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डॉक्टर ने Right की जगह Left कि‍डनी न‍िकाल दी, 14 साल चली कानूनी जंग, 2 करोड़ का मुआवजा मिला

Uttar Pradesh के अलीगढ़ में 14 साल पहले एक मरीज की दाहिनी किडनी निकालनी थी, लेकिन डॉक्टर ने बाईं किडनी निकाली. 14 साल तक कानूनी जंग चली जिसके बाद पीड़ित को 2 करोड़ का मुआवजा मिला है.

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22 मई 2026 (पब्लिश्ड: 11:42 AM IST)
doctor removes left kidney instead of right doctor dismissed patient given compensation
महिला की जो किडनी ठीक थी, डॉक्टर ने उसी को निकाल दिया (PHOTO-
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सोचिए… आप अस्पताल जाते हैं, क्योंकि आपकी किडनी खराब है. डॉक्टर ऑपरेशन करते हैं. परिवार को भरोसा होता है कि अब सब ठीक हो जाएगा. लेकिन कुछ दिनों बाद पता चलता है कि खराब वाली किडनी नहीं, बल्कि सही वाली किडनी निकाल दी गई. और जिस किडनी में बीमारी थी, वो अब भी शरीर के अंदर मौजूद है. डॉक्टरों की इस हरकरत पर देश की सबसे बड़ी कंज्यूमर कोर्ट ने कहा क‍ि ऐसी गंभीर लापरवाही का मामला अदालत के सामने भी शायद ही कभी आया हो. डॉक्टरों की इस गलती से एक परिवार बिखड़ गया. दो साल तक दर्द झेलने के बाद महिला की मौत हो गई. कोर्ट ने अब इस मामले में महिला के परिवार को 2 करोड़ रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है.

Uttar Pradesh का है मामला

ये मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का है. यहां 56 साल की एक महिला को पेट दर्द की शिकायत हुई.  17 अप्रैल 2012 को वो आशीर्वाद नर्सिंग होम पहुंचीं. जांच के बाद डॉक्टर राजीव लोचन ने बताया कि उनकी राइट वाली किडनी में हाइड्रोनेफ्रोसिस (पेशाब जमा होने से सूजन) की समस्या है. जरूरी मेडिकल टेस्ट के बाद डॉक्टर की सलाह पर महिला को राइट किडनी निकालने के लिए भर्ती किया गया. 6 मई 2012 को सर्जरी हुई और बाद में महिला को डायलिसिस पर रखा गया.

लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ. इसके बाद महिला दूसरे अस्पताल गईं, जहां CT स्कैन और रेडियोलॉजिकल जांच कराई गई. रिपोर्ट देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए. पता चला कि जिस राइट किडनी में बीमारी थी, वो तो शरीर में सही-सलामत मौजूद थी, जबकि पूरी तरह से हेल्दी लेफ्ट वाली किडनी निकाल दी गई थी. इसके बाद डॉक्टर के खिलाफ IPC की धारा 338 (लापरवाही से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत FIR दर्ज की गई.

मेडिकल बोर्ड, मेडिकल काउंसिल ने क्या कहा?

क्र‍िमि‍नल एक्शन शुरू करने से पहले जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर ने एक मेडिकल बोर्ड बनाया. मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में डॉक्टर की लापरवाही की पुष्टि हुई. इसके बाद चार्जशीट दाखिल की गई. डॉक्टर ने इस चार्जशीट को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी.

इसके बाद मामला उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल तक भी पहुंचा. काउंस‍िल ने डॉक्टर को दोषी मानते हुए उनका मेडिकल रजिस्ट्रेशन दो साल के लिए सस्पेंड कर दिया और उनका नाम मेडिकल रजिस्टर से हटाने का आदेश दिया. बाद में डॉक्टर ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में अपील की. लेकिन वहां भी यूपी मेडिकल काउंसिल का फैसला बरकरार रखा गया. इन सबके बीच महिला करीब दो साल तक बीमारी से जूझती रही. आखिरकार गंभीर हाइपरकलेमिया (खून में पोटैशियम का खतरनाक स्तर बढ़ना) और हाइपोग्लाइसीमिया (ब्लड शुगर कम होना) की वजह से उनकी मौत हो गई.

परिवार ने क्या आरोप लगाए? 

साल 2014 में महिला के परिवार ने National Consumer Disputes Redressal Commission यानी NCDRC में शिकायत दाखिल की. ये मामला रिटायर्ड जस्टिस ए पी साही और मेंबर भरतकुमार पंड्या की बेंच के सामने आया. सुनवाई के दौरान परिवार के वकील सुदर्शन राजन ने कहा कि ये ‘ओपन एंड शट केस’ है, यानी मामला पूरी तरह साफ है.

उन्होंने कहा कि डॉक्टर ने न सिर्फ लापरवाही की, बल्कि अनैतिक तरीके से ऑपरेशन भी किया. मेडिकल बोर्ड, UP मेडिकल काउंसिल और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट भी डॉक्टर की गलती साबित करती है. इस मामले में वकील संभव शर्मा और रिया सेठिया भी परिवार की ओर से पेश हुए.

डॉक्टर ने क्या दलील दी?

डॉक्टर की ओर से पेश हुए सीन‍ियर एडवोकेट वीके गर्ग ने कहा कि डॉक्टर ने कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं की. उन्होंने दलील दी कि दाईं तरफ चीरा लगाकर बाईं किडनी निकालना संभव ही नहीं है. उनका कहना था कि डॉक्टर ने दाईं किडनी की बीमारी की सही पहचान की थी, इसलिए उन्हें लापरवाह नहीं कहा जा सकता. वकील ने ये भी कहा कि मुआवजे की मांग काल्पनिक है और डॉक्टर यह सोच भी नहीं सकते थे कि उन्होंने गलत किडनी निकाल दी.

NCDRC ने क्या कहा?

National Consumer Disputes Redressal Commission यानी NCDRC ने डॉक्टर की दलीलों को अजीब और स्वीकार न करने योग्य बताया. आयोग ने कहा कि ऑपरेशन से पहले की रिपोर्ट साफ बता रही थी कि बाईं किडनी में कोई समस्या नहीं थी, इसलिए उसे निकालने का कोई सवाल ही नहीं उठता. आयोग ने इस घटना को मेडिकल डिजास्टर और गंभीर लापरवाही का मामला बताया. आयोग ने माना कि महिला की उम्र केवल 56 साल थी. इस घटना से मृतक के परिवार को जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई नहीं हो सकती. इसलिए आयोग ने बड़ा मुआवजा देने का आदेश दिया.

कितना मुआवजा मिला?

National Consumer Disputes Redressal Commission ने 18 मई को अपने फैसले में कहा कि ये मामला मेडिकल डिजास्टर यानी इलाज में हुई बेहद गंभीर गड़बड़ी और बहुत बड़ी लापरवाही का उदाहरण है. आयोग ने कहा कि इस घटना में एक परिवार ने अपनी मां, पत्नी और घर संभालने वाली सदस्य को खो दिया. ऐसे नुकसान की भरपाई पैसों से नहीं हो सकती. आयोग ने ये भी माना कि अगर महिला की बाईं किडनी गलती से न निकाली जाती, तो वह शायद ज्यादा समय तक जिंदा रह सकती थीं.

मुआवजे के तौर पर आयोग ने परिवार के हर सदस्य को 10-10 लाख रुपये देने का आदेश दिया. कोर्ट ने माना कि परिवार के हर सदस्य से असमय ही किसी अपने का प्यार और साथ छूट गया, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है.  इसके अलावा डॉक्टर राजीव लोचन की लापरवाही के लिए 1.5 करोड़ रुपए और केस लड़ने के खर्च के लिए 1 लाख रुपए देने को कहा. यानी कुल मिलाकर आयोग ने करीब 2 करोड़ रुपए  मुआवजा देने का आदेश दिया.  

(ये खबर हमारे साथ इंटर्नश‍िप कर रही साथी श्वेता राज ने ल‍िखी है)

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