फेसबुक इंडिया ने एक पुलिसवाले को नौकरी पर रखा, काम था जेल के लिए तैयार रहना...किताब से खुलासा
दावा करने वाली महिला का नाम ‘सारा व्यान-विलियम्स’ है. वो 2011 से 2017 तक फेसबुक में काम कर चुकी हैं. उन्होंने एक किताब लिखी है. नाम है- 'केयरलेस पीपल: अ कोशनरी टेल ऑफ पावर, ग्रिड एंड लॉस्ट आइडयिलज्म' (Careless People: A Cautionary Tale of Power, Greed, and Lost Idealism). इसी किताब में सारा ने फेसबुक से जुड़े कई गोपनीय मामलों का खुलासा किया है.

दुनिया भर में फेसबुक के ऑफिसों में सरकार की ओर से छापा पड़ने की खबरें आती रहती हैं. इसमें भारत भी शामिल है. कुछ ऑफिस में सशस्त्र यानी हथियारों के साथ भी रेड मारे गए हैं. इन छापों से निपटने के लिए फेसबुक ने बकायदा तैयारी भी की थी. जिसका खुलासा एक किताब से हुआ है. दावा किया गया है कि फेसबुक (Facebook) ने एक पूर्व पुलिस कप्तान को नौकरी पर रखा था, ताकि अगर कंपनी और भारत सरकार के बीच किसी बात को लेकर टकराव होता है तो वो जेल जाए और इस स्थिति को संभाले. हालांकि फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा ने इन आरोपों को खारिज किया है और कानूनी कार्रवाई भी की है.
दावा करने वाली महिला का नाम ‘सारा व्यान-विलियम्स’ है. वो 2011 से 2017 तक फेसबुक में काम कर चुकी हैं. उन्होंने एक किताब लिखी है. नाम है- 'केयरलेस पीपल: अ कोशनरी टेल ऑफ पावर, ग्रिड एंड लॉस्ट आइडयिलज्म' (Careless People: A Cautionary Tale of Power, Greed, and Lost Idealism). इसी किताब में सारा ने फेसबुक से जुड़े कई गोपनीय मामलों का खुलासा किया है.
सारा विलियम्स मेटा में ‘ग्लोबल डायरेक्टर ऑफ पब्लिक पॉलिसी’ के पद पर थीं. उन्होंने इस किताब में फेसबुक और अलग-अलग देशों की सरकारों के बीच हुए टकरावों के बारे में लिखा है. इसमें भारत का भी जिक्र है. उन्होंने दावा किया है,
फेसबुक का Free Basics प्रोजेक्ट क्या था?इस किताब में फेसबुक के फ्री बेसिक्स प्रोजेक्ट को लेकर भी बड़े दावे किए गए हैं. इस प्रोजेक्ट के तहत फेसबुक की ओर से भारत में कम आय वाले यूजर्स को कुछ वेबसाइट्स के सीमित एक्सेस दिए जाते थे, फ्री में. 2016 में भारत ने इसे ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ का उल्लंघन माना और इस प्रोजेक्ट को बैन कर दिया गया. नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब है, इंटरनेट पर मौजूद सभी वेबसाइट्स को एकसमान महत्व देना. किसी को कोई विशेष छूट नहीं मिलनी चाहिए.
फेसबुक ने भारत सरकार को मनाने की भरपूर कोशिश की. कंपनी चाहती थी कि भारत में ये प्रोजेक्ट चलता रहे. दावा किया गया है कि फेसबुक के फाउंडर मार्क जकरबर्ग ने इसके लिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क किया था. उन्होंने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी थी और फ्री बेसिक्स के बारे में चर्चा करने के लिए एक व्यक्तिगत बैठक की मांग की थी. कंपनी के तत्कालीन चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) शेरिल सैंडबर्ग ने एक मंत्री को भी चिट्ठी लिखी थी. किताब में कई और दावे भी किए गए हैं-
- फेसबुक ने एक बड़ा विज्ञापन अभियान शुरू किया. इसमें करोड़ों डॉलर खर्च किए गए.
- टीवी, अखबार, सिनेमा, रेडियो और बिलबोर्ड पर विज्ञापन दिए गए.
- फेसबुक पर ही करोड़ों रुपये के विज्ञापन चलाए गए.
- SMS कैंपेन चलाया गया.
- ये सब इसलिए ताकी फ्री बेसिक प्रोजेक्ट के समर्थन में सरकार को चिट्ठी भेजने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाए.
हालांकि, इन सबके बावजूद भारत सरकार इस प्रोजेक्ट को जारी रखने के लिए तैयार नहीं हुई.
"विरोधियों की लिस्ट बनाओ, एल्गोरिथ्म के जरिए निपटो…"
सारा व्यान-विलियम्स के मुताबिक, मार्क जकरबर्ग चाहते थे कि फेसबुक अपने विरोधियों की लिस्ट बनाए. इसमें कंपनियां, व्यक्ति, संगठन या सरकारें हो सकती थीं. इन विरोधियों को दबाने के लिए फेसबुक को अपने एल्गोरिथ्म और टूल्स का इस्तेमाल करने को भी कहा गया.
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META ने क्या कार्रवाई की?इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने इस किताब को लेकर तुरंत ही कानूनी कार्रवाई की और एक ‘इमरजेंसी आर्बिट्रेटर’ (अंतरिम राहत के लिए आदेश) जारी करा लिया. इसके तहत किताब को प्रमोट करने पर रोक लगा दी गई. मेटा के प्रवक्ता एंडी स्टोन ने कहा है,
प्रवक्ता ने आगे कहा कि किताब में वही पुराने दावे और आरोप हैं जो पहले भी उनके अधिकारियों पर लगाए गए हैं.
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