांच एजेंसियों ने मामले में 112 गवाहों की सूची दी है, जिनमें गांव के लोग, ठेकेदार, ट्रांसपोर्टर, बिचौलिये, सरकारी अफसर और कार्रवाई करने वाला स्टाफ शामिल है.

अवैध खनन के इलाके से गुजरती है सड़क

पुलिस का कहना है कि अवैध सड़क ऐसे इलाकों से होकर गुजरती थी, जहां खनन या तो प्रतिबंधित था या पूरी तरह अवैध था. बावजूद इसके शिकायतों की जांच में देरी की गई. उसे अक्सर बंद कर दिया गया. जांच एजेंसियों का दावा है कि प्राइवेट खनन कारोबारियों को इसका असली फायदा हुआ. उन्होंने ही इस सड़क को बनाने और उसकी निगरानी के लिए पैसा लगाया था. उन्हें प्रशासनिक संरक्षण भी मिला था, जिससे खनन और माल की ढुलाई बिना रुकावट चलती रही. इससे उन्होंने भारी मुनाफा कमाया.

हालांकि, इस सड़क के आसपास के गांवों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीणों ने बताया कि इससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा बल्कि खेती की जमीन भी खराब हुई. धूल-मिट्टी बढ़ी और भारी वाहनों की आवाजाही से हादसों का जोखिम भी बना रहा.

रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के डीघ जिले में बसई मेव से छपरा गांव और बसई मेव से नगाल गांव को जोड़ने वाली यह अवैध सड़क भारी वाहनों की आवाजाही के लिए इसलिए जरूरी थी क्योंकि यहां से गुजरने वाली गाड़ियां चेकपोस्ट, जांच और अन्य निगरानी से बच निकलती थीं. इस सड़क का बार-बार नवीनीकरण किया गया.

बिचौलिये के बयान पर टिका केस

चार्जशीट में मोहम्मद हनीफ उर्फ ​​हन्ना को मुख्य बिचौलिया बताया गया है. कहा गया कि उसी ने कथित तौर पर खनन माफिया और नूह प्रशासन के अधिकारियों के बीच ‘डील’ कराई थी. ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, ये पूरा केस हन्ना के इस कबूलनामे पर ही टिका है. इन्वेस्टिगेशन में सैटेलाइट तस्वीरों, फोटो, मौके की जांच रिपोर्ट और सरकारी फाइलों को शामिल किया गया है, जिससे यह साबित करने की कोशिश की गई कि कई आपत्तियां दर्ज होने के बावजूद यह सड़क लगातार इस्तेमाल होती रही. 

चार्जशीट में लोकल प्रशासन की नाकामी की बात भी है और बताया गया कि खनन, वन, राजस्व और पर्यावरण कानूनों के तहत कार्रवाई के लिए साफ सबूत होने के बावजूद कोई एक्शन नहीं लिया गया. पुलिस ने आंतरिक पत्राचार और फाइलों की आवाजाही का हवाला देकर जानबूझकर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है.

मामले में खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम- 1957 की धारा 21, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 15(1), पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम, 1900 की धारा 19 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराएं 7 और 13 के तहत केस दर्ज किया गया है.

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