करोड़ों के इलाज के बाद भी कोमा में आनंद, इंश्योरेंस के पैसे नहीं मिले, BMC ने घर तोड़ दिया
मुंबई के 35 साल के आनंद दीक्षित की कहानी भी हरीश जैसी ही है. वो ऐसी स्थिति में हैं, जहां वो सिर्फ देख सकते हैं. पर उनका शरीर कोई हरकत नहीं कर सकता. आनंद के माता-पिता बेटे की हालत देखकर दुखी हैं. लेकिन उनके मन में एक उम्मीद है. उम्मीद कि किसी दिन उनका बेटा उठेगा, और उन्हें पुकारेगा.
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बीते दिनों सामने आए हरीश राणा के मामले ने सबको भावुक कर दिया. हरीश बीते 13 सालों से कोमा में थे. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी. सुप्रीम कोर्ट के जज भी फैसला सुनाते हुए भावुक हो गए. और अब मुंबई से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है. मुंबई के 35 साल के आनंद दीक्षित की कहानी भी हरीश जैसी ही है. वो ऐसी स्थिति में हैं, जहां वो सिर्फ देख सकते हैं. पर उनका शरीर कोई हरकत नहीं कर सकता. आनंद के माता-पिता बेटे की हालत देखकर दुखी हैं. लेकिन उनके मन में एक उम्मीद है. उम्मीद कि किसी दिन उनका बेटा उठेगा, और उन्हें पुकारेगा.
दिल्ली के हरीश चौथी मंजिल से नीचे गिरने के बाद इस हालत में पहुंचे थे. वहीं आनंद के साथ स्कूटर चलाते समय हादसा हुआ था. साल 2023 की सर्दियों में आनंद यूपी के गोरखपुर में कहीं जा रहे थे. बड़े जतन के बाद उन्होंने वो स्कूटर खरीदा था. लेकिन तभी एक एक्सीडेंट हुआ और आनंद के जीवन में सबकुछ बदल गया. उनकी सांसें चलती हैं, लेकिन जीवन थम गया है.
BMC ने घर गिरा दिया, इंश्योरेंस वालों ने पैसे नहीं दिएइस तरह की कंडीशन में इंसान को लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा जाता है. और इसमें बहुत सारे पैसे खर्च होते हैं. आनंद के साथ चौबीस घंटे रहने वाले केयरटेकर अर्जु प्रजापति एनडीटीवी से कहते हैं कि उन्होंने 18 महीने इंतजार किया कि आनंद बस एक बार पलक तक झपका दे. लेकिन एक खामोशी बनी रही. आनंद का परिवार सिर्फ मानसिक नहीं, बल्कि आर्थिक दर्द भी झेल रहा है. मेडिकल बिल 4 करोड़ रुपये हो जाने के कारण, उन्होंने अपनी जमीन तक बेच दी है. जब वे कोकिलाबेन और लोटस जैसे अस्पतालों में आनंद की जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तभी बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) ने मुंबई में उनके घर को तोड़ दिया. BMC द्वारा घर गिराए जाने के बाद, परिवार को किराए के घर में शिफ़्ट होना पड़ा. बेघर हुआ यह परिवार, अपने बच्चे के स्वास्थ्य और सुरक्षा को बनाए रखने की चुनौतियों का सामना कर रहा है.
आनंद के पिता का कहना है कि अपने बेटे के इलाज की इस लड़ाई के हर कदम पर परिवार को आर्थिक रूप से लूटा गया है. उन्होंने अस्पताल के बढ़ते बिलों से लेकर इंश्योरेंस कंपनी द्वारा क्लेम खारिज किए जाने के बारे में बताया. उन्होंने कहा,
'मैंने अपनी सारी जमा-पूंजी बेच दी, सिर्फ इसलिए ताकि मैं उसे एक बार फिर 'पापा' कहते हुए सुन सकूं. हमें पहले अस्पताल के बिलों ने आर्थिक रूप से लूटा. फिर बीमा कंपनी ने क्लेम रिजेक्ट कर दिया. जब हम ICU में अपने बेटे की जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब BMC ने हमारा घर गिरा दिया.'
आनंद की मां कहती हैं कि BMC उनसे उनका घर और बेटे की सेहत ले सकती है. लेकिन उनका ये विश्वास उनसे कोई नहीं छीन सकता कि एक दिन उनका बेटा उठेगा. परिवार का कहना है कि उनका मामला इस बात को दिखाता है कि जब तक बीमा और इलाज से जुड़े कानूनों में बदलाव नहीं होता, तब तक हर कोमा जैसी स्थिति पूरे परिवार के लिए मौत की सजा के समान है.
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