रफ्तार पर पहरा? गुजरात के बन्नी में आ रहे चीतों के लिए क्या सिर्फ 500 हेक्टेयर का बाड़ा काफी होगा?
Banni Grasslands Kutch: मध्य प्रदेश के कूनो के बाद अब गुजरात का बन्नी घास का मैदान चीतों का नया घर बनने जा रहा है. जानिए केन्या से आ रहे इन चीतों के सामने 500 हेक्टेयर के सीमित बाड़े और शिकार की क्या बड़ी चुनौतियां हैं.

मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के बाद अब गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बनने जा रहा है जहां चीतों के कदम पड़ने वाले हैं. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) ने गुजरात के कच्छ में स्थित 'बन्नी घास के मैदानों' (Banni Grasslands) में चार चीतों को शिफ्ट करने की मंजूरी दे दी है. केंद्र सरकार से फाइनल मुहर मिलते ही इस साल जुलाई या अगस्त के महीने में दो मेल-फीमेल जोड़े यहां पहुंच जाएंगे. लेकिन इस बड़ी कामयाबी के साथ ही एक बहुत बड़ा सवाल और चिंता भी खड़ी हो गई है. सवाल ये है कि दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले इस शिकारी के लिए क्या सिर्फ 500 हेक्टेयर का इलाका काफी होगा?
इस बार भारत आने वाले चीते नामीबिया या साउथ अफ्रीका से नहीं, बल्कि केन्या से मंगाए जा रहे हैं. गुजरात वन विभाग की योजना है कि एक साल के भीतर कूनो और केन्या से मिलाकर कुल 12 चीतों को बन्नी के मैदानों में बसाया जाए. वैसे केन्या से चीते लाने की ये राह इतनी आसान नहीं थी. केन्या के पर्यावरणविदों ने पहले इस ट्रांसफर पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के नियमों के मुताबिक अलग जेनेटिक वाले अफ्रीकी चीतों को भारतीय माहौल में मिलाना सही नहीं है. वहीं साउथ अफ्रीका ने भी कूनो में चीतों और उनके शावकों की मौत (करीब 9 वयस्क चीते और 9 शावक) के बाद हेल्थ रिव्यू होने तक नए चीते देने पर रोक लगा दी थी. हालांकि, लंबी बातचीत के बाद केन्या के साथ ये डील फिर से शुरू हो गई.
एशिया का सबसे बड़ा चारागाह और 'गांडो बावल' की वो तबाही
‘इंडिया टुडे’ की खबर के मुताबिक कच्छ के ग्रेट रन के उत्तरी छोर पर फैला बन्नी कोई साधारण इलाका नहीं है. लगभग 2,600 वर्ग किलोमीटर में फैला यह मैदान एशिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध घास का मैदान माना जाता है. यह इलाका पिछले 400 सालों से 'मालधारी' समुदाय (हिंदू और मुस्लिम चरवाहों) की रोजी-रोटी और उनकी प्रसिद्ध कांकरेज गायों और भैंसों का घर रहा है. इस पूरे इलाके की अपनी एक सदियों पुरानी 'मिल्क इकोनॉमी' है जो घास की 60 से ज्यादा प्रजातियों पर टिकी हुई है.
लेकिन साल 1961 में इस खूबसूरत इकोसिस्टम को बर्बाद करने की एक अनजानी शुरुआत हुई. वन विभाग ने रन की तरफ से आने वाले नमक को रोकने के लिए यहाँ 'प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा' (Prosopis juliflora) नाम का एक पेड़ लगा दिया. स्थानीय लोग इसे 'गांडो बावल' यानी 'पागल पेड़' कहते हैं. इस पेड़ ने देखते ही देखते बन्नी के आधे हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया. नतीजा ये हुआ कि जहाँ 1960 के दशक में यहाँ प्रति हेक्टेयर 4,000 किलो घास पैदा होती थी, वो 1999 तक घटकर सिर्फ 620 किलो रह गई. इसके बाद मालधारियों और सरकार ने मिलकर जंग लड़ी और करीब 100 वर्ग किलोमीटर के इलाके को दोबारा जिंदा किया. इसी मेहनत से बची घास की जमीन पर अब चीतों का नया आशियाना (करीब 5 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र) तैयार किया जा रहा है.
बन्नी का चक्रव्यूह - चीतों की रफ्तार बनाम बाड़े की दीवार

500 हेक्टेयर का पिंजड़ा: क्या चीता सच में खुलकर दौड़ पाएगा?
वन विभाग ने बन्नी में करीब 500 हेक्टेयर के इलाके को 9.8 किलोमीटर लंबी चेन-लिंक फेंसिंग (लोहे की जाली) से घेरकर देश का पहला 'चीता कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर' बनाया है. केन्या से आने वाले चीतों को पहले यहाँ क्वारंटाइन किया जाएगा और फिर इसी बाड़े में रखकर उनकी ब्रीडिंग कराई जाएगी. सरकार का प्लान है कि अगर ये मॉडल सफल रहा, तो साल 2032 तक देश के 17,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में 60 से 70 चीतों की एक मजबूत आबादी तैयार की जा सकेगी.
लेकिन वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स के बीच असली बहस इसी 500 हेक्टेयर के दायरे को लेकर है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ब्रीडिंग सेंटर कभी भी चीते का असली घर नहीं हो सकता क्योंकि चीतों को घूमने के लिए सैकड़ों वर्ग किलोमीटर का खुला इलाका चाहिए होता है. इसके अलावा बन्नी में चीतों के लिए शिकार की कमी को पूरा करने के लिए भावनगर के वेलावदार ब्लैकबक नेशनल पार्क से 500 काले हिरण (Blackbucks) यहाँ लाए जा रहे हैं. चारों तरफ इंसानी बस्तियों और चरवाहों से घिरे इस इलाके में दुनिया के सबसे तेज शिकारी को एक सीमित बाड़े में रखना कितना सही साबित होगा, ये तो वक्त ही बताएगा.
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